त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 165, कुल 208 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिशतिका 137
श्रीधराचार्य ने त्रिभुज की भुजाओं में सहसम्बन्ध तथा प्रमाण को प्रकट
करने वाला यह सूत्र मूलतः ब्रह्मगुप्त से प्राप्त किया है-
कर्णकृतेः कोटिकृतिर्विशोध्य मूलं भुजो, भुजस्य कृतिम्।
प्रोह्यं पदं कोटिः, कोटिबाहुकृतियुतिपदं कर्णः॥
—ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त १२.२४
स्पष्टतः श्रीधर के भाव तथा भाषा भी इसके समान है। आधुनिक गणित
में इसे पाइथोगोरस प्रमेय कहने की परम्परा है। पर यह उल्लेख बहुत जरूरी है
कि पाइथोगोरस से भी पहले ईसा पूर्व ५वीं शताब्दी या इससे भी पूर्व निर्मित
बौधायन शुल्व सूत्र में इस प्रमेय को किसी आयत में वर्ग के माध्यम से प्रकट
किया गया था-
दीर्घचतुरस्रस्याक्ष्णया रज्जुः पार्श्वमानी तिर्यङ्ग्मानी
च यत् पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति।—बौधायन शु.सू. १.४८
अर्थात् किसी आयत की भुजाएँ जितने अलग्र प्रमाण का वर्ग बनाती हैं,
उन पर खींचा गया विकर्ण उनके योगफल जितना वर्ग क्षेत्रफल बनाता है। इस
प्रकार—
क्योंकि विकर्ण पर वर्ग = a² + b²
अतः उस वर्ग की विकर्ण नामक एक भुजा = √(a² + b²)
शुल्ब सूत्रों में इस उपाय से कर्ण के प्रमाण को जानने का सफल प्रयास
किया गया था।
खातव्यवहारे करणसूत्रम्
मुखतलमध्ये पृथुतादैर्घ्ये वा चेत् प्रजायते विषमम्।
वेधे वा विषमयुतिं साम्याय भजेत् विषमपदैः॥ 52॥
समविस्तरहतदैर्घ्ये वेधेन समाहते फलं भवति।
खाते समभुजवेधे बाहुघनो जायते गणितम्॥ 53॥
सुक्षेमा अनुवाद-मुख, तल तथा मध्य में पृथुता = चौड़ाई, दैर्घ्य = लम्बाई
या वेध = गहराई के विषम होने पर विषम खात होता है। उसे समखात बनाने के
लिये उन विषम संख्याओं को जोड़कर उन्हें विषम संख्या के पद से विभाजित
करना चाहिए। (इससे औसत मान प्राप्त होता है।)॥ 52॥
विस्तर = चौड़ाई, दैर्घ्य = लम्बाई तथा वेध = गहराई के सम होने पर तीनों
को परस्पर गुणित करने पर घनफल प्राप्त होता है तथा ऐसा कोई खात या गहरा