त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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इस औसत से स्थूल घनफल ज्ञात होता है। क्योंकि अलग-अलग गहराई
का क्षेत्रफल सुनिश्चित नहीं है। स्पष्टतः अलग-अलग क्षेत्रफलों को गहराई से
गुणित करने पर अलग-अलग परिणाम प्राप्त होगा। सर्वथा सही घनफल के लिये
अलग-अलग गहराई वाले घनाभ का अलग-अलग आयतन प्राप्त करके उन तीनों
का जोड़ करना होगा।
अन्यदुदाहरणम्
त्रिचतुःपञ्चकहस्ताः पृथुता विषमात् तु यस्य खातस्य।
अष्टौ हस्ता वेधो द्वादश दैर्घ्ये कथय फलम्॥ 88॥
न्यासः।। 3। 4। 5।। 8 दैर्घ्य 12 खाते लब्धं फलम् 384
सुक्षेमा अनुवाद-जो खात या गहरा पिण्ड पृथुता या चौड़ाई में कहीं 3,
कहीं 4 तथा कहीं 5 हाथ वाला है। वह दैर्घ्य या लम्बाई में 12 हाथ है तथा 8 हाथ
गहरा है। उस घन का फल या आयतन क्या होगा।
अनुशीलन-इस हौज का केवल लम्बाई, चौड़ाई का चित्र इस प्रकार
होगा-
[चित्र] नापियाँ निर्दिष्ट संख्याओं का ½
सेंटीमीटर हैं।
यहाँ CD → 3, BE → 4, तथा AF की चौड़ाई 5 हाथ है। अतः उपर्युक्त
संक्रिया अनुसार औसत निकालते हुए-
((3 + 4 + 5) / 3) × 12 × 8 = 4 × 12 × 8 = 384
यहाँ बिन्दु अंकित रेखाओं द्वारा समकोण त्रिभुज प्राप्त किया गया है। इससे
हम एक घनाभ तथा एक त्रिभुज प्राप्त करते हैं। इन दोनों के अलग-अलग
आयतन को जोड़कर भी हम वही परिणाम पाते हैं-