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त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 208 में से

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पृष्ठ 154

126 त्रिशतिका
√1000 ज्ञात करने हेतु उक्त विध्यनुसार ⇒ 1000 × 100² = 10000000
पुनः : √10000000 = 3162 (अपूर्ण अंक को छोड़ दिया)
3162/100 = 31 72/100 = 31 31/50 परिधि
√6250 के लिये उक्त विध्यनुसार ⇒ 6250 × 20² = 2500000
√2500000 = 1581 (अपूर्ण अंक छोड़ कर)
1581/20 = 79 1/20 क्षेत्रफल
आसन्न वर्गमूल प्राप्त करने की इस विधि में जितनी बड़ी राशि के वर्ग से
गुणन करते हैं, उतना ही सूक्ष्म, सूक्ष्मतर परिणाम प्राप्त होता है।
चापसूत्रम्
जीवाशरैक्यदलहतशरस्य वर्गं दशाहतं नवभिः।
विभजेदवाप्तमूलं प्रजायते कार्मुकस्य फलम्॥ 47॥
सुक्षेमा अनुवाद-जीवा तथा शर को जोड़कर उसके आधे से शर को
गुणित करके उसके वर्ग को 10 से गुणित करे तथा 9 से विभाजित करे। पुनः
उसका वर्गमूल प्राप्त करे इससे कार्मुक या वृत्त-खण्ड का क्षेत्रफल प्राप्त होता है।
अनुशीलन-श्लोