त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें124 त्रिशतिका
त्रिशतिकाकार ने इस अनुपात का या π का यह मान स्वीकार किया है।
यद्यपि इनसे पूर्व आर्यभट इससे सूक्ष्म मान का वर्णन कर चुके थे। पर त्रिशतिकाकार
के पश्चात् काफी समय तक यह मान ही लोकप्रिय रहा। महावीराचार्य ने भी
त्रिशतिकाकार का ही अनुसरण किया है१। इस मान को मानते हुए उनके अनुसार
परिधि इस प्रकार है-
परिधि = √10 × व्यास
स्पष्टतः यह त्रिशतिकाकार के समतुल्य है।
त्रिशतिकाकार के अनुसार वृत्त का क्षेत्रफल = √[10 (व्यास / 2)⁴]
⇒ √10 × व्यास × व्यास / 4
अतः वृत्त का क्षेत्रफल ⇒ परिधि × व्यास / 4
अथवा √10 × व्यास² / 4 अथवा π × त्रिज्या²
त्रिशतिकाकार ने स्पष्टतः अन्तिम सूत्रों को नहीं कहा है। पर आगे चल कर
महावीर, भास्कराचार्य आदि ने स्पष्ट रूप से I सूत्र को२ तथा असाक्षात् रूप से
II सूत्र को प्रस्तुत किया है। इससे आधुनिक गणित में III सूत्र को विकसित किया
गया है। त्रिशतिकाकार के मूल सूत्र द्वारा भी आधुनिक गणित के सूत्र को आसानी
से प्राप्त करना सम्भव है।
उदाहरणम्
दशविष्कम्भे क्षेत्रे समवृत्ते कः प्रजायते परिधिः।
गणितं च कथय विद्वन् गणयित्वा यदि विजानासि।। 85।।
न्यासः
लब्धं परिधिरस्य मूलम् 1000
लब्धं क्षेत्रफलमस्य मूलम् 6250
१. वृत्तक्षेत्रव्यासो दशपदगुणितो भवेत् परिक्षेपः।
व्यासचतुर्भागगुणः परिधिः फलमर्धमर्धे तत्।। - गणित सारसंग्रह, क्षेत्रगणित व्यवहार, श्लोक 60
२. वृत्तक्षेत्रे परिधिगुणितव्यासपादः फलं तत्-लीलावती, क्षेत्रव्यवहार श्लोक ४१