त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
त्रिशातिका 133
पं. सुधाकर द्विवेदी द्वारा सम्पादित ग्रन्थ में व्याख्या के द्वितीय, तृतीय चित्र
में कर्ण का मान 16 तथा सम्पूर्ण भुज या आधार का 15 दिखाया है, जो कि
गणित के अनुसार ठीक नहीं है। कर्ण का मान 15 तथा आधार का मान 9+5=14
होना चाहिए। मूल ग्रन्थ में ऐसा ही है। इसे प्रकट करने के लिये 'गणित का
इतिहास' ग्रन्थ में उद्धृत तथा जिन एण्ड कम्पनी की अनुमति से डेविड यूजीन
स्मिथ कृत History of mathematics से प्रत्युत्पादित मूल ग्रन्थ की छाया प्रति
को प्रस्तुत करते हैं। यह प्रस्तुत व्याख्या के 'लब्धो मध्यलम्बः 12। एष एव
कोटिः' इसके आगे लिखी गई है। दूसरी, तीसरी लाइन में कर्ण का मान 15 तथा
आधार का मान 14 लिखा है। इस आधार पर हमने अपनी व्याख्या में यही मान
उल्लिखित किया है।
•श्लो•क• लब्धो मध्यलम्बः। १२। एष एव कोटिः १२ तं च निपाते भुज-द्वयस्य उभयतो भुजः। कर्णश्चतुस्त्रा रू कर्णः। लंचे लंबण्या
१५ अत्र कोटिः १२। अस्य व्याः कृतिः १४४। कर्णयोस्तयोः १२/१५। पृथक् पृथक्
विस्रशेषशेषमेषं तानु नान्यो अन्यथोपचार। सत्र दर्शनात् ५। ९। यद्भूजत्र
र्गेणोनोपाः रू से हृदयं मूलं। कोटिः रूपेण गोनोपाः क र्सक नेर्मूलं ते भुजः। भुजका र्ण द्री त्रिन्त्रिषुटि
मूलं क र्सः। एवमन्यो भुजु षुतुषेषु त्रिभुजसने न्तेन मानयेत्। अत्ले चैवमुदहोः अर्मसः। ॐ। इततान्युव
हाय्टर ल द्यू सभावीद् थी। ९ फरि एषां रिवा त्फ लानयनप्रकारं एवमभावी दृथी। पुस्तल मवैर
पुना रिथैवा ारत प्रभाव नद्वियमोवं - हा विशेषमुतिं याभ्याप मजे हि समपादैः। एभिस्त्रिद्वारे
र्वैरिवैर्व धंस म भोनै फलं भवति। त्वा ते पम् भुजेवे पे षङ् इत्तनायने नैलितं। उदाहरणादिदि १५
क ५ क्षते पु क र्षे ली पं वह ख्विज्जारा वरूद्रा इदा पात्रा रात कतंक याना भी मु। न्यासः। ३। ३। ४। ५।
नईव तंह ९०। २४०। यमद्विगुतः क एरशपार सुतात लड ५० व्य पान व्यारदै। वा वाः क्षवारी व भ्रे
रशौन म्युकिं तलितां स्फानः। १० लब्ध लिन हत्याः १२ २४३। प म व भुद्रे वाने वो १२ अ हस्ता भुनाः
वा देवव्या। वह्मेश वि षोडशी प म रू ष्पतां कं गल्फितां न्धुभः। १६। १९। ल ब्हं र्याः ४०२४। रूप
ष्टफलानयन नायक एवमभावी मुखवल नह्वो गानी वाणी क्य के नेः परि दरणपूगायाः। व
धं गुणं चतुरन्वित त्रिंशत् त्रिं कें फलंक्तु पे उदाहरणं। रूप या मुस्त गोप्यो पार ३२ ह पा स्ना लेखेद्र
चातः। ३ रा दश विह त्यु ता नफलं किं प्रभा वस्त्या न्यासः १६ ते कां क किक सं० ४ ५ १५ ४ ७। यम्
स्वरत होः मूलानयनोपल। ८०। एव्पूत्र त्राणी । भाष् १२ लद् स्यात तस्य वर्गला क नद्विस्य
दृत्तामूलं भवेल्ल विता विम ने कुरु यवर्गोनू ते नस्त्रात वर्ग गुणक रिकर्म ण्णन्वी २२५। क व फले म्नु
०६३। ६ प्र भाग स्पाद दृशो न १२ वर्ष प ५ प श्चह त्ति दि ष्पूिर्दे वेन् सृवन् ३० नाति येष्टेन वेनगु
श्लोक 50 में त्रिभुज के क्षेत्रफल द्वारा इसके शीर्षलम्ब ज्ञात करने की
विधि बताई गई है। यह विधि श्लोक 43 में उल्लिखित 'कुदलं च लम्बहतम्' सूत्र
में त्रिभुज के क्षेत्रफल ज्ञात करने की विधि पर समीकरण के प्रयोग से प्रकट है-
त्रिभुज का क्षेत्रफल = आधार × शीर्षलम्ब / 2
त्रिभुज का शीर्षलम्ब = (2 × क्षेत्रफल) / आधार
134 त्रिशतिका
स्पष्टतः श्लोक 50 में शीर्षलम्ब की यही विधि उल्लिखित है।
उदाहरण के लिये द्वितीय चित्र के △ ADF त्रिभुज का श्लोक 43 के
‘भुजयुतिदलं चतुर्धा...’ की विधि से पहले क्षेत्रफल ज्ञात करते हैं–
द्वितीय चित्र में ADF का क्षेत्रफल = √21×8×7×6 = √7056 = 84
अब प्रस्तुत श्लोक 50 की विधि से इसका शीर्षलम्ब–
ADF का शीर्षलम्ब = (2×84)/14 = 168/14 = 12
इस लम्ब को यहाँ कोटि कहा गया है। इस कोटि से विभक्त की गई
आधार भुजा→5 मात्रा के AB तथा 9 मात्रा के EF को यहाँ ‘अवधा’ कहा गया
है। साथ ही ADB त्रिभुज की पार्श्व भुजा AD 13 मात्रा का कर्ण है। तथा BDF
त्रिभुज की पार्श्वभुजा F D 15 मात्रा का कर्ण है।
आगे 51वें सूत्र में त्रिभुज की भुजाओं में सहसम्बन्ध प्रकट करते हुए इनके
परिमाण के सूत्र बताए हैं। तदनुसार–
कोटि या लम्ब = √कर्ण²–भुज² या आधार²
भुज या आधार = √कर्ण² – कोटि² या लम्ब²
कर्ण = √लम्ब² + आधार²
यहां कर्ण के सूत्र को उपरिलिखित उदाहरण में अन्वित करने पर इसका
मान क्रमशः 13 तथा 15 प्राप्त होता है–
ADB का कर्ण = √12²+5² ⇒ √144+25 ⇒ √169 = 13
BDF का कर्ण = √12²+9² ⇒ √144+81 ⇒ √225 = 15
इन कर्ण, कोटि, आधार में से किन्हीं दो के परिज्ञान होने पर समीकरण
द्वारा तीसरे का आसानी से पता लगाया जा सकता है। अतः व्याख्या में कर्ण के
वर्ग से लम्ब के वर्ग को घटाकर वर्गमूल लेकर दोनों त्रिभुजों की अलगर आधार
भुज या अवधा ज्ञात की गई है–
√13²+12² ⇒ √169+144 ⇒ √25 = 5
अथवा √15²+12² ⇒ √225+144 ⇒ √81 = 9
यहाँ इसका स्पष्ट निरूपण बहुत आवश्यक है कि यह नियम केवल
समकोण त्रिभुज में लागू होता है।
त्रिशतिका 135
इस प्रकार इस सूत्र से हमें आधार, लम्ब तथा कर्ण वाले त्रिक प्राप्त होते
हैं-
9 - 12 - 15
5 - 12 - 13
यह सूत्र सर्वव्यापी है। अतः इन संख्याओं के अनुपात में आने वाली किसी
भी त्रिक में यह सूत्र लागू होता है। इस प्रकार किसी भी समकोण त्रिभुज में वे
संख्याएँ होती हैं, जो उपरिलिखित त्रिक के अनुपात में होती हैं। अथवा विलोमतः,
इन संख्याओं के अनुपात में आने वाला कोई भी त्रिक समकोण त्रिभुज का निर्माण
करता है। अतः ये सभी त्रिक इसके लिये सत्य हैं। उदाहरणतः-
9 -12 -15 त्रिक का-
½ गुना ⇒ 4.5 . 6 . 7.5 क्योंकि √20.25 + 36 = 7.5
⅓ ,, ⇒ 3 . 4 . 5 ,, √9 + 16 = 5
¼ ,, ⇒ 2.25. 3 . 3.75 ,, √5.0625 + 9 = 3.75
5.12.13 का त्रिक का-
½ ,, ⇒ 2.5 . 6 . 6.5 ,, √6.25 + 36 = 6.5
¼ ,, ⇒ 1.25. 3 . 3.25 ,, √1.5625 + 9 = 3.25
इस प्रकार किसी भी त्रिक से समानुपातिक गुणा या भाग द्वारा अनन्त त्रिक
प्राप्त किये जा सकते हैं। इनके सर्वप्रथम अनेक उदाहरण 500 B.C. या इससे भी
पूर्व निर्मित बौधायन शुल्ब सूत्र आदि में प्राप्त होते हैं। इसमें उपरिलिखित द्वितीय
त्रिक का स्पष्ट उल्लेख है¹। इसका इस प्रकार नाम दे सकते हैं-
a b c
5 12 13
इस त्रिक की एक विशेषता यह है कि इसके b तथा c का जोड़ तथा घटाव
दोनों किसी पूर्ण संख्या के वर्ग बनते हैं तथा इनका वर्गमूल कोई विषम संख्या
होती है तथा इन विषम संख्याओं का गुणनफल a संख्या होती है। इस समीकरण
को सिद्ध करने पर सार्वत्रिक परिणाम प्राप्त होता है कि यदि a किन्हीं दो विषम
संख्याओं (m n) का गुणनफल हो, या a = m n हो तो-
b = m² - n² तथा c = m² + n²
2 2
१. तासां त्रिकचतुष्कयोर्द्वादशपञ्चिकयोः ......इत्येतासूपलब्धिः। - बौ.शु.सू. 1.49
136 त्रिशतिका
उदाहरणार्थ-
a ⇒ 7 × 5 = 35, b ⇒ (49 - 25) / 2 = 12
c ⇒ (49 + 25) / 2 = 37
अथवा
a ⇒ 9 × 3 = 27, b ⇒ (81 - 9) / 2 = 36
c ⇒ (81 + 9) / 2 = 45
‘उपरिलिखित त्रिक में भी यह नियम लागू है-
a ⇒ 5 × 1 = 5 b ⇒ (25 - 1) / 2 = 12
c ⇒ (25 + 1) / 2 = 13
इस बढ़िया नियम के अनुसार किसी भी विषम संख्या के a होने पर त्रिक
प्राप्त किये जा सकते हैं।
श्लोक ५१ की व्याख्या के आधार पर भुज का सूत्र इस प्रकार है-
कोटिवर्गोनायाः कर्णकृतेर्मूलं भुजः।
अर्थ पूर्वोक्त है। यह कर्ण पर समीकरण से प्राप्त है-
√(लम्ब² + आधार²) = कर्ण
⇒ √(कर्ण² - लम्ब²) = आधार या भुज
कोटि या लम्ब का सूत्र इस प्रकार है-
भुजवर्गोनायाः कर्णकृतेर्मूलं कोटिः।
यह भी कर्ण पर समीकरण अनुसार प्राप्त है। इस प्रकार-
√(कर्ण² - आधार²) = लम्ब
पूर्वोक्त समकोण त्रिभुज के उदाहरणों में-
√(13² - 5²) = √(169 - 25) = √(144) = 12 लम्ब
इसी प्रकार-
√(15² - 9²) = √(225 - 81) = √(144) = 12 लम्ब
त्रिशतिका 137
श्रीधराचार्य ने त्रिभुज की भुजाओं में सहसम्बन्ध तथा प्रमाण को प्रकट
करने वाला यह सूत्र मूलतः ब्रह्मगुप्त से प्राप्त किया है-
कर्णकृतेः कोटिकृतिर्विशोध्य मूलं भुजो, भुजस्य कृतिम्।
प्रोह्यं पदं कोटिः, कोटिबाहुकृतियुतिपदं कर्णः॥
—ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त १२.२४
स्पष्टतः श्रीधर के भाव तथा भाषा भी इसके समान है। आधुनिक गणित
में इसे पाइथोगोरस प्रमेय कहने की परम्परा है। पर यह उल्लेख बहुत जरूरी है
कि पाइथोगोरस से भी पहले ईसा पूर्व ५वीं शताब्दी या इससे भी पूर्व निर्मित
बौधायन शुल्व सूत्र में इस प्रमेय को किसी आयत में वर्ग के माध्यम से प्रकट
किया गया था-
दीर्घचतुरस्रस्याक्ष्णया रज्जुः पार्श्वमानी तिर्यङ्ग्मानी
च यत् पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति।—बौधायन शु.सू. १.४८
अर्थात् किसी आयत की भुजाएँ जितने अलग्र प्रमाण का वर्ग बनाती हैं,
उन पर खींचा गया विकर्ण उनके योगफल जितना वर्ग क्षेत्रफल बनाता है। इस
प्रकार—
क्योंकि विकर्ण पर वर्ग = a² + b²
अतः उस वर्ग की विकर्ण नामक एक भुजा = √(a² + b²)
शुल्ब सूत्रों में इस उपाय से कर्ण के प्रमाण को जानने का सफल प्रयास
किया गया था।
खातव्यवहारे करणसूत्रम्
मुखतलमध्ये पृथुतादैर्घ्ये वा चेत् प्रजायते विषमम्।
वेधे वा विषमयुतिं साम्याय भजेत् विषमपदैः॥ 52॥
समविस्तरहतदैर्घ्ये वेधेन समाहते फलं भवति।
खाते समभुजवेधे बाहुघनो जायते गणितम्॥ 53॥
सुक्षेमा अनुवाद-मुख, तल तथा मध्य में पृथुता = चौड़ाई, दैर्घ्य = लम्बाई
या वेध = गहराई के विषम होने पर विषम खात होता है। उसे समखात बनाने के
लिये उन विषम संख्याओं को जोड़कर उन्हें विषम संख्या के पद से विभाजित
करना चाहिए। (इससे औसत मान प्राप्त होता है।)॥ 52॥
विस्तर = चौड़ाई, दैर्घ्य = लम्बाई तथा वेध = गहराई के सम होने पर तीनों
को परस्पर गुणित करने पर घनफल प्राप्त होता है तथा ऐसा कोई खात या गहरा
क्षेत्र-व्यवहार, खात, चिति एवं त्रिशतिका उपसंहार (श्लोक ७६-१००)
138 त्रिशतिका
पात्र जिसकी तीनों भुजाएँ समान हों, उसमें इस संक्रिया से गणित या उसका
आयतन ज्ञात होता है। । 53 ।।
अनुशीलन-इन श्लोकों में घन तथा घनाभ के आयतन को ज्ञात करने की
विधि बताई गई है। 53 वें श्लोक के अनुसार जिस पिण्ड की लम्बाई, चौड़ाई तथा
ऊँचाई वाली तीनों भुजाएँ परस्पर समान परिमाण की हों वह घन होता है। इन तीनों
का गुणनफल ही घनफल अथवा आयतन है। इन तीनों की भुजा समान होने से
किसी भी भुजा का घन उसका आयतन होगा। अतः-
घन का आयतन = कोई भी भुजा³
52 वें श्लोक के अनुसार घनाभ अर्थात् जिसकी तीनों विमाएँ ⇒ लम्बाई,
चौड़ाई तथा ऊँचाई समान न हों, उनके आयतन को ज्ञात करने के लिये उन तीनों
का गुणन करना चाहिये। अतः-
घनाभ का आयतन = लम्बाई × चौड़ाई × गहराई
इस श्लोक में यह भी कहा है कि जिस पिण्ड की लम्बाई या चौड़ाई या
गहराई की सम्पाती भुजाएँ परस्पर समानान्तर न हों, उसे असमखात कहते हैं।
इनका औसत निकाल कर पहले सम खात बना लेना चाहिये। उसके पश्चात् उक्त
सूत्र का प्रयोग करके उस घनाभ का आयतन ज्ञात करना चाहिये।
उदाहरणम्
द्वित्रिचतुष्करवेधा पुष्करिणी पञ्च हस्तविस्तारा।
षोडशहस्तायामा खातफलं कथ्यतामाशु।। 87।।
न्यासः 2। 3। 4।। 5।। 16।। लब्धं विषमफलम् 240
सुक्षेमा अनुवाद-कोई पुष्करिणी या बावली कहीं पर 2 कहीं 3 तथा कहीं
4 हाथ वेध या गहरी है। यह 5 हाथ विस्तार या चौड़ाई वाली तथा 16 हाथ आयाम
या लम्बाई वाली है। इसके खातफल या घन फल को शीघ्र बताओ।
अनुशीलन-यहाँ इसकी गहराई समान नहीं है। अतः 52 वें श्लोक के
अनुसार इसका औसत निकालते हैं। इसका नियम है कि सभी संख्याओं को जोड़
दें। पुनः उसे उन संख्याओं के जितने नम्बर हैं, उनसे भाग दे दें। पश्चात् प्रत्येक
को आपस में गुणित करें। अतः-
((2 + 3 + 4) / 3) × 5 × 16 = 3 × 5 × 16 = 240
त्रिशतिका 139
इस औसत से स्थूल घनफल ज्ञात होता है। क्योंकि अलग-अलग गहराई
का क्षेत्रफल सुनिश्चित नहीं है। स्पष्टतः अलग-अलग क्षेत्रफलों को गहराई से
गुणित करने पर अलग-अलग परिणाम प्राप्त होगा। सर्वथा सही घनफल के लिये
अलग-अलग गहराई वाले घनाभ का अलग-अलग आयतन प्राप्त करके उन तीनों
का जोड़ करना होगा।
अन्यदुदाहरणम्
त्रिचतुःपञ्चकहस्ताः पृथुता विषमात् तु यस्य खातस्य।
अष्टौ हस्ता वेधो द्वादश दैर्घ्ये कथय फलम्॥ 88॥
न्यासः।। 3। 4। 5।। 8 दैर्घ्य 12 खाते लब्धं फलम् 384
सुक्षेमा अनुवाद-जो खात या गहरा पिण्ड पृथुता या चौड़ाई में कहीं 3,
कहीं 4 तथा कहीं 5 हाथ वाला है। वह दैर्घ्य या लम्बाई में 12 हाथ है तथा 8 हाथ
गहरा है। उस घन का फल या आयतन क्या होगा।
अनुशीलन-इस हौज का केवल लम्बाई, चौड़ाई का चित्र इस प्रकार
होगा-
[चित्र] नापियाँ निर्दिष्ट संख्याओं का ½
सेंटीमीटर हैं।
यहाँ CD → 3, BE → 4, तथा AF की चौड़ाई 5 हाथ है। अतः उपर्युक्त
संक्रिया अनुसार औसत निकालते हुए-
((3 + 4 + 5) / 3) × 12 × 8 = 4 × 12 × 8 = 384
यहाँ बिन्दु अंकित रेखाओं द्वारा समकोण त्रिभुज प्राप्त किया गया है। इससे
हम एक घनाभ तथा एक त्रिभुज प्राप्त करते हैं। इन दोनों के अलग-अलग
आयतन को जोड़कर भी हम वही परिणाम पाते हैं-
140 त्रिशतिका
घनाभ का आयतन ⇒ 12 × 3 × 8 = 288
त्रिभुजाकार गड्ढे का आयतन ⇒ 6 × 2 × 8 = 96
——————————————————————————————
सम्पूर्ण हौज का आयतन 384
——————————————————————————————
अन्यदुदाहरणम्
समविस्तारकरा दशपादयुता गणक यस्य खातस्य।
दैर्घ्ये षोडश सार्धा वेधोऽष्टौ तत्र किं गणितम्।। 89।।
न्यासः ⁴¹⁄₄ ³³⁄₂ ⁸⁄₁ गणितहस्ताः 1353
सुक्षेमा अनुवाद-हे गणितज्ञ, जिस खात के हाथ समान विस्तार वाले हैं,
उसकी चौड़ाई ¼ सहित 10 अर्थात् ⁴¹⁄₄ तथा लम्बाई ½ सहित 16 अर्थात् ³³⁄₂ है तथा
वेध या गहराई 8 हाथ है। उसका कितना ‘गणित’ या आयतन होगा।
अनुशीलन-यह समखात का उदाहरण है। इसमें घनाभ के सामान्य सूत्र के
अनुसार-
⁴¹⁄₄ × ³³⁄₂ × ⁸⁄₁ = 10824/8 = 1353 हाथ³
अन्यदुदाहरणम्
समचतुरस्रे खाते षोडश हस्ता भुजा सखे यत्र।
वेधोऽपि षोडशैव प्रकथ्यतां तत्र किं गणितम्।।
न्यासः 16। 16। 16।। लब्धं 4096।।
सुक्षेमा अनुवाद-सम चतुर्भुज खात में जिसकी लम्बी तथा चौड़ी भुजा
16-16 हाथ की है जिसकी गहराई भी 16 है। हे मित्र, उसका आयतन क्या होगा,
बताओ।
अनुशीलन-यह घन के आयतन का उदाहरण है। यहाँ 53 वें श्लोक के
नियमानुसार-
हौज का आयतन ⇒ 16³ अथवा 16 × 16 × 16 = 4096 घन हस्त
कूपस्य फले सूत्रम्
मुखतलतद्योगोनां वर्गैक्यकृतेः पदं दशगुणायाः।
वेधगुणं चतुरन्वितविंशतिभक्तं फलं कूपे।। 54।।
त्रिशातिका 141
सुक्षेमा अनुवाद-मुख के व्यास का वर्ग, तल के व्यास का वर्ग तथा इन
दोनों के व्यास का वर्ग--इन्हें परस्पर संयुक्त करके इनका वर्ग प्राप्त करें तथा 10
से गुणित करें। इस सम्पूर्ण का वर्गमूल प्राप्त करें। इसे इसकी ऊँचाई से गुणित करें
तथा 24 से विभाजित करें। इससे कूप का घनफल प्राप्त होता है।
अनुशीलन-इस सूत्र में विषम खात कूप अथवा अपूर्ण शंकु के आयतन
(volume of frustrum of a cone) का सूत्र प्रदान किया गया है।
श्लोक में उल्लिखित संक्रियाओं से इसके लिये हमें यह सूत्र प्राप्त होता
है–
अपूर्ण शंकु का आयतन = ऊँचाई √10 {व्यास²₁ +व्यास²₂ +(व्यास₁ + व्यास₂)²}²
───────────────────────────────────
24
⇒ √10 × ऊँचाई {व्यास²₁ + व्यास²₂ + (व्यास₁ + व्यास₂)²}
───────────────────────────────────────────────────
24
इसे इस प्रकार भी लिख सकते हैं–
ऊँचाई ⎧ (√10 × व्यास²₁) (√10 × व्यास²₂) {√10 (व्यास₁ + व्यास₂)²} ⎫
───── ⎨ ─────────────── + ─────────────── + ──────────────────────── ⎬
6 ⎩ 4 4 4 ⎭
इस सूत्र के कोष्ठक का प्रत्येक उपबन्ध 'वृत्त के क्षेत्रफल' के समकक्ष है।
अतः इस सूत्र को इस प्रकार भी लिख सकते हैं–
विषमखात कूप या अपूर्ण शंकु का आयतन =
(मुखज क्षेत्रफल + तलज क्षेत्रफल + युतिज क्षेत्रफल) ऊँचाई
─────────────────────────────────────────────────────
6
भास्कराचार्य ने इस रूप में सूत्र को स्वीकार करते हुए इसका उपयोग
विषमखात घनाभ के आयतन (Volume of frustrum of a pyramid) को जानने
के लिये किया है।¹ जिस पिण्ड का आधार आयत हो तथा ऊपर क्रमशः सूच्याकार
हो वह पिरामिड है। जो आधार वृत्ताकार रखते हुए क्रमशः सूच्याकार को धारण
करे वह शंकु है।
त्रिशतिकाकार ने आगे श्लोक 61 में ऐसे पूर्ण शंकु के आयतन के लिये
142 त्रिशतिका
इसे इस प्रकार भी प्रकट कर सकते हैं-
पूर्ण शंकु का आयतन = ⅓ × वृत्त का क्षेत्रफल × ऊँचाई।
पर आलोच्य प्रसंग में अपूर्ण शंकु वाले कूप का आयतन ज्ञात करना है।
वह कूप ऊपर वृत्ताकार है। वह धीरे-धीरे तिरछी गहराई (slant depth) वाला
होता गया है। पर वह अन्त में सूच्याकार नहीं बना है। अतः वहाँ तक गहराई नहीं,
