त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
त्रिशतिका 121
क्षेत्रविशेषेषु सूत्रम्
त्रिभुजं गजदन्ताकृति नेम्याकारं चतुर्भुजं क्षेत्रम्।
बालेन्दौ त्रिभुजे द्वे वज्रे च चतुर्भुजद्वितयम्¹।। 44।।
सुषेमा अनुवाद-हाथी के दाँत की आकृति का त्रिभुज तथा नेमि या
आयताकार का चतुर्भुज क्षेत्र बनता है। बालेन्दु के आकार में दो त्रिभुज तथा वज्र
के आकार में दो चतुर्भुज बनते हैं।
अनुशीलन-हाथी दाँत के आकार की खूँटी बनती है। इस त्रिभुज के
आधार से खींची गई लम्ब रेखा समकोण बनाती है। नेम्याकार आयत चतुर्भुज ऐसा
समान्तर चतुर्भुज है जिसका कोई एक कोण समकोण होता है। इनका उदाहरण
आगे दिया जा रहा है-
उदाहरणम्
गजदन्ते त्रिकरधरे दशकरलम्बे भवेत् कियद् गणितम्।
नेम्याकृतिनि क्षेत्रे त्रिकरधरे पञ्चलम्बे च²।। 82।।
10 5
न्यास 3 [त्रिभुज] 3 [आयत] लब्धं फलम् १५।१५।।
सुषेमा अनुवाद-हाथी के दाँत के आकार का वह त्रिभुज जिसकी
आधारित भुजा 3 हाथ तथा लम्ब 10 हाथ हो, उसका क्षेत्रफल क्या होगा। साथ
ही नेमि या आयत चतुर्भुज वाला क्षेत्र, जिसका आधार 3 हाथ तथा लम्ब भुजा 5
हाथ हो। उसका क्षेत्रफल कितना होगा।
अनुशीलन-पूर्वोक्त सूत्र के अनुसार क्षेत्रफल स्पष्ट है-
३/२ × 10 = ३०/२ = 15 त्रिभुज का क्षेत्रफल
3 × 5 = 15 चतुर्भुज का क्षेत्रफल
द्वितीयोदाहरणम्
मध्यायामः षोडश बालेन्दौ मध्यविस्तरस्त्रिकरः।
त्रिभुजद्वयकल्पनया गणितं किं तत्र कथमाशु³।। 83।।
१. तुल. पाटी-गणित सू. 116, म.सि. 15.101, ग.कौ.पृ. 10
२. तुल. पाटी-गणित उदा. 131
३. तुल. पाटी-गणित उदा. 132
122 त्रिशतिका
3
16
न्यासः।। अत्र त्रिभुजद्वयम्। लब्धं फलम् 24
सुक्षेमा अनुवाद-वह बालेन्दु अर्थात् छोटा दो या तीन कलाओं वाला
चन्द्रमा, जिसके मध्य की लम्बाई 16 हाथ तथा बीच की चौड़ाई 3 हाथ है, यदि
इसे दो त्रिभुज से निर्मित प्रकल्पित किया जाय तो इनका क्षेत्रफल शीघ्र बताओ।
अनुशीलन-प्रस्तुत उदाहरण में बाल-चन्द्र का आकार बदल कर उपरिलिखित
चित्रानुसार १६ हाथ लम्बे तथा डेढ़-डेढ़ हाथ चौड़े दो त्रिभुज का रूप दे दिया
गया है।
पूर्व उल्लिखित सूत्रानुसार इन त्रिभुजों का क्षेत्रफल-
प्रथम त्रिभुज का क्षेत्रफल = ३/२ × १/२ × 16 = 48/4 = 12
द्वितीय त्रिभुज का क्षेत्रफल = ३/२ × १/२ × 16 = 48/4 = 12
दोनों त्रिभुजों से निर्मित बड़े त्रिभुज का क्षेत्रफल⇒12+12=24 वर्ग हस्त
तृतीयोदाहरणम्
वज्राकृतिनि क्षेत्रे भूवदने पञ्चहस्तके मध्ये।
विस्तारो हस्तत्रयमथ लम्बोऽष्टौ कियद् गणितम्।। 84।।
5
8
न्यासः।। अत्र चतुरस्रद्वयम्। 3 लब्धं फलम् 32
सुक्षेमा अनुवाद-वज्र की आकृति वाला क्षेत्र जिसके भू अर्थात् आधार-भुजा
तथा वदन या मुख अर्थात् ऊपर की भुजा 5-5 हाथ है तथा मध्य में 3 हाथ का
विस्तार है तथा जिस पर 8 हाथ का शीर्ष लम्ब है, यदि वह दो चतुर्भुज से निर्मित
मानी जावे१ तो उसका क्षेत्रफल क्या होगा।
१. 'कियत् फलं तस्य द्विचतुरश्रात्' पाटी-गणित सूत्र 133 के तुलनीय उद्धरण के अनुसार।
त्रिशतिका 123
संख्याओं के अनुरूप चित्र इस प्रकार है-
[चित्र: समलम्ब चतुर्भुज युग्म: ऊपर 5 b₁, शीर्षलम्ब 8, मध्य भुजा 3, शीर्षलम्ब 8, नीचे 5 b₂]
भुजाएँ चित्र में अंकित संख्या से 5 गुना मिलीमीटर हैं।
इस आकृति में दो चतुर्भुज प्राप्त होते हैं। दोनों का क्षेत्रफल 32-32 वर्ग हाथ
है। ऊपर वाले चतुर्भुज की ऊपर वाली भुजा 5 तथा नीचे की भुजा 3 हाथ है। नीचे
वाले में ऊपर वाली भुजा 3 तथा नीचे की भुजा 5 हाथ है। दोनों में 8-8 हाथ का
शीर्ष लम्ब है।
यह समलम्ब चतुर्भुज का उदाहरण है। अतः यहाँ श्लोक 42 में प्रोक्त सूत्र
लागू होता है-
समलम्ब का क्षेत्रफल = ½ (b¹ + b²) × शीर्षलम्ब (h)
इसके अनुसार ⇒ ½ (5 + 3) × 8 = 4 × 8 = 32 वर्ग हस्त
वाले दो चतुर्भुज
वृत्ते सूत्रम्
वृत्तव्यासस्य कृतेर्मूलं परिधिर्भवति दशगुणायाः।
व्यासार्धवर्गवर्गात् क्षेत्रफलं दशगुणान् मूलम्।। 45।।
सुक्षेमा अनुवाद-वृत्त के व्यास की कृति या वर्ग को 10 से गुणित करके
