त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिशतिका 147
करणसूत्रम्
प्राग्वत् क्षेत्रस्य फलं वृत्तत्र्यस्त्रादिदृषदि पिण्डघ्नम्।
घनगणितमतो दृषदः फलं भवेत् पूर्वकरणेन।। 57।।
सुक्षेमा अनुवाद-वृत्त तथा त्र्यस्र या त्रिभुज का क्षेत्रफल पूर्वोक्त के समान
होता है। इस क्षेत्रफल में पिण्ड की ऊँचाई से पूर्वोक्त रीति से गुणन करने पर दृषत्
या प्रस्तर पिण्ड का घन गणित अथवा उसका आयतन प्राप्त होता है।
अनुशीलन-पूर्वोक्त श्लोक 43 में त्रिभुज का क्षेत्रफल तथा श्लोक 45 में
वृत्त के क्षेत्रफल की विधि बताई जा चुकी है। इसमें केवल ऊँचाई को गुणित करने
पर घन का या लम्ब वृत्तीय बेलन आकार के पिण्ड का घनफल का यह सूत्र
होगा-
पिण्ड का आयतन = आधार (वृत्त, त्रिभुज, चतुर्भुज आदि) का क्षेत्रफल
× ऊँचाई
उदाहरणम्
दशहस्तविस्तारे वृत्ते यदि वेत्सि गणक पाषाणे।
अध्यर्धहस्तपिण्डे गणयित्वा घनफलं कथय।। 94।।
न्यासः व्यासः 10 पिण्डः 3/2 लब्धं क्षेत्रफलम् 79 1/20 घनफलं हस्ता 118
भागाश्च 23/40 अतः पाषाणफलं हस्ताः 266 भागाश्च 127/160। एवं पाषाणत्र्यस्त्रादिष्वपि।
इति खातव्यवहारः।
सुक्षेमा अनुवाद-हे गणितज्ञ, 10 हाथ विस्तृत व्यास वाले तथा 1 ½ या 3/2
ऊँचाई वाले वृत्तीय बेलनाकार प्रस्तर-पिण्ड का घनफल गणना करके बताओ।
अनुशीलन-यहाँ पूर्वोक्त वृत्त के क्षेत्रफल के सूत्र-
⇒ 3.162 × (व्यास² / 4) के अनुसार इस पिण्ड के आधार का क्षेत्रफल-
(3.162 × 100) / 4 = 79 1/20 या 1581 / 20
पूर्वोक्त सूत्रानुसार इसका घनफल-
(1581 × 3/2) / 20 = 4743 / 40 = 118 23/40 घन हस्त