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सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 208 में से

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पृष्ठ 161

त्रिशातिका 133
पं. सुधाकर द्विवेदी द्वारा सम्पादित ग्रन्थ में व्याख्या के द्वितीय, तृतीय चित्र
में कर्ण का मान 16 तथा सम्पूर्ण भुज या आधार का 15 दिखाया है, जो कि
गणित के अनुसार ठीक नहीं है। कर्ण का मान 15 तथा आधार का मान 9+5=14
होना चाहिए। मूल ग्रन्थ में ऐसा ही है। इसे प्रकट करने के लिये 'गणित का
इतिहास' ग्रन्थ में उद्धृत तथा जिन एण्ड कम्पनी की अनुमति से डेविड यूजीन
स्मिथ कृत History of mathematics से प्रत्युत्पादित मूल ग्रन्थ की छाया प्रति
को प्रस्तुत करते हैं। यह प्रस्तुत व्याख्या के 'लब्धो मध्यलम्बः 12। एष एव
कोटिः' इसके आगे लिखी गई है। दूसरी, तीसरी लाइन में कर्ण का मान 15 तथा
आधार का मान 14 लिखा है। इस आधार पर हमने अपनी व्याख्या में यही मान
उल्लिखित किया है।
•श्लो•क• लब्धो मध्यलम्बः। १२। एष एव कोटिः १२ तं च निपाते भुज-द्वयस्य उभयतो भुजः। कर्णश्चतुस्त्रा रू कर्णः। लंचे लंबण्या
१५ अत्र कोटिः १२। अस्य व्याः कृतिः १४४। कर्णयोस्तयोः १२/१५। पृथक् पृथक्
विस्रशेषशेषमेषं तानु नान्यो अन्यथोपचार। सत्र दर्शनात् ५। ९। यद्भूजत्र
र्गेणोनोपाः रू से हृदयं मूलं। कोटिः रूपेण गोनोपाः क र्सक नेर्मूलं ते भुजः। भुजका र्ण द्री त्रिन्त्रिषुटि
मूलं क र्सः। एवमन्यो भुजु षुतुषेषु त्रिभुजसने न्तेन मानयेत्। अत्ले चैवमुदहोः अर्मसः। ॐ। इततान्युव
हाय्टर ल द्यू सभावीद् थी। ९ फरि एषां रिवा त्फ लानयनप्रकारं एवमभावी दृथी। पुस्तल मवैर
पुना रिथैवा ारत प्रभाव नद्वियमोवं - हा विशेषमुतिं याभ्याप मजे हि समपादैः। एभिस्त्रिद्वारे
र्वैरिवैर्व धंस म भोनै फलं भवति। त्वा ते पम् भुजेवे पे षङ् इत्तनायने नैलितं। उदाहरणादिदि १५
क ५ क्षते पु क र्षे ली पं वह ख्विज्जारा वरूद्रा इदा पात्रा रात कतंक याना भी मु। न्यासः। ३। ३। ४। ५।
नईव तंह ९०। २४०। यमद्विगुतः क एरशपार सुतात लड ५० व्य पान व्यारदै। वा वाः क्षवारी व भ्रे
रशौन म्युकिं तलितां स्फानः। १० लब्ध लिन हत्याः १२ २४३। प म व भुद्रे वाने वो १२ अ हस्ता भुनाः
वा देवव्या। वह्मेश वि षोडशी प म रू ष्पतां कं गल्फितां न्धुभः। १६। १९। ल ब्हं र्याः ४०२४। रूप
ष्टफलानयन नायक एवमभावी मुखवल नह्वो गानी वाणी क्य के नेः परि दरणपूगायाः। व
धं गुणं चतुरन्वित त्रिंशत् त्रिं कें फलंक्तु पे उदाहरणं। रूप या मुस्त गोप्यो पार ३२ ह पा स्ना लेखेद्र
चातः। ३ रा दश विह त्यु ता नफलं किं प्रभा वस्त्या न्यासः १६ ते कां क किक सं० ४ ५ १५ ४ ७। यम्
स्वरत होः मूलानयनोपल। ८०। एव्पूत्र त्राणी । भाष् १२ लद् स्यात तस्य वर्गला क नद्विस्य
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०६३। ६ प्र भाग स्पाद दृशो न १२ वर्ष प ५ प श्चह त्ति दि ष्पूिर्दे वेन् सृवन् ३० नाति येष्टेन वेनगु
श्लोक 50 में त्रिभुज के क्षेत्रफल द्वारा इसके शीर्षलम्ब ज्ञात करने की
विधि बताई गई है। यह विधि श्लोक 43 में उल्लिखित 'कुदलं च लम्बहतम्' सूत्र
में त्रिभुज के क्षेत्रफल ज्ञात करने की विधि पर समीकरण के प्रयोग से प्रकट है-
त्रिभुज का क्षेत्रफल = आधार × शीर्षलम्ब / 2
त्रिभुज का शीर्षलम्ब = (2 × क्षेत्रफल) / आधार