त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिशतिका 135
इस प्रकार इस सूत्र से हमें आधार, लम्ब तथा कर्ण वाले त्रिक प्राप्त होते
हैं-
9 - 12 - 15
5 - 12 - 13
यह सूत्र सर्वव्यापी है। अतः इन संख्याओं के अनुपात में आने वाली किसी
भी त्रिक में यह सूत्र लागू होता है। इस प्रकार किसी भी समकोण त्रिभुज में वे
संख्याएँ होती हैं, जो उपरिलिखित त्रिक के अनुपात में होती हैं। अथवा विलोमतः,
इन संख्याओं के अनुपात में आने वाला कोई भी त्रिक समकोण त्रिभुज का निर्माण
करता है। अतः ये सभी त्रिक इसके लिये सत्य हैं। उदाहरणतः-
9 -12 -15 त्रिक का-
½ गुना ⇒ 4.5 . 6 . 7.5 क्योंकि √20.25 + 36 = 7.5
⅓ ,, ⇒ 3 . 4 . 5 ,, √9 + 16 = 5
¼ ,, ⇒ 2.25. 3 . 3.75 ,, √5.0625 + 9 = 3.75
5.12.13 का त्रिक का-
½ ,, ⇒ 2.5 . 6 . 6.5 ,, √6.25 + 36 = 6.5
¼ ,, ⇒ 1.25. 3 . 3.25 ,, √1.5625 + 9 = 3.25
इस प्रकार किसी भी त्रिक से समानुपातिक गुणा या भाग द्वारा अनन्त त्रिक
प्राप्त किये जा सकते हैं। इनके सर्वप्रथम अनेक उदाहरण 500 B.C. या इससे भी
पूर्व निर्मित बौधायन शुल्ब सूत्र आदि में प्राप्त होते हैं। इसमें उपरिलिखित द्वितीय
त्रिक का स्पष्ट उल्लेख है¹। इसका इस प्रकार नाम दे सकते हैं-
a b c
5 12 13
इस त्रिक की एक विशेषता यह है कि इसके b तथा c का जोड़ तथा घटाव
दोनों किसी पूर्ण संख्या के वर्ग बनते हैं तथा इनका वर्गमूल कोई विषम संख्या
होती है तथा इन विषम संख्याओं का गुणनफल a संख्या होती है। इस समीकरण
को सिद्ध करने पर सार्वत्रिक परिणाम प्राप्त होता है कि यदि a किन्हीं दो विषम
संख्याओं (m n) का गुणनफल हो, या a = m n हो तो-
b = m² - n² तथा c = m² + n²
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१. तासां त्रिकचतुष्कयोर्द्वादशपञ्चिकयोः ......इत्येतासूपलब्धिः। - बौ.शु.सू. 1.49