त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिशातिका 141
सुक्षेमा अनुवाद-मुख के व्यास का वर्ग, तल के व्यास का वर्ग तथा इन
दोनों के व्यास का वर्ग--इन्हें परस्पर संयुक्त करके इनका वर्ग प्राप्त करें तथा 10
से गुणित करें। इस सम्पूर्ण का वर्गमूल प्राप्त करें। इसे इसकी ऊँचाई से गुणित करें
तथा 24 से विभाजित करें। इससे कूप का घनफल प्राप्त होता है।
अनुशीलन-इस सूत्र में विषम खात कूप अथवा अपूर्ण शंकु के आयतन
(volume of frustrum of a cone) का सूत्र प्रदान किया गया है।
श्लोक में उल्लिखित संक्रियाओं से इसके लिये हमें यह सूत्र प्राप्त होता
है–
अपूर्ण शंकु का आयतन = ऊँचाई √10 {व्यास²₁ +व्यास²₂ +(व्यास₁ + व्यास₂)²}²
───────────────────────────────────
24
⇒ √10 × ऊँचाई {व्यास²₁ + व्यास²₂ + (व्यास₁ + व्यास₂)²}
───────────────────────────────────────────────────
24
इसे इस प्रकार भी लिख सकते हैं–
ऊँचाई ⎧ (√10 × व्यास²₁) (√10 × व्यास²₂) {√10 (व्यास₁ + व्यास₂)²} ⎫
───── ⎨ ─────────────── + ─────────────── + ──────────────────────── ⎬
6 ⎩ 4 4 4 ⎭
इस सूत्र के कोष्ठक का प्रत्येक उपबन्ध 'वृत्त के क्षेत्रफल' के समकक्ष है।
अतः इस सूत्र को इस प्रकार भी लिख सकते हैं–
विषमखात कूप या अपूर्ण शंकु का आयतन =
(मुखज क्षेत्रफल + तलज क्षेत्रफल + युतिज क्षेत्रफल) ऊँचाई
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भास्कराचार्य ने इस रूप में सूत्र को स्वीकार करते हुए इसका उपयोग
विषमखात घनाभ के आयतन (Volume of frustrum of a pyramid) को जानने
के लिये किया है।¹ जिस पिण्ड का आधार आयत हो तथा ऊपर क्रमशः सूच्याकार
हो वह पिरामिड है। जो आधार वृत्ताकार रखते हुए क्रमशः सूच्याकार को धारण
करे वह शंकु है।
त्रिशतिकाकार ने आगे श्लोक 61 में ऐसे पूर्ण शंकु के आयतन के लिये