त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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अथवा बाहर के कोने में लगे हुए धान के ढेर की परिधि को क्रमशः 2, 4 तथा
⁴/₃ से गुणित करके पूर्वोक्त संक्रिया करने के पश्चात् अपने-अपने गुणक से
विभाजित करने से उनका गणित या घनहस्त प्राप्त होता है।
अनुशीलन-यदि धान का ढेर कमरे की दीवाल के किनारे है तो वह बनने
वाले वृत्त का ½ स्थान घेरता है। दो दीवारों के अन्दर के कोने में रखा ढेर वृत्त
का ¼ तथा बाहर के कोने में रखे होने पर वह ¾ स्थान घेरता है। इस प्रकार वृत्त
के ½ स्थान घेरने से बनने वाली परिधि की पूर्ण परिधि उससे ²/₁ गुणित होगी। अतः
एवं इनमें उन-उन से गुणित करके पहले पूर्ण परिधि प्राप्त कर ली गई है। पुनः
उससे घनफल की पूर्वोक्त संक्रिया करके उस अंश वाले क्षेत्रफल का घनफल
प्राप्त करने के लिये उससे भाग दिया गया है।
उदाहरणम्
भित्त्याश्रितस्य राशेस्त्रिषट्कपरिधेश्चतुष्कराभ्युदये।
का भवति धान्यसंख्या गणयित्वा कथ्यतामाशु।। 104।।
न्यासः [चित्र: अर्धवृत्ताकार परिधि = 18]
लब्धं गणितं हस्ताः 72। एतावतयो मागधा खार्यः 72।।
सुक्षेमा अनुवाद-किसी दीवाल के किनारे पड़ा हुआ धान का ढेर, जिसकी
परिधि 3 × 6 अर्थात् 18 हस्त उपलब्ध है तथा ऊँचाई 4 हाथ है। वहाँ कितना घन
हस्त या कितने मागध खारी धान होगा, गिनकर बताओ।
परिशीलन-यहाँ सम्पूर्ण वृत्त के ½ परिधि बताई गई है। अतः पूर्वोक्तानुसार
सम्पूर्ण संक्रियाएँ करने पर–
½ ((18 × 2) / 6)² × 4 = ½ × 36 × 4 = 144 / 2 = 72 घनहस्त या 72 मागध खारी
अन्यदुदाहरणम्
अपवरकमध्यकोणे राशेर्धान्यस्य नवकरे परिधौ।
चतुरुदये च फलं किं त्रिनवकपरिधौ बहिः कोणे।। 105।।