त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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भुजवर्गोनायाः कर्णकृतेर्मूलं कोटिः। कोटिवर्गोनायाः कर्णकृतेर्मूलं भुजः।
भुजकोट्योः कृतियुतेर्मूलं कर्णः। एवमन्यचतुरस्रेषु भुजफलतो लम्बमानयेत्। इति
क्षेत्रव्यवहारः॥
सुक्षेमा अनुवाद-समलम्ब चतुर्भुज की भूमि या आधार से मुख रेखा को
कम कर देने पर त्रिभुज का आधार प्राप्त होता है। इस त्रिभुज का मध्यलम्ब प्राप्त
करने के लिये बाहु को पार्श्वभुजाओं के रूप में प्रकल्पित करना चाहिये।। 49।।
त्रिभुज के क्षेत्रफल को द्विगुणित करके उसे भू या आधार से विभाजित
करने पर मध्यलम्ब का मान ज्ञात होता है। इसे ही कोटि कहते हैं। इस कोटि से
विभक्त की गई आधार बाहु या भुजा 'अवधा' है। इस कोटि की पार्श्व वाली
भुजाएँ कर्ण होती हैं।। 50।।
कर्ण के वर्ग से भुज या आधार की कृति या वर्ग को कम करके उसका
वर्गमूल लेने पर कोटि होती है।
कर्ण के वर्ग से कोटि या लम्ब की कृति या वर्ग को कम करके उसका
वर्गमूल लेने पर भुज होती है।
भुज और कोटि के वर्ग के योगफल का वर्गमूल ही कर्ण होता है।। 51।।
अनुशीलन-यहाँ पहले पूर्वोक्त समलम्ब चतुर्भुज को उद्धृत करते हुए 1
आयत तथा 2 त्रिभुज दिखाए गए हैं। पश्चात् मुख रेखा को कम करके 2 त्रिभुज
प्रस्तुत किये गए हैं। चित्र इस प्रकार है-
चित्र में अंकित संख्याओं से तिगुने मिलीमीटर हैं।
चित्र में त्रिभुज △ EDF का कर्ण 15 तथा त्रिभुज △ BCA का कर्ण
स्पष्टतः 13 है।। 49 ।।