अपितु छोटे वृत्त या तलज वृत्त तक का ही आयतन ज्ञात करना है। ऐसी दशा में
श्रीधराचार्य ने इस अपूर्ण शंकु के अलग-2 स्थानों के वृत्त के क्षेत्रफल को जोड़
कर तथा ६ से विभाजित करके इसका औसत क्षेत्रफल ज्ञात किया है। भास्कराचार्य
ने भी इस संक्रिया का उद्देश्य औसत क्षेत्रफल ज्ञात करना बताया है। (क्षेत्रफलं
सममेवम् - लीलावती, खातव्यवहार श्लोक 3) पुनः त्रिशतिका श्लोक सूत्र 57 के
अनुसार इस क्षेत्रफल को ऊँचाई से गुणा करके इसका आयतन ज्ञात किया गया
है।
इस सूत्र को समन्वित करने के लिए उदाहरण इस प्रकार है-
उदाहरणम्
कूपस्य मुखव्यासः षोडश हस्तास्तले च चत्वारः।
वेधो द्वादश विद्वन् तत् खातफलं समाचक्ष्व।। 91।।
अमूलराशेः शतवर्गगुणनादिना लब्धं खातफलं हस्ताः 1062²¹⁄₄₀ त्र्यस्रवृत्तादिखातेषु
प्राग्वत् क्षेत्रफलानि साधयेत्।
सुक्षेमा अनुवाद-किसी कूप के मुख का व्यास 16 हाथ तथा तल का
व्यास 4 हाथ है। इसकी वेध या ऊँचाई 12 हाथ है। हे विद्वन्, ऐसे कूप का
खातफल या आयतन बताओ।
प्रस्तुत उदाहरण में सूत्रानुसार संक्रियाएँ करने पर-
अपूर्ण शंकु का आयतन या कूप का खातफल =
√10 × ¹²⁄₂₄) (256 + 16 + 400)
⇒ 25500.60705 / 24 ⇒ 1062.525 या 1062 (525 ÷ 25) / (1000 ÷ 25) = 1062²¹⁄₄₀
आधुनिक गणित में इस अपूर्ण शंकु का आयतन ज्ञात करने के लिए पहले
इसे पूर्ण शंकु का आकार प्रदान करते हैं, जो इस प्रकार है-
त्रिशतिका 143
नापियाँ उल्लिखित संख्याओं का
¼ सेंटीमीटर हैं।
त्रिशतिकाकार ने अपूर्ण शंकु की ऊँचाई 12 हाथ बताई है। उपरिलिखित
चित्र के अनुसार इसे पूर्ण शंकु का रूप देने पर इसकी ऊँचाई अवश्य ही 16
होगी। यह समरूप त्रिभुज के इस समीकरण से भी प्रकट है-
△ OAB तथा △ OCD समरूप हैं। अतः-
OA / OC = AB / CD → (x + 12) / x = 8/2 या 4
⇒ 4x = x + 12
⇒ 4x - x = 12
⇒ 3x = 12
⇒ x = 12/3 = 4
इस प्रकार CO की ऊँचाई 4 हाथ है। उल्लिखितानुसार AC की ऊँचाई 12
है। अतः कुल ऊँचाई 16 हाथ है। इसमें शंकु के समकक्ष सूत्र को समन्वित करते
हुए तथा उसमें से OC से बनने वाले आकार को घटाते हुए-
⅓ × 3162/1000 (r₁² h₁ - r₂² h₂) → ⅓ × 3162/1000 (8² × 16 - 2² × 4)
⇒ 3162/3000 × (11024 - 16)
⇒ 1.054 × 1008 = 1062.432
अथवा 1062 54/125
इस प्रकार हमने आधुनिक रीति से पूर्णांक में वही परिणाम प्राप्त कर लिया
है, जिसका त्रिशतिकाकार ने उल्लेख किया है।
इसकी व्याख्या में कहा है कि त्रिभुज तथा वृत्त के क्षेत्रफल भी इसी उपाय
से प्राप्त करना चाहिये। अतः इस श्लोक से संकेतित सूत्र ऊपर लिख दिये गए हैं।
144 त्रिशतिका
पाषाणफलानयने सूत्रम्
दैर्घ्याङ्गुलानि विस्तृतिपिण्डाङ्गुलताडितानि विभजेत्।
द्विकृतिचतुरेकषड्भिर्भवन्ति पाषाणफलहस्ताः॥ 55॥
सुक्षेमा अनुवाद-किसी पिण्ड या पाषाण के लम्बाई × चौड़ाई × ऊँचाई
द्वारा अंगुल में प्राप्त घनफल को 2 की कृति या वर्ग, चार, एक तथा छह से प्राप्त
संख्या अर्थात् 6144 से विभाजित करने पर उसका 'पाषाणफल-हस्त' प्राप्त होता
है।
अनुशीलन-त्रिशतिकाकार के समय में 'अंकानां वामतो गतिः' इस नियम
के अनुसार अंकों को दाहिने से बाईं ओर पढ़ा जाता था। अतः सबसे पहले इकाई
की संख्या 2²=4, पुनः दहाई की संख्या→4 इस क्रम से पढ़ने पर 6144 संख्या
प्राप्त होती है। उनके समय में 32 अंगुल लम्बा, 24 अंगुल चौड़ा तथा 8 अंगुल
गहरा तथा इस प्रकार 32×24×8=6144 घन अंगुल पाषाण-पिण्ड का 1
'पाषाण-फल-हस्त' यह मानक परिमाण माना गया था¹। अतः इस श्लोक में
किसी भी पाषाण-पिण्ड के घन अंगुल में प्राप्त परिमाण को 6144 से विभाजित
करके 'पाषाण-फल-हस्त' इस मानक मान को जानने की विधि बताई गई है।
उदाहरणम्
सार्धत्रिकरव्यासा करार्धपिण्डा शिला सखे तस्याः।
आयामः पञ्च करास्त्रिभागयुक्ताः फलं किं स्यात्॥ 92॥
हस्तैरंगुलीकृतैर्न्यासः 84, 12, 128 लब्धं पाषाणहस्ताः 21
सुक्षेमा अनुवाद-हे मित्र, जिस शिला की लम्बाई 7/2 हाथ, ऊँचाई 1/2 हाथ
तथा चौड़ाई 5 1/3 या 16/3 हैं, उसका घनफल क्या होगा।
अनुशीलन-24 अंगुल का 1 हस्त होता है। अतः व्याख्या के अनुसार इन
नापियों को 24 से गुणित करके अंगुल में बदल लेते हैं। इसके अनुसार शिला के
क्रमशः 84, 12 तथा 128 अंगुल परिमाण प्राप्त होते हैं। अतः-
84 × 12 × 128 = 129024 घन अंगुल या अंगुल³
129024 ÷ 6144 = 21 'पाषाण फल हस्त'
१. यस्य पाषाणस्य विस्तृतिरंगुलचतुर्विंशतिः, दैर्घ्यमंगुलद्वात्रिंशत् पिण्डमितिश्चाष्टांगुलानि तदेव
पाषाणघनहस्ताख्यं प्रकल्पितमाचार्येणेतीह बोध्यम् - म.म.पं. सुधाकर चतुर्वेदमहाभागानां
टिप्पणी।
1
त्रिशतिका 145
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि ‘पाषाण-फल-हस्त’ यह एक पारिभाषिक
मानक मात्रक है, जो कि घन-हस्त से सर्वथा भिन्न है। प्रस्तुत उदाहरण में
7/2 × 1/2 × 16/3 = 112/12 = 9.3..... घन-हस्त प्राप्त होते हैं। उपरिलिखित विधि से इसके
21 पाषाणफलहस्त सिद्ध होते हैं।
गोल-पाषाणस्य करण-सूत्रम्
गोलव्यासघनार्धं स्वाष्टादशभागसंयुक्तं गणितम्।
घनहस्ता नवगुणिताश्चतुर्विभक्ता करा दृषदः॥ 56॥
सुक्षेमा अनुवाद-गोल पिण्ड के व्यास के घन के आधे को ‘स्व’ अर्थात्
उसके ही 18 वें भाग से संयुक्त करने पर गोले का घनफल या आयतन प्राप्त होता
है। इस प्रकार प्राप्त घनहस्त या घनफल को 9 से गुणित करके 4 से विभक्त करने
पर पाषाण फलहस्त प्राप्त होता है।
अनुशीलन-श्लोक के अनुसार किसी गोल पिण्ड के घनफल या आयतन
का सूत्र इस प्रकार है-
गोल पिण्ड का आयतन = व्यास³ / 2 + व्यास³ / (2 × 18)
⇒ (1/2 + 1/36) व्यास³ ⇒ 19/36 × व्यास³
π = √10 = 19/6 = 3.16 का अलग उल्लेख करने पर-
गोल पिण्ड का आयतन = (3.16 × व्यास³) / 6
⇒ 1/6 × 3.16 × 8 त्रिज्या³, ⇒ 4/3 × 3.16 त्रिज्या³
यह सूत्र आधुनिक गणित के π के मान को छोड़ कर सर्वथा समतुल्य
है।
यहाँ श्रीधर के सूत्र को इस प्रकार भी लिखा जा सकता है-
गोले का आयतन = (4 × 3.16 × त्रिज्या² × व्यास) / 6
4 × 3.16 × त्रिज्या² यह गोले के पृष्ठीय क्षेत्रफल का सूत्र है।
अतः भास्कराचार्य ने गोले के आयतन का यह सूत्र प्रदान किया है१-
१. गोलस्यैवं तदपि च फलं पृष्ठजं व्यासनिघ्नम्।
षड्भिर्भक्तं भवति नियतं गोलगर्भे घनाख्यम्॥ –लीलावती, क्षेत्रव्यवहार, श्लोक ४१
146 त्रिशतिका
गोल पिण्ड का आयतन = (गोले का पृष्ठीय क्षेत्रफल × व्यास) / 6
पूर्वोक्त श्लोक 55 में कहा है कि 32×24×8 = 6144 घन अंगुल = 1
पाषाण हस्त। इन अंगुल संख्याओं को 24 से विभाजित करके हस्त संख्याओं में
यह भी कह सकते हैं कि 4/3 ×1×1/3 = 4/9 घन हस्त = 1 पाषाणफलहस्त। यहाँ
श्रीधर ने इस पैमाने को मानते हुए किसी पाषाण-पिण्ड के घन हस्त में प्राप्त
परिमाण को 4/9 से विभाजित करके अर्थात् 9/4 से गुणित करके पाषाण--फल हस्त
प्राप्त करने का निर्देश दिया है।
उदाहरणम्
गोले पाषाणमये घनफलमध्यर्धविस्तारे।
गणयित्वा कथय ततः पाषाणफलं हि यदि वेत्सि॥ 93॥
न्यासः 3/2 लब्धं घनहस्ताः 1 25/32 अतः पाषाणफलहस्ताः 4। अंगुलभागाः 3/16॥
सुक्षेमा अनुवाद-कोई गोल पाषाण, जिसका व्यास 1 1/2 या 3/2 तक विस्तृत है,
उसका घनफल या आयतन गणना करके बताओ, यदि जानते हो।
अनुशीलन-यहाँ श्लोक से प्राप्त सूत्र के अनुसार-
19/36 × (3/2)³ = (513 ÷ 9) / (288 ÷ 9) = 57/32 = 1 25/32
घन हस्त या गोल पाषाण का आयतन
इसका पाषाणफल हस्त प्राप्त करने के लिये पूर्वोक्त संक्रिया करने पर
57/32 × 9/4 = 513/128 = 4 1/128 पाषाण फल हस्त
श्लोक 55 में पाषाणफलहस्त बनाने की विधि द्वारा भी हम यही परिणाम
प्राप्त करते हैं-
3/2 × 24 = 36
19/36 × 36³ = 24624
(24624 ÷ 12) / (6144 ÷ 12) = 2052 / 512 = 4 1/128 पाषाण फल हस्त
उदा-श्लोक 92 में कहे उदाहरण को इस विधि से हल करने पर भी हम
पूर्वोक्त परिणाम प्राप्त करते हैं-
7/2 × 1/2 × 16/3 × 9/4 = 21 पाषाण फल हस्त
त्रिशतिका 147
करणसूत्रम्
प्राग्वत् क्षेत्रस्य फलं वृत्तत्र्यस्त्रादिदृषदि पिण्डघ्नम्।
घनगणितमतो दृषदः फलं भवेत् पूर्वकरणेन।। 57।।
सुक्षेमा अनुवाद-वृत्त तथा त्र्यस्र या त्रिभुज का क्षेत्रफल पूर्वोक्त के समान
होता है। इस क्षेत्रफल में पिण्ड की ऊँचाई से पूर्वोक्त रीति से गुणन करने पर दृषत्
या प्रस्तर पिण्ड का घन गणित अथवा उसका आयतन प्राप्त होता है।
अनुशीलन-पूर्वोक्त श्लोक 43 में त्रिभुज का क्षेत्रफल तथा श्लोक 45 में
