त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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इसे इस प्रकार भी प्रकट कर सकते हैं-
पूर्ण शंकु का आयतन = ⅓ × वृत्त का क्षेत्रफल × ऊँचाई।
पर आलोच्य प्रसंग में अपूर्ण शंकु वाले कूप का आयतन ज्ञात करना है।
वह कूप ऊपर वृत्ताकार है। वह धीरे-धीरे तिरछी गहराई (slant depth) वाला
होता गया है। पर वह अन्त में सूच्याकार नहीं बना है। अतः वहाँ तक गहराई नहीं,
अपितु छोटे वृत्त या तलज वृत्त तक का ही आयतन ज्ञात करना है। ऐसी दशा में
श्रीधराचार्य ने इस अपूर्ण शंकु के अलग-2 स्थानों के वृत्त के क्षेत्रफल को जोड़
कर तथा ६ से विभाजित करके इसका औसत क्षेत्रफल ज्ञात किया है। भास्कराचार्य
ने भी इस संक्रिया का उद्देश्य औसत क्षेत्रफल ज्ञात करना बताया है। (क्षेत्रफलं
सममेवम् - लीलावती, खातव्यवहार श्लोक 3) पुनः त्रिशतिका श्लोक सूत्र 57 के
अनुसार इस क्षेत्रफल को ऊँचाई से गुणा करके इसका आयतन ज्ञात किया गया
है।
इस सूत्र को समन्वित करने के लिए उदाहरण इस प्रकार है-
उदाहरणम्
कूपस्य मुखव्यासः षोडश हस्तास्तले च चत्वारः।
वेधो द्वादश विद्वन् तत् खातफलं समाचक्ष्व।। 91।।
अमूलराशेः शतवर्गगुणनादिना लब्धं खातफलं हस्ताः 1062²¹⁄₄₀ त्र्यस्रवृत्तादिखातेषु
प्राग्वत् क्षेत्रफलानि साधयेत्।
सुक्षेमा अनुवाद-किसी कूप के मुख का व्यास 16 हाथ तथा तल का
व्यास 4 हाथ है। इसकी वेध या ऊँचाई 12 हाथ है। हे विद्वन्, ऐसे कूप का
खातफल या आयतन बताओ।
प्रस्तुत उदाहरण में सूत्रानुसार संक्रियाएँ करने पर-
अपूर्ण शंकु का आयतन या कूप का खातफल =
√10 × ¹²⁄₂₄) (256 + 16 + 400)
⇒ 25500.60705 / 24 ⇒ 1062.525 या 1062 (525 ÷ 25) / (1000 ÷ 25) = 1062²¹⁄₄₀
आधुनिक गणित में इस अपूर्ण शंकु का आयतन ज्ञात करने के लिए पहले
इसे पूर्ण शंकु का आकार प्रदान करते हैं, जो इस प्रकार है-