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सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 208 में से

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पृष्ठ 158

130 त्रिशतिका
सुक्षेमा अनुवाद-मुरज नामक वाद्य की आकृति में 2 चाप तथा इसकी ही
एक इसकी ही एक अन्य आकृति में मध्य में एक चतुरस्र या चतुर्भुज तथा 2 चाप
प्राप्त होते हैं। साथ ही पञ्चभुज, सप्तभुज आदि आकृतियों में अनेक त्रिभुजों की
कल्पना की जा सकती है।
अनुशीलन-मुरज की इस आकृति को बीच में एक सरल रेखा द्वारा
परिसीमित करने पर 2 चाप प्राप्त होते हैं-
दूसरी एक अन्य आकृति में मध्य में एक चतुर्भुज तथा दो चाप प्राप्त होते
हैं-
यहाँ वृत्ताकार जैसी Curvilinear figures के दो अन्य उपभेद बताए हैं।
महावीर ने गणितसारसंग्रह 7.32 में प्रथम को ‘यवाकार’ तथा दूसरी को ‘मुरजाकार’
नाम दिया है।
पञ्चभुज में किसी कोण से अन्य कोण तक या कोण से आधार तथा रेखाएँ
खींच कर 5 त्रिभुज प्राप्त किये जा सकते हैं। जैसे-
इसी प्रकार सप्तभुज से भी 7 त्रिभुज प्राप्त किये जा सकते हैं।
इनमें अलगर तत्सम्बन्धित सूत्रों को अन्वित करते हुए इनका क्षेत्रफल प्राप्त
करना चाहिए।