उस सम्पूर्ण का वर्गमूल परिधि होती है। व्यास के आधे के वर्ग के वर्ग को
दशगुणित करके उसका वर्गमूल करने से वृत्त का क्षेत्रफल प्राप्त होता है।
अनुशीलन-प्रस्तुत श्लोक में वृत्त की परिधि तथा उसके आधार पर
क्षेत्रफल ज्ञात करने का प्रकार बताया गया है। इसके अनुसार परिधि का सूत्र इस
प्रकार होगा-
परिधि = √(10 × व्यास²) अथवा व्यास × 3 ¹⁶/₁₀₀ या व्यास × ³¹⁶/₁₀₀
इसके अनुसार व्यास तथा परिधि का अनुपात यह होगा-
1 : √10 अथवा 1 : 3.16 - - - -
124 त्रिशतिका
त्रिशतिकाकार ने इस अनुपात का या π का यह मान स्वीकार किया है।
यद्यपि इनसे पूर्व आर्यभट इससे सूक्ष्म मान का वर्णन कर चुके थे। पर त्रिशतिकाकार
के पश्चात् काफी समय तक यह मान ही लोकप्रिय रहा। महावीराचार्य ने भी
त्रिशतिकाकार का ही अनुसरण किया है१। इस मान को मानते हुए उनके अनुसार
परिधि इस प्रकार है-
परिधि = √10 × व्यास
स्पष्टतः यह त्रिशतिकाकार के समतुल्य है।
त्रिशतिकाकार के अनुसार वृत्त का क्षेत्रफल = √[10 (व्यास / 2)⁴]
⇒ √10 × व्यास × व्यास / 4
अतः वृत्त का क्षेत्रफल ⇒ परिधि × व्यास / 4
अथवा √10 × व्यास² / 4 अथवा π × त्रिज्या²
त्रिशतिकाकार ने स्पष्टतः अन्तिम सूत्रों को नहीं कहा है। पर आगे चल कर
महावीर, भास्कराचार्य आदि ने स्पष्ट रूप से I सूत्र को२ तथा असाक्षात् रूप से
II सूत्र को प्रस्तुत किया है। इससे आधुनिक गणित में III सूत्र को विकसित किया
गया है। त्रिशतिकाकार के मूल सूत्र द्वारा भी आधुनिक गणित के सूत्र को आसानी
से प्राप्त करना सम्भव है।
उदाहरणम्
दशविष्कम्भे क्षेत्रे समवृत्ते कः प्रजायते परिधिः।
गणितं च कथय विद्वन् गणयित्वा यदि विजानासि।। 85।।
न्यासः
लब्धं परिधिरस्य मूलम् 1000
लब्धं क्षेत्रफलमस्य मूलम् 6250
१. वृत्तक्षेत्रव्यासो दशपदगुणितो भवेत् परिक्षेपः।
व्यासचतुर्भागगुणः परिधिः फलमर्धमर्धे तत्।। - गणित सारसंग्रह, क्षेत्रगणित व्यवहार, श्लोक 60
२. वृत्तक्षेत्रे परिधिगुणितव्यासपादः फलं तत्-लीलावती, क्षेत्रव्यवहार श्लोक ४१
त्रिशतिका 125
सुक्षेमा अनुवाद-किसी वृत्त में 10 विष्कम्भ या व्यास वाला क्षेत्र होने पर
उसकी परिधि क्या होगी। हे विद्वन्! अगर जानते हो तो उस वृत्त का क्षेत्रफल भी
बताओ।
अनुशीलन-उपरिलिखित नियमानुसार परिधि तथा क्षेत्रफल इस प्रकार है-
परिधि का सूत्र √(10 × व्यास²)
उदाहरण √(10 × 10²) = √1000
इस प्रकार 1000 का वर्गमूल ही परिधि है।
क्षेत्रफल का सूत्र √(10 (व्यास/2)⁴)
उदाहरण √(10 (10/2)⁴)
⇒ √(10× 5 × 5 × 5 × 5) = √6250
इस प्रकार इस 6250 का वर्गमूल क्षेत्रफल है।
अथामूलदराशेरासन्नमूलानयनम्
राशेरमूलदस्याहतस्य वर्गेण केनचिन्महता।
मूलं शेषेण विना विभजेद् गुणवर्गमूलेन।। 46।।
शतवर्गगुणनादिना लब्धः परिधिः 31³¹⁄₅₀ क्षेत्रफलम् 79¹⁄₂₀ ।।
सुक्षेमा अनुवाद-पूर्णांक में वर्गमूल प्रदान न करने वाली राशि का
(आसन्न मूल प्राप्त करने के लिये) उस राशि को किसी राशि के बड़े वर्ग से
गुणित करके उसका वर्गमूल प्राप्त करें। इसमें पूर्ण वर्गमूल के पश्चात् जो शेष
राशि बचे उसे छोड़ दें। अनन्तर पूर्ण वर्गमूल राशि को पूर्व में वर्ग के रूप में गुणित
राशि के वर्गमूल से विभाजित करें¹। इससे उस राशि का आसन्न वर्गमूल प्राप्त
होता है।
अनुशीलन-इस श्लोक में पूर्ण वर्गमूल प्रदान न करने वाली राशि का
समीपतम वर्गमूल प्राप्त करने की विधि बताई गई है। उपरिलिखित उदाहरण में
परिधि तथा क्षेत्रफल की दोनों संख्याओं का वर्गमूल पूर्णांक में नहीं है। अतः इस
विधि से इनका आसन्न वर्गमूल ज्ञात करते हैं-
१. गृहीतशिष्यतो मूलराशेरमूलदस्य सुव्यक्तमासन्नं मूलं ग्राह्यम्। यथा तस्य राशेः केनचिन्महता
वर्गेण हतस्य मूलविधिना मूलं गृहीत्वा शेषं त्यजेत्। प्राप्तं मूलं गुणवर्गमूलेन विभजेत्।–पाटी-गणित
टीका श्लोक ११८
126 त्रिशतिका
√1000 ज्ञात करने हेतु उक्त विध्यनुसार ⇒ 1000 × 100² = 10000000
पुनः : √10000000 = 3162 (अपूर्ण अंक को छोड़ दिया)