वृत्त के क्षेत्रफल की विधि बताई जा चुकी है। इसमें केवल ऊँचाई को गुणित करने
पर घन का या लम्ब वृत्तीय बेलन आकार के पिण्ड का घनफल का यह सूत्र
होगा-
पिण्ड का आयतन = आधार (वृत्त, त्रिभुज, चतुर्भुज आदि) का क्षेत्रफल
× ऊँचाई
उदाहरणम्
दशहस्तविस्तारे वृत्ते यदि वेत्सि गणक पाषाणे।
अध्यर्धहस्तपिण्डे गणयित्वा घनफलं कथय।। 94।।
न्यासः व्यासः 10 पिण्डः 3/2 लब्धं क्षेत्रफलम् 79 1/20 घनफलं हस्ता 118
भागाश्च 23/40 अतः पाषाणफलं हस्ताः 266 भागाश्च 127/160। एवं पाषाणत्र्यस्त्रादिष्वपि।
इति खातव्यवहारः।
सुक्षेमा अनुवाद-हे गणितज्ञ, 10 हाथ विस्तृत व्यास वाले तथा 1 ½ या 3/2
ऊँचाई वाले वृत्तीय बेलनाकार प्रस्तर-पिण्ड का घनफल गणना करके बताओ।
अनुशीलन-यहाँ पूर्वोक्त वृत्त के क्षेत्रफल के सूत्र-
⇒ 3.162 × (व्यास² / 4) के अनुसार इस पिण्ड के आधार का क्षेत्रफल-
(3.162 × 100) / 4 = 79 1/20 या 1581 / 20
पूर्वोक्त सूत्रानुसार इसका घनफल-
(1581 × 3/2) / 20 = 4743 / 40 = 118 23/40 घन हस्त
148 त्रिशतिका
पूर्वोक्तानुसार इसका पाषाणफलहस्त—
(4743 × 9/2) / 40 = 42687 / 160 = 266 127/160 पाषाण फलहस्त
चितौ सूत्रम्
चयने क्षेत्रस्य फलं समुच्छ्रयेणाहतं चितेर्भवति।
गणितं तदिष्टकायाः फलेन हृतमिष्टकासंख्या।। 58।।
सुक्षेमा अनुवाद—चिति के क्षेत्रफल को उसके समुच्छ्रय या ऊँचाई से गुणा
करने पर चिति का घनफल होता है। इस घनफल को इष्टका के घनफल से
विभाजित करने पर ईंटों की संख्या ज्ञात होती है।
उदाहरणम्
चतुरस्रायतवेदी चितेष्टकाभिः षडंगुलोन्नतिभिः।
हस्तार्धविस्तराभिः करदैर्ध्याभिर्भवेत् तस्याः।। 95।।
विस्तारे हस्तत्रयमायामे षट् समुच्छ्रये त्वर्धम्।
किं घनगणितं विद्वन् प्रकथय का चेष्टका संख्या।। 96।।
न्यासः इष्टकान्यासः
[न्यास रेखाचित्र: वेदी — विस्तार 3, आयाम 6, ऊँचाई 1/2] [इष्टकान्यास रेखाचित्र: ईंट — विस्तार 1/2, आयाम 1, ऊँचाई 1/4]
लब्धं वेदीघनहस्ताः 9। इष्टकानां घनफलम् 1/8 इष्टकासंख्या 72। एवं वृत्त-
त्र्यस्रादिचयनेष्वपि घनफलमिष्टकाश्च साधयेत्।
सुक्षेमा अनुवाद—कोई चतुष्कोण आयत वेदि जो 1 हाथ लम्बी 6 अंगुल
ऊँची या 6/24 अर्थात् 1/4 हाथ ऊँची तथा 1/2 हाथ चौड़ी ईंटों से चुनी गई है तथा जो
चौड़ाई में 3 हाथ, लम्बाई में 6 तथा ऊँचाई में 1/2 हाथ है, उस वेदि का घनफल तथा
उसकी ईंटों की संख्या क्या होगी।
अनुशीलन—यहाँ घनाभ के आयतन के सूत्र ⇒ लम्बाई × चौड़ाई × ऊँचाई
के अनुसार वेदि का घनफल—
3 × 6 × 1/2 = 18/2 = 9 हस्त³
इसी सूत्र के अनुसार ईंटों का घनफल—
त्रिशतिका 149
1 × ½ × ¼ = ⅛ हस्त³
ईंटों की संख्या-
9 ÷ ⅛ या 9 × 8 = 72 ईंटें।
उदाहरणम्
कुण्डे द्विहस्तविस्तरदशकरदैर्घ्ये चतुष्करोच्छ्राये।
वित्तं प्रदीयते किं कर्मकराणां सखे तत्र।। 97।।
हस्तद्वयविस्तारं दलयुतहस्तत्रयायतं कुण्डम्।
सार्धं त्रिकरोच्छ्रायं क्रियते चैकेन रूपेण।। 98।।
न्यासः [चित्र: विस्तार 2, दैर्घ्य 10, उच्छ्राय 4] लब्धं घनहस्ताः 80
पुनर्न्यासः [चित्र: विस्तार 2, दैर्घ्य 3½, उच्छ्राय 3½] लब्धं घनहस्ताः 24½
अथ त्रैराशिकम्
यद्येतावन्तो 24½ हस्ता रूपेण क्रियन्ते तदैतावन्तो 80 हस्ताः कियद्भिः क्रियन्त
इति लब्धं रूपाणि 3, भागश्च 13/49।। इति चितिव्यवहारः।
सुक्षेमा अनुवाद-हे मित्र, 2 हाथ चौड़े, 10 हाथ लम्बे तथा 4 हाथ ऊँचे
कुण्ड को बनाने के लिये कारीगरों को कितनी मजदूरी देनी होगी, यदि 2 हाथ
चौड़े, 3½ या 7/2 हाथ लम्बे तथा 7/2 हाथ ऊँचे कुण्ड के लिये 1 रूप मजदूरी दी जाती
है।
अनुशीलन-इसके लिये पहले दोनों प्रकार के कुण्डों के घन हस्त प्राप्त
करते हैं-
2 × 10 × 4 = 80 घन हस्त का प्रथम कुण्ड।
2 × 7/2 × 7/2 = 24½ घन हस्त का दूसरा कुण्ड।
150 त्रिशतिका
अब पूर्वोक्त त्रैराशिक या ऐकिक नियम के अनुसार–
यदि 24½ हस्त³ के कुण्ड की मजदूरी 1 रूप
तो 1 हस्त³ ,, ,, ,, 1 × 2/49 रूप
तो 80 हस्त³ ,, ,, ,, 80 × 2/49 = 3 13/49 रूप
काष्ठव्यवहारे सूत्रम्
पिण्डायामांगुलवधराशौ काष्ठस्य मार्गसंगुणिते।
द्विगुणद्वादशवर्गेणोर्ध्वच्छेदे फलं भक्ते॥ ५९॥
क्रकचक्षेत्रस्य फलं मार्गाहितमंगुलात्मकं विभजेत्।
षड्गुणचतुष्ककृत्या तिर्यक् छेदे फलं हस्ताः॥ 60॥
सुक्षेमा अनुवाद–कोई काष्ठ पिण्ड, जिसका अंगुल में वर्गफल प्राप्त किया
गया है, उस फल को दारण मार्ग की संख्या से संगुणित करके 12 के द्विगुणित
अर्थात् 24 के वर्ग अर्थात् 576 से विभाजित करने पर सम्पूर्ण काष्ठपिण्ड का हस्त
में वर्गफल प्राप्त होता है।
एक क्रकच या चीरी हुई लकड़ी के क्षेत्रफल को दारण मार्ग से संगुणित
करने से अंगुलात्मक वर्गफल निकलता है। उसे 6 × 4 = 24 के वर्ग अर्थात् 576
से विभाजित करने से सम्पूर्ण का हस्त में वर्गफल प्राप्त होता है।
अनुशीलन–इन श्लोकों में चीरी हुई लकड़ी के क्षेत्रफल का निरूपण
किया गया है। किसी लकड़ी को चीर कर समान लम्बाई चौड़ाई के अनेक पटरे
प्राप्त किये जा सकते हैं। ऐसे किसी पटरे की अंगुल में लम्बाई तथा चौड़ाई प्राप्त
करके उन दोनों को गुणित करने से अंगुल में क्षेत्रफल या वर्ग अंगुल प्राप्त होगा।
इस क्षेत्रफल को समान पटरों की कुल संख्या से गुणित करने पर सभी पटरों का
वर्ग अंगुल प्राप्त होगा।
प्राचीन गणित में 24 अंगुल का एक हस्त माना गया है। अतः 24² = 576
वर्ग अंगुल एक वर्ग हस्त के बराबर है। अतः सभी पटरों के वर्ग अंगुल में प्राप्त
क्षेत्रफल को 576 से विभाजित करने पर उन सभी पटरों का वर्ग हस्त में क्षेत्रफल
प्राप्त हो जावेगा।
उदाहरणम्
द्वादशहस्तायामे खादिरकाष्ठे करार्धदलपिण्डे।
मार्गेषु पञ्चसु भवेदूध्र्वच्छेदे कियद् गणितम्॥ 99॥
त्रिशतिका 151
न्यासः [चित्र]
आयामः 12। पिण्डः ¼ लब्धं काष्ठगणितं हस्ताः 15
सुक्षेमा अनुवाद-ऐसी खैर की लकड़ी, जिससे 12 हाथ लम्बे तथा ½ का
आधा अर्थात् ¼ हाथ चौड़े पटरे बनते हैं, इस लकड़ी को ऊपर से चीर कर इस
परिमाण के 5 पटरे तैयार किये गए हैं। इनका गणित या कुल क्षेत्रफल क्या होगा।
अनुशीलन-इसके प्रत्येक पटरे का क्षेत्रफल-
12 × ¼ = 12/4 = 3 वर्ग हस्त का एक पटरा
3 × 5 = 15 वर्ग हस्त के 5 पटरे
पिण्डेनैको हस्तः प्रपद्यते करशतं तु दैर्घ्येण।
षड्भिः खादिरदारोः पञ्च त्रिगुणाः कराः कियता।। 100।।
| 100
|
| 1 मार्गः 1। क्रकच गणितम् 100
अधुना त्रैराशिकम्
यदि खादिरकाष्ठहस्तशतं रूपैः षड्भिः प्रपद्यते तर्हि पञ्चदश कराः कियता
प्रपद्यन्ते 100। 6। 15। लब्धं रूपभागाः 9/10
सुक्षेमा अनुवाद-किसी चिरी हुई लकड़ी के पटरे की चौड़ाई 1 हाथ तथा
लम्बाई 100 हाथ है, तो इसका क्षेत्रफल क्या होगा।
ऐसे 100 वर्ग हस्त की लकड़ी के पटरे का मूल्य 6 रूप है तो 15 वर्ग हस्त
का पटरा कितने मूल्य में प्राप्त होगा।
अनुशीलन-पटरे का क्षेत्रफल = 1 × 100 = 100 वर्ग हस्त मूल्य प्राप्त
करने के लिये ऐकिक नियम-
100 वर्ग हस्त काष्ठ का मूल्य 6 रूप
1 ,, ,, ,, ,, 6/100
15 ,, ,, ,, ,, 6/100 × 15 = 90/100 = 9/10 रूप
अथवा समानुपात के नियम से समीकरण द्वारा-
152 त्रिशतिका
100 : 6 :: 15 : x
100x = 15 × 6
x = 15/100 × 6 = 9/10
पुनरुदाहरणम्
वृत्तस्य खदिरदारोः करविस्तारस्य दशसु मार्गेषु।
तिर्यक्छेदे गणितं करात्मकं किं भवेत् कथय।। 101।।
न्यासः [वृत्तम्: व्यासः = 24]
मार्गाः 10 अत्र व्यासार्धवर्गवर्गादित्यादिना दशशतगुणनादिकर्मणा लब्धं क्षेत्रफलम्
455 9/25 एतन्मार्गगुणं षड्गुणचतुष्ककृत्या विभज्य लब्धं हस्ताः 7 163/180 पूर्ववदनुपातेन
करपत्रैकस्य च पाटने रूपभागाः 1423/3000 एवमन्यकाष्ठेष्वपि। इति काष्ठव्यवहारः।
सुक्षेमा अनुवाद-कोई वृत्ताकार खैर की लकड़ी, जिसका व्यास 1 हाथ या
24 अंगुल है तथा जिसे 10 मार्ग में चीरा गया है, उसका क्षेत्रफल तथा सभी पटरों
का वर्ग हस्त में गणित या क्षेत्रफल क्या होगा।
अनुशीलन-यहाँ पूर्वोक्त श्लोक 45 द्वारा वृत्त के क्षेत्रफल का मूल सूत्र-
√[10 (व्यास / 2)⁴]
√[10 (24/2)⁴] ⇒ √[10 × (12)⁴]
⇒ √207360 ⇒ 455 36/100
⇒ 455 9/25 वर्ग अंगुल लकड़ी का क्षेत्रफल
उक्त क्षेत्रफल वाले 10 पटरे प्राप्त किये गए हैं। अतः सभी पटरों का कुल
क्षेत्रफल-
(11384 × 10) / 25 = 113840 / 25 वर्ग अंगुल
इसका वर्ग हस्त प्राप्त करने के लिए 24 × 24 = 576 से भाग-
113840 / (25 × 576) = 113840 / 14400 = 7 1304/1440 ÷ 8/8 = 7 163/180