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त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 208 में से

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पृष्ठ 162

134 त्रिशतिका
स्पष्टतः श्लोक 50 में शीर्षलम्ब की यही विधि उल्लिखित है।
उदाहरण के लिये द्वितीय चित्र के △ ADF त्रिभुज का श्लोक 43 के
‘भुजयुतिदलं चतुर्धा...’ की विधि से पहले क्षेत्रफल ज्ञात करते हैं–
द्वितीय चित्र में ADF का क्षेत्रफल = √21×8×7×6 = √7056 = 84
अब प्रस्तुत श्लोक 50 की विधि से इसका शीर्षलम्ब–
ADF का शीर्षलम्ब = (2×84)/14 = 168/14 = 12
इस लम्ब को यहाँ कोटि कहा गया है। इस कोटि से विभक्त की गई
आधार भुजा→5 मात्रा के AB तथा 9 मात्रा के EF को यहाँ ‘अवधा’ कहा गया
है। साथ ही ADB त्रिभुज की पार्श्व भुजा AD 13 मात्रा का कर्ण है। तथा BDF
त्रिभुज की पार्श्वभुजा F D 15 मात्रा का कर्ण है।
आगे 51वें सूत्र में त्रिभुज की भुजाओं में सहसम्बन्ध प्रकट करते हुए इनके
परिमाण के सूत्र बताए हैं। तदनुसार–
कोटि या लम्ब = √कर्ण²–भुज² या आधार²
भुज या आधार = √कर्ण² – कोटि² या लम्ब²
कर्ण = √लम्ब² + आधार²
यहां कर्ण के सूत्र को उपरिलिखित उदाहरण में अन्वित करने पर इसका
मान क्रमशः 13 तथा 15 प्राप्त होता है–
ADB का कर्ण = √12²+5² ⇒ √144+25 ⇒ √169 = 13
BDF का कर्ण = √12²+9² ⇒ √144+81 ⇒ √225 = 15
इन कर्ण, कोटि, आधार में से किन्हीं दो के परिज्ञान होने पर समीकरण
द्वारा तीसरे का आसानी से पता लगाया जा सकता है। अतः व्याख्या में कर्ण के
वर्ग से लम्ब के वर्ग को घटाकर वर्गमूल लेकर दोनों त्रिभुजों की अलगर आधार
भुज या अवधा ज्ञात की गई है–
√13²+12² ⇒ √169+144 ⇒ √25 = 5
अथवा √15²+12² ⇒ √225+144 ⇒ √81 = 9
यहाँ इसका स्पष्ट निरूपण बहुत आवश्यक है कि यह नियम केवल
समकोण त्रिभुज में लागू होता है।