3162/100 = 31 72/100 = 31 31/50 परिधि
√6250 के लिये उक्त विध्यनुसार ⇒ 6250 × 20² = 2500000
√2500000 = 1581 (अपूर्ण अंक छोड़ कर)
1581/20 = 79 1/20 क्षेत्रफल
आसन्न वर्गमूल प्राप्त करने की इस विधि में जितनी बड़ी राशि के वर्ग से
गुणन करते हैं, उतना ही सूक्ष्म, सूक्ष्मतर परिणाम प्राप्त होता है।
चापसूत्रम्
जीवाशरैक्यदलहतशरस्य वर्गं दशाहतं नवभिः।
विभजेदवाप्तमूलं प्रजायते कार्मुकस्य फलम्॥ 47॥
सुक्षेमा अनुवाद-जीवा तथा शर को जोड़कर उसके आधे से शर को
गुणित करके उसके वर्ग को 10 से गुणित करे तथा 9 से विभाजित करे। पुनः
उसका वर्गमूल प्राप्त करे इससे कार्मुक या वृत्त-खण्ड का क्षेत्रफल प्राप्त होता है।
अनुशीलन-श्लोक के नियमानुसार किसी वृत्त-खण्ड या कार्मुक के क्षेत्रफल
का सूत्र इस प्रकार होगा-
वृत्त-खण्ड का क्षेत्रफल = √[ 10/9 { शर (जीवा + शर) / 2 }² ]
अथवा ⇒ (√10 / 3) × { शर (जीवा + शर) / 2 }
प्रस्तुत श्लोक में रेखागणित के अनेक पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग किया
गया है। उनकी परिभाषा इस प्रकार है-
चाप अथवा कार्मुक- यह किसी वृत्त का ऐसा वृत्त-खण्ड है, जिसे कोई
जीवा परिसीमित करती है। सामान्यतः लघु-वृत्तखण्ड को यह नाम दिया जाता है।
चाप तथा कार्मुक दोनों का मूल अर्थ धनुष है। लघु-वृत्त-खण्ड के धनुष का
आकार का बनने से प्राचीन गणित में इसके लिये दोनों नाम सार्थक हैं।
जीवा- वृत्त के किसी भी बिन्दु से खींची गई सरल रेखा जो अन्त में वृत्त
के ही किसी बिन्दु का स्पर्श करती हो, उसे जीवा (chord) कहते हैं।
त्रिशतिका 127
शर या बाण- जीवा के मध्य बिन्दु से होते हुए वृत्त के किसी बिन्दु को
स्पर्श करने वाले लम्ब को शर कहा जाता है।
प्रस्तुत सूत्र में जीवा तथा शर की लम्बाई के आधार पर उससे बनने वाले
लघु-वृत्त खण्ड के क्षेत्रफल को जानने का प्रकार बताया गया है।
उदाहरणम्
चापाकृतिनि क्षेत्रे त्रिहस्तबाणे त्रयोदशकरज्ये।
किं भवति फलं विद्वन् गणयित्वा कथय यदि वेत्सि॥ 86॥
न्यासः [चित्र: चापाकार क्षेत्र, शर/लम्ब = 3, जीवा = 13]
लब्धः फलवर्गः 640। अस्य मूलं शतवर्गगुणनादिना जातं फलं 25।
भागाश्च ²⁹/₁₀₀
सुक्षेमा अनुवाद-3 हाथ बाण या लम्ब वाले तथा 13 हाथ ज्या (जीवा)
वाले चाप या धनुष के आकार वाले क्षेत्र का क्या फल होगा। हे विद्वन् यदि जानते
हो तो गणना करके बताओ।
अनुशीलन-पूर्वोक्त सूत्रानुसार वृत्त-खण्ड का क्षेत्रफल
= √[ 10/9 { 3 (13 + 3) / 2 }² ] ⇒ √(10 × 24² / 9) = √(5760 / 9) = √640
⇒25.29 अथवा 25 ²⁹/₁₀₀ हाथ²
अथवा (√10 / 3) × 3 (13 + 3) / 2 ⇒ √10 × (48 / 6) ⇒ √10 × 8 ⇒ 25.29
प्रस्तुत सूत्र वृत्त के क्षेत्रफल द्वारा प्राप्त अर्ध-वृत्त के क्षेत्रफल के आधार पर
विकसित किया गया है। क्योंकि-
वृत्त का क्षेत्रफल = (√10 × व्यास²) / 4
अतः अर्धवृत्त का क्षेत्रफल = (√10 / 3) × [त्रिज्या (व्यास + त्रिज्या) / 2]
128 त्रिशतिका
यह π √10 मानने पर आधुनिक गणित के सर्वथा अनुरूप है-
√10 / 3 × त्रिज्या (व्यास + त्रिज्या) / 2 ⇒ √10×3 त्रिज्या² / (3 · 2) ⇒ √10 × त्रिज्या² / 2
यहां व्यास जीवा के समकक्ष है। क्योंकि व्यास वृत्त की सबसे बड़ी जीवा
होती है। साथ ही इस पर खींची गई त्रिज्या शर भी है। अतः अर्धवृत्त के क्षेत्रफल
के सूत्र के सन्दर्भ में क्रमशः जीवा और शर को रखने पर भी ठीक वही परिणाम
प्राप्त होता है।
श्रीधर ने प्रस्तुत सूत्र में परम्परा के अनुसार इस सूत्र का सामान्यीकरण
करते हुए प्रत्येक वृत्त-खण्ड के जीवा तथा शर के लिये यही सूत्र विकसित किया
है। यद्यपि अर्धवृत्त में व्यास तथा त्रिज्या तथा इस प्रकार जीवा और शर का जो
1 : ½ का अनुपात है, वह अन्य वृत्तखण्डों में लागू नहीं है। अतः अर्धवृत्त के सूत्र
को अन्य वृत्तखण्डों के लिये सामान्यीकृत करने पर सर्वथा सही परिणाम प्राप्त नहीं
हो सकता। श्रीधर आर्यभट के सूत्र¹ पर समीकरण द्वारा अन्य वृत्त-खण्डों में जीवा
तथा शर के सही अनुपात को भली भाँति जानते थे। अतः उन्होंने प्रस्तुत उदाहरण
में १३ जीवा के साथ ३ शर का बिल्कुल सही प्रमाण बताया है। फिर भी
परम्परानुसार अर्धवृत्त के इस सूत्र को सभी वृत्त-खण्डों के साथ सामान्यीकृत करने
पर जीवा और शर के अनुपात के अन्तर की भरपाई के लिये अर्धवृत्त के क्षेत्रफल
का बड़ा सूत्र मानते हुए वृत्त-खण्ड के सूत्र को विकसित किया है। इससे महावीर
आदि अन्य आचार्यों से अधिक सही मान प्राप्त हो सका है। पर सर्वथा सही नहीं।
आधुनिक गणित में वृत्त-खण्ड का सर्वथा सही क्षेत्रफल प्राप्त करने के
लिये पहले त्रिज्या-खण्ड का क्षेत्रफल प्राप्त करते हैं। पश्चात् इस खण्ड में निर्मित
त्रिभुज के क्षेत्रफल को घटाकर वृत्त-खण्ड का क्षेत्रफल प्राप्त करते हैं। प्रस्तुत
उदाहरण को इस विधि से हल करने के लिये पहले सही नापियों के साथ इस
प्रकार चित्रित करते हैं-
AB ⇒ जीवा = 13
x n ⇒ शर = 3
ब्रह्मगुप्त के सूत्र द्वारा प्राप्त-
x p ⇒ व्यास = 17
A O तथा B O त्रिज्या या त्रिभुज का कर्ण = 8.5
n o ⇒ त्रिभुज का लम्ब = 5.5
१. वृत्ते शरसंवर्गोऽर्धज्यावर्गः स खलु धनुषोः। —आर्यभटीय, गणितपाद श्लोक १७।
त्रिशतिका 129
त्रिज्या-खण्ड के क्षेत्रफल के लिये वृत्त का व्यास या त्रिज्या को जानना
आवश्यक है। प्रस्तुत सूत्र में इसका उल्लेख नहीं है। अतः ब्रह्मगुप्त के सूत्र द्वारा¹
पहले इसे प्राप्त करते हैं-
व्यास (13² / (4×3)) + 3 = 17.083 अतः त्रिज्या = 8.5416 .....
यही त्रिज्या इसमें बनने वाले त्रिभुज का कर्ण भी है। अतः शुल्व सूत्र या
पाइथोगोरीय सूत्र द्वारा भी इसका यही परिमाप प्राप्त करते हैं-
त्रिभुज का कर्ण = √((6.5)² + (5.5416)²) ⇒ √(42.25+30.710067)
⇒ √72.960067 ⇒ 8.5416 ....
यहाँ त्रिज्या-खण्ड का कोण सामान्यतः 98⁰ है। श्रीधर के अनुसार π का
मान सामान्यतः 31/10 प्राप्त करने पर तथा त्रिज्या को सामान्यतः 8.5 मानने पर-
त्रिज्याखण्ड OA xB का क्षेत्रफल = (98⁰ / 360⁰) × (31 / 10) × (8.5)²
⇒ .8438.... × 72.25 ⇒ 60.9705....
त्रिभुज का लम्ब = 8.5 - 3 (शर) = 5.5
त्रिभुज का क्षेत्रफल = (13/2) × 5.5 ⇒ 71.5 / 2 ⇒ 35.75
वृत्त खण्ड का क्षेत्रफल = 60.9705-35.75 ⇒ 25.22 या 25 ²²⁄₁₀₀
यह क्षेत्रफल श्रीधर द्वारा प्राप्त परिणाम के उपरिलिखित कारणों से इसका
पूरी तरह मिल पाना सम्भव नहीं है।
एतेभ्योऽन्यत्र क्षेत्रेषु चतुरस्रचापवृत्तिपरिकल्पनया स्वकरणैः
130 त्रिशतिका
सुक्षेमा अनुवाद-मुरज नामक वाद्य की आकृति में 2 चाप तथा इसकी ही
एक इसकी ही एक अन्य आकृति में मध्य में एक चतुरस्र या चतुर्भुज तथा 2 चाप
प्राप्त होते हैं। साथ ही पञ्चभुज, सप्तभुज आदि आकृतियों में अनेक त्रिभुजों की
कल्पना की जा सकती है।
अनुशीलन-मुरज की इस आकृति को बीच में एक सरल रेखा द्वारा
परिसीमित करने पर 2 चाप प्राप्त होते हैं-
दूसरी एक अन्य आकृति में मध्य में एक चतुर्भुज तथा दो चाप प्राप्त होते
हैं-
यहाँ वृत्ताकार जैसी Curvilinear figures के दो अन्य उपभेद बताए हैं।
महावीर ने गणितसारसंग्रह 7.32 में प्रथम को ‘यवाकार’ तथा दूसरी को ‘मुरजाकार’
नाम दिया है।
पञ्चभुज में किसी कोण से अन्य कोण तक या कोण से आधार तथा रेखाएँ
खींच कर 5 त्रिभुज प्राप्त किये जा सकते हैं। जैसे-
इसी प्रकार सप्तभुज से भी 7 त्रिभुज प्राप्त किये जा सकते हैं।
इनमें अलगर तत्सम्बन्धित सूत्रों को अन्वित करते हुए इनका क्षेत्रफल प्राप्त
करना चाहिए।
त्रिशतिका 131
लम्बावधाकर्णपरिज्ञानाय सूत्रमार्याः
ऋजुवदनचतुर्बाहौ मुखोनभूमिर्धरा भवेत् त्र्यस्रे।
तद् बाहू पार्श्वभुजौ प्रकल्पयेन्मध्यलम्बाय।। 49।।
त्र्यस्रस्य फलं द्विगुणं भूभक्तं मध्यलम्बको भवति।
कोटिः स एव बाहुस्त्ववधा कर्णस्तु पार्श्वभुजः।। 50।।
भुजकोट्योः कृतिहीनात् पृथक्-पृथक् कर्णवर्गत्तो मूले।
कोटिभुजौ, तत्कृत्योर्युतितो मूलं प्रजायते कर्णः।। 51।।
पूर्वोक्तक्षेत्रस्य न्यासः अत्र जातं त्र्यस्रम्।
भुजयुतिदलं चतुर्थेत्यादिना लब्धं त्र्यस्रफलम् 84। अतो लब्धो मध्यलम्बः
12। एष एव कोटिः। लम्बे निपातिते उभयतोऽबाधे भुजौ। पार्श्वभुजौ कर्णौ।
लम्बस्य त्र्यस्रे दर्शनम्।
अत्र कोटिः 12। अस्य कृतिः 144
एतां कर्णयोरनयो 13। 15 पृथक् वर्गाभ्यां 169। 225 विशोध्य शेषयोर्मूले
भुजोऽवधा च 5। 9 अनयोः क्षेत्रे दर्शनम्।
132 त्रिशतिका
भुजवर्गोनायाः कर्णकृतेर्मूलं कोटिः। कोटिवर्गोनायाः कर्णकृतेर्मूलं भुजः।
भुजकोट्योः कृतियुतेर्मूलं कर्णः। एवमन्यचतुरस्रेषु भुजफलतो लम्बमानयेत्। इति
क्षेत्रव्यवहारः॥
सुक्षेमा अनुवाद-समलम्ब चतुर्भुज की भूमि या आधार से मुख रेखा को
कम कर देने पर त्रिभुज का आधार प्राप्त होता है। इस त्रिभुज का मध्यलम्ब प्राप्त
करने के लिये बाहु को पार्श्वभुजाओं के रूप में प्रकल्पित करना चाहिये।। 49।।
त्रिभुज के क्षेत्रफल को द्विगुणित करके उसे भू या आधार से विभाजित
करने पर मध्यलम्ब का मान ज्ञात होता है। इसे ही कोटि कहते हैं। इस कोटि से
विभक्त की गई आधार बाहु या भुजा 'अवधा' है। इस कोटि की पार्श्व वाली
भुजाएँ कर्ण होती हैं।। 50।।
कर्ण के वर्ग से भुज या आधार की कृति या वर्ग को कम करके उसका
वर्गमूल लेने पर कोटि होती है।
कर्ण के वर्ग से कोटि या लम्ब की कृति या वर्ग को कम करके उसका
वर्गमूल लेने पर भुज होती है।
भुज और कोटि के वर्ग के योगफल का वर्गमूल ही कर्ण होता है।। 51।।
अनुशीलन-यहाँ पहले पूर्वोक्त समलम्ब चतुर्भुज को उद्धृत करते हुए 1
आयत तथा 2 त्रिभुज दिखाए गए हैं। पश्चात् मुख रेखा को कम करके 2 त्रिभुज
प्रस्तुत किये गए हैं। चित्र इस प्रकार है-
चित्र में अंकित संख्याओं से तिगुने मिलीमीटर हैं।
चित्र में त्रिभुज △ EDF का कर्ण 15 तथा त्रिभुज △ BCA का कर्ण
स्पष्टतः 13 है।। 49 ।।
त्रिशातिका 133
पं. सुधाकर द्विवेदी द्वारा सम्पादित ग्रन्थ में व्याख्या के द्वितीय, तृतीय चित्र
में कर्ण का मान 16 तथा सम्पूर्ण भुज या आधार का 15 दिखाया है, जो कि
गणित के अनुसार ठीक नहीं है। कर्ण का मान 15 तथा आधार का मान 9+5=14
होना चाहिए। मूल ग्रन्थ में ऐसा ही है। इसे प्रकट करने के लिये 'गणित का
इतिहास' ग्रन्थ में उद्धृत तथा जिन एण्ड कम्पनी की अनुमति से डेविड यूजीन
स्मिथ कृत History of mathematics से प्रत्युत्पादित मूल ग्रन्थ की छाया प्रति
को प्रस्तुत करते हैं। यह प्रस्तुत व्याख्या के 'लब्धो मध्यलम्बः 12। एष एव
कोटिः' इसके आगे लिखी गई है। दूसरी, तीसरी लाइन में कर्ण का मान 15 तथा
आधार का मान 14 लिखा है। इस आधार पर हमने अपनी व्याख्या में यही मान
उल्लिखित किया है।
•श्लो•क• लब्धो मध्यलम्बः। १२। एष एव कोटिः १२ तं च निपाते भुज-द्वयस्य उभयतो भुजः। कर्णश्चतुस्त्रा रू कर्णः। लंचे लंबण्या
१५ अत्र कोटिः १२। अस्य व्याः कृतिः १४४। कर्णयोस्तयोः १२/१५। पृथक् पृथक्
विस्रशेषशेषमेषं तानु नान्यो अन्यथोपचार। सत्र दर्शनात् ५। ९। यद्भूजत्र
र्गेणोनोपाः रू से हृदयं मूलं। कोटिः रूपेण गोनोपाः क र्सक नेर्मूलं ते भुजः। भुजका र्ण द्री त्रिन्त्रिषुटि
मूलं क र्सः। एवमन्यो भुजु षुतुषेषु त्रिभुजसने न्तेन मानयेत्। अत्ले चैवमुदहोः अर्मसः। ॐ। इततान्युव
हाय्टर ल द्यू सभावीद् थी। ९ फरि एषां रिवा त्फ लानयनप्रकारं एवमभावी दृथी। पुस्तल मवैर
पुना रिथैवा ारत प्रभाव नद्वियमोवं - हा विशेषमुतिं याभ्याप मजे हि समपादैः। एभिस्त्रिद्वारे
र्वैरिवैर्व धंस म भोनै फलं भवति। त्वा ते पम् भुजेवे पे षङ् इत्तनायने नैलितं। उदाहरणादिदि १५
क ५ क्षते पु क र्षे ली पं वह ख्विज्जारा वरूद्रा इदा पात्रा रात कतंक याना भी मु। न्यासः। ३। ३। ४। ५।
नईव तंह ९०। २४०। यमद्विगुतः क एरशपार सुतात लड ५० व्य पान व्यारदै। वा वाः क्षवारी व भ्रे
रशौन म्युकिं तलितां स्फानः। १० लब्ध लिन हत्याः १२ २४३। प म व भुद्रे वाने वो १२ अ हस्ता भुनाः
वा देवव्या। वह्मेश वि षोडशी प म रू ष्पतां कं गल्फितां न्धुभः। १६। १९। ल ब्हं र्याः ४०२४। रूप
ष्टफलानयन नायक एवमभावी मुखवल नह्वो गानी वाणी क्य के नेः परि दरणपूगायाः। व
धं गुणं चतुरन्वित त्रिंशत् त्रिं कें फलंक्तु पे उदाहरणं। रूप या मुस्त गोप्यो पार ३२ ह पा स्ना लेखेद्र
चातः। ३ रा दश विह त्यु ता नफलं किं प्रभा वस्त्या न्यासः १६ ते कां क किक सं० ४ ५ १५ ४ ७। यम्
स्वरत होः मूलानयनोपल। ८०। एव्पूत्र त्राणी । भाष् १२ लद् स्यात तस्य वर्गला क नद्विस्य
दृत्तामूलं भवेल्ल विता विम ने कुरु यवर्गोनू ते नस्त्रात वर्ग गुणक रिकर्म ण्णन्वी २२५। क व फले म्नु
०६३। ६ प्र भाग स्पाद दृशो न १२ वर्ष प ५ प श्चह त्ति दि ष्पूिर्दे वेन् सृवन् ३० नाति येष्टेन वेनगु
श्लोक 50 में त्रिभुज के क्षेत्रफल द्वारा इसके शीर्षलम्ब ज्ञात करने की
विधि बताई गई है। यह विधि श्लोक 43 में उल्लिखित 'कुदलं च लम्बहतम्' सूत्र
में त्रिभुज के क्षेत्रफल ज्ञात करने की विधि पर समीकरण के प्रयोग से प्रकट है-
त्रिभुज का क्षेत्रफल = आधार × शीर्षलम्ब / 2
त्रिभुज का शीर्षलम्ब = (2 × क्षेत्रफल) / आधार
134 त्रिशतिका
स्पष्टतः श्लोक 50 में शीर्षलम्ब की यही विधि उल्लिखित है।
उदाहरण के लिये द्वितीय चित्र के △ ADF त्रिभुज का श्लोक 43 के
‘भुजयुतिदलं चतुर्धा...’ की विधि से पहले क्षेत्रफल ज्ञात करते हैं–
द्वितीय चित्र में ADF का क्षेत्रफल = √21×8×7×6 = √7056 = 84
अब प्रस्तुत श्लोक 50 की विधि से इसका शीर्षलम्ब–
ADF का शीर्षलम्ब = (2×84)/14 = 168/14 = 12
इस लम्ब को यहाँ कोटि कहा गया है। इस कोटि से विभक्त की गई
आधार भुजा→5 मात्रा के AB तथा 9 मात्रा के EF को यहाँ ‘अवधा’ कहा गया
है। साथ ही ADB त्रिभुज की पार्श्व भुजा AD 13 मात्रा का कर्ण है। तथा BDF
त्रिभुज की पार्श्वभुजा F D 15 मात्रा का कर्ण है।
आगे 51वें सूत्र में त्रिभुज की भुजाओं में सहसम्बन्ध प्रकट करते हुए इनके
परिमाण के सूत्र बताए हैं। तदनुसार–
कोटि या लम्ब = √कर्ण²–भुज² या आधार²
भुज या आधार = √कर्ण² – कोटि² या लम्ब²
कर्ण = √लम्ब² + आधार²
यहां कर्ण के सूत्र को उपरिलिखित उदाहरण में अन्वित करने पर इसका
मान क्रमशः 13 तथा 15 प्राप्त होता है–
ADB का कर्ण = √12²+5² ⇒ √144+25 ⇒ √169 = 13
BDF का कर्ण = √12²+9² ⇒ √144+81 ⇒ √225 = 15
इन कर्ण, कोटि, आधार में से किन्हीं दो के परिज्ञान होने पर समीकरण
द्वारा तीसरे का आसानी से पता लगाया जा सकता है। अतः व्याख्या में कर्ण के
वर्ग से लम्ब के वर्ग को घटाकर वर्गमूल लेकर दोनों त्रिभुजों की अलगर आधार
भुज या अवधा ज्ञात की गई है–
√13²+12² ⇒ √169+144 ⇒ √25 = 5
अथवा √15²+12² ⇒ √225+144 ⇒ √81 = 9
यहाँ इसका स्पष्ट निरूपण बहुत आवश्यक है कि यह नियम केवल
समकोण त्रिभुज में लागू होता है।
त्रिशतिका 135
इस प्रकार इस सूत्र से हमें आधार, लम्ब तथा कर्ण वाले त्रिक प्राप्त होते
हैं-
9 - 12 - 15
5 - 12 - 13
यह सूत्र सर्वव्यापी है। अतः इन संख्याओं के अनुपात में आने वाली किसी
भी त्रिक में यह सूत्र लागू होता है। इस प्रकार किसी भी समकोण त्रिभुज में वे
संख्याएँ होती हैं, जो उपरिलिखित त्रिक के अनुपात में होती हैं। अथवा विलोमतः,
इन संख्याओं के अनुपात में आने वाला कोई भी त्रिक समकोण त्रिभुज का निर्माण
करता है। अतः ये सभी त्रिक इसके लिये सत्य हैं। उदाहरणतः-
9 -12 -15 त्रिक का-
½ गुना ⇒ 4.5 . 6 . 7.5 क्योंकि √20.25 + 36 = 7.5
⅓ ,, ⇒ 3 . 4 . 5 ,, √9 + 16 = 5
¼ ,, ⇒ 2.25. 3 . 3.75 ,, √5.0625 + 9 = 3.75
5.12.13 का त्रिक का-
½ ,, ⇒ 2.5 . 6 . 6.5 ,, √6.25 + 36 = 6.5
¼ ,, ⇒ 1.25. 3 . 3.25 ,, √1.5625 + 9 = 3.25
इस प्रकार किसी भी त्रिक से समानुपातिक गुणा या भाग द्वारा अनन्त त्रिक
प्राप्त किये जा सकते हैं। इनके सर्वप्रथम अनेक उदाहरण 500 B.C. या इससे भी
पूर्व निर्मित बौधायन शुल्ब सूत्र आदि में प्राप्त होते हैं। इसमें उपरिलिखित द्वितीय
त्रिक का स्पष्ट उल्लेख है¹। इसका इस प्रकार नाम दे सकते हैं-
a b c
5 12 13
इस त्रिक की एक विशेषता यह है कि इसके b तथा c का जोड़ तथा घटाव
दोनों किसी पूर्ण संख्या के वर्ग बनते हैं तथा इनका वर्गमूल कोई विषम संख्या
होती है तथा इन विषम संख्याओं का गुणनफल a संख्या होती है। इस समीकरण
को सिद्ध करने पर सार्वत्रिक परिणाम प्राप्त होता है कि यदि a किन्हीं दो विषम
संख्याओं (m n) का गुणनफल हो, या a = m n हो तो-
b = m² - n² तथा c = m² + n²
2 2
१. तासां त्रिकचतुष्कयोर्द्वादशपञ्चिकयोः ......इत्येतासूपलब्धिः। - बौ.शु.सू. 1.49
136 त्रिशतिका
उदाहरणार्थ-
a ⇒ 7 × 5 = 35, b ⇒ (49 - 25) / 2 = 12
c ⇒ (49 + 25) / 2 = 37
अथवा
a ⇒ 9 × 3 = 27, b ⇒ (81 - 9) / 2 = 36
c ⇒ (81 + 9) / 2 = 45
‘उपरिलिखित त्रिक में भी यह नियम लागू है-
a ⇒ 5 × 1 = 5 b ⇒ (25 - 1) / 2 = 12
c ⇒ (25 + 1) / 2 = 13
इस बढ़िया नियम के अनुसार किसी भी विषम संख्या के a होने पर त्रिक
प्राप्त किये जा सकते हैं।
श्लोक ५१ की व्याख्या के आधार पर भुज का सूत्र इस प्रकार है-
कोटिवर्गोनायाः कर्णकृतेर्मूलं भुजः।
अर्थ पूर्वोक्त है। यह कर्ण पर समीकरण से प्राप्त है-
√(लम्ब² + आधार²) = कर्ण
⇒ √(कर्ण² - लम्ब²) = आधार या भुज
कोटि या लम्ब का सूत्र इस प्रकार है-
भुजवर्गोनायाः कर्णकृतेर्मूलं कोटिः।
यह भी कर्ण पर समीकरण अनुसार प्राप्त है। इस प्रकार-
√(कर्ण² - आधार²) = लम्ब
पूर्वोक्त समकोण त्रिभुज के उदाहरणों में-
√(13² - 5²) = √(169 - 25) = √(144) = 12 लम्ब
इसी प्रकार-
√(15² - 9²) = √(225 - 81) = √(144) = 12 लम्ब
त्रिशतिका 137
श्रीधराचार्य ने त्रिभुज की भुजाओं में सहसम्बन्ध तथा प्रमाण को प्रकट
करने वाला यह सूत्र मूलतः ब्रह्मगुप्त से प्राप्त किया है-
कर्णकृतेः कोटिकृतिर्विशोध्य मूलं भुजो, भुजस्य कृतिम्।
प्रोह्यं पदं कोटिः, कोटिबाहुकृतियुतिपदं कर्णः॥
—ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त १२.२४
स्पष्टतः श्रीधर के भाव तथा भाषा भी इसके समान है। आधुनिक गणित
में इसे पाइथोगोरस प्रमेय कहने की परम्परा है। पर यह उल्लेख बहुत जरूरी है
कि पाइथोगोरस से भी पहले ईसा पूर्व ५वीं शताब्दी या इससे भी पूर्व निर्मित
बौधायन शुल्व सूत्र में इस प्रमेय को किसी आयत में वर्ग के माध्यम से प्रकट
किया गया था-
दीर्घचतुरस्रस्याक्ष्णया रज्जुः पार्श्वमानी तिर्यङ्ग्मानी
च यत् पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति।—बौधायन शु.सू. १.४८
अर्थात् किसी आयत की भुजाएँ जितने अलग्र प्रमाण का वर्ग बनाती हैं,
उन पर खींचा गया विकर्ण उनके योगफल जितना वर्ग क्षेत्रफल बनाता है। इस
प्रकार—
क्योंकि विकर्ण पर वर्ग = a² + b²
अतः उस वर्ग की विकर्ण नामक एक भुजा = √(a² + b²)
शुल्ब सूत्रों में इस उपाय से कर्ण के प्रमाण को जानने का सफल प्रयास
किया गया था।
खातव्यवहारे करणसूत्रम्
मुखतलमध्ये पृथुतादैर्घ्ये वा चेत् प्रजायते विषमम्।
वेधे वा विषमयुतिं साम्याय भजेत् विषमपदैः॥ 52॥
समविस्तरहतदैर्घ्ये वेधेन समाहते फलं भवति।
खाते समभुजवेधे बाहुघनो जायते गणितम्॥ 53॥
सुक्षेमा अनुवाद-मुख, तल तथा मध्य में पृथुता = चौड़ाई, दैर्घ्य = लम्बाई
या वेध = गहराई के विषम होने पर विषम खात होता है। उसे समखात बनाने के
लिये उन विषम संख्याओं को जोड़कर उन्हें विषम संख्या के पद से विभाजित
करना चाहिए। (इससे औसत मान प्राप्त होता है।)॥ 52॥
विस्तर = चौड़ाई, दैर्घ्य = लम्बाई तथा वेध = गहराई के सम होने पर तीनों
को परस्पर गुणित करने पर घनफल प्राप्त होता है तथा ऐसा कोई खात या गहरा
क्षेत्र-व्यवहार, खात, चिति एवं त्रिशतिका उपसंहार (श्लोक ७६-१००)
138 त्रिशतिका
पात्र जिसकी तीनों भुजाएँ समान हों, उसमें इस संक्रिया से गणित या उसका
आयतन ज्ञात होता है। । 53 ।।
अनुशीलन-इन श्लोकों में घन तथा घनाभ के आयतन को ज्ञात करने की
विधि बताई गई है। 53 वें श्लोक के अनुसार जिस पिण्ड की लम्बाई, चौड़ाई तथा
ऊँचाई वाली तीनों भुजाएँ परस्पर समान परिमाण की हों वह घन होता है। इन तीनों
का गुणनफल ही घनफल अथवा आयतन है। इन तीनों की भुजा समान होने से
किसी भी भुजा का घन उसका आयतन होगा। अतः-
घन का आयतन = कोई भी भुजा³
52 वें श्लोक के अनुसार घनाभ अर्थात् जिसकी तीनों विमाएँ ⇒ लम्बाई,
चौड़ाई तथा ऊँचाई समान न हों, उनके आयतन को ज्ञात करने के लिये उन तीनों
का गुणन करना चाहिये। अतः-
घनाभ का आयतन = लम्बाई × चौड़ाई × गहराई
इस श्लोक में यह भी कहा है कि जिस पिण्ड की लम्बाई या चौड़ाई या
गहराई की सम्पाती भुजाएँ परस्पर समानान्तर न हों, उसे असमखात कहते हैं।
इनका औसत निकाल कर पहले सम खात बना लेना चाहिये। उसके पश्चात् उक्त
सूत्र का प्रयोग करके उस घनाभ का आयतन ज्ञात करना चाहिये।
उदाहरणम्
द्वित्रिचतुष्करवेधा पुष्करिणी पञ्च हस्तविस्तारा।
षोडशहस्तायामा खातफलं कथ्यतामाशु।। 87।।
न्यासः 2। 3। 4।। 5।। 16।। लब्धं विषमफलम् 240
सुक्षेमा अनुवाद-कोई पुष्करिणी या बावली कहीं पर 2 कहीं 3 तथा कहीं
4 हाथ वेध या गहरी है। यह 5 हाथ विस्तार या चौड़ाई वाली तथा 16 हाथ आयाम
या लम्बाई वाली है। इसके खातफल या घन फल को शीघ्र बताओ।
अनुशीलन-यहाँ इसकी गहराई समान नहीं है। अतः 52 वें श्लोक के
अनुसार इसका औसत निकालते हैं। इसका नियम है कि सभी संख्याओं को जोड़
दें। पुनः उसे उन संख्याओं के जितने नम्बर हैं, उनसे भाग दे दें। पश्चात् प्रत्येक
को आपस में गुणित करें। अतः-
((2 + 3 + 4) / 3) × 5 × 16 = 3 × 5 × 16 = 240
त्रिशतिका 139
इस औसत से स्थूल घनफल ज्ञात होता है। क्योंकि अलग-अलग गहराई
का क्षेत्रफल सुनिश्चित नहीं है। स्पष्टतः अलग-अलग क्षेत्रफलों को गहराई से
गुणित करने पर अलग-अलग परिणाम प्राप्त होगा। सर्वथा सही घनफल के लिये
अलग-अलग गहराई वाले घनाभ का अलग-अलग आयतन प्राप्त करके उन तीनों
का जोड़ करना होगा।
अन्यदुदाहरणम्
त्रिचतुःपञ्चकहस्ताः पृथुता विषमात् तु यस्य खातस्य।
अष्टौ हस्ता वेधो द्वादश दैर्घ्ये कथय फलम्॥ 88॥
न्यासः।। 3। 4। 5।। 8 दैर्घ्य 12 खाते लब्धं फलम् 384
सुक्षेमा अनुवाद-जो खात या गहरा पिण्ड पृथुता या चौड़ाई में कहीं 3,
कहीं 4 तथा कहीं 5 हाथ वाला है। वह दैर्घ्य या लम्बाई में 12 हाथ है तथा 8 हाथ
गहरा है। उस घन का फल या आयतन क्या होगा।
अनुशीलन-इस हौज का केवल लम्बाई, चौड़ाई का चित्र इस प्रकार
होगा-
[चित्र] नापियाँ निर्दिष्ट संख्याओं का ½
सेंटीमीटर हैं।
यहाँ CD → 3, BE → 4, तथा AF की चौड़ाई 5 हाथ है। अतः उपर्युक्त
संक्रिया अनुसार औसत निकालते हुए-
((3 + 4 + 5) / 3) × 12 × 8 = 4 × 12 × 8 = 384
यहाँ बिन्दु अंकित रेखाओं द्वारा समकोण त्रिभुज प्राप्त किया गया है। इससे
हम एक घनाभ तथा एक त्रिभुज प्राप्त करते हैं। इन दोनों के अलग-अलग
आयतन को जोड़कर भी हम वही परिणाम पाते हैं-
140 त्रिशतिका
घनाभ का आयतन ⇒ 12 × 3 × 8 = 288
त्रिभुजाकार गड्ढे का आयतन ⇒ 6 × 2 × 8 = 96
——————————————————————————————
सम्पूर्ण हौज का आयतन 384
——————————————————————————————
अन्यदुदाहरणम्
समविस्तारकरा दशपादयुता गणक यस्य खातस्य।
दैर्घ्ये षोडश सार्धा वेधोऽष्टौ तत्र किं गणितम्।। 89।।
न्यासः ⁴¹⁄₄ ³³⁄₂ ⁸⁄₁ गणितहस्ताः 1353
सुक्षेमा अनुवाद-हे गणितज्ञ, जिस खात के हाथ समान विस्तार वाले हैं,
उसकी चौड़ाई ¼ सहित 10 अर्थात् ⁴¹⁄₄ तथा लम्बाई ½ सहित 16 अर्थात् ³³⁄₂ है तथा
वेध या गहराई 8 हाथ है। उसका कितना ‘गणित’ या आयतन होगा।
अनुशीलन-यह समखात का उदाहरण है। इसमें घनाभ के सामान्य सूत्र के
अनुसार-
⁴¹⁄₄ × ³³⁄₂ × ⁸⁄₁ = 10824/8 = 1353 हाथ³
अन्यदुदाहरणम्
समचतुरस्रे खाते षोडश हस्ता भुजा सखे यत्र।
वेधोऽपि षोडशैव प्रकथ्यतां तत्र किं गणितम्।।
न्यासः 16। 16। 16।। लब्धं 4096।।
सुक्षेमा अनुवाद-सम चतुर्भुज खात में जिसकी लम्बी तथा चौड़ी भुजा
16-16 हाथ की है जिसकी गहराई भी 16 है। हे मित्र, उसका आयतन क्या होगा,
बताओ।
अनुशीलन-यह घन के आयतन का उदाहरण है। यहाँ 53 वें श्लोक के
नियमानुसार-
हौज का आयतन ⇒ 16³ अथवा 16 × 16 × 16 = 4096 घन हस्त
कूपस्य फले सूत्रम्
मुखतलतद्योगोनां वर्गैक्यकृतेः पदं दशगुणायाः।
वेधगुणं चतुरन्वितविंशतिभक्तं फलं कूपे।। 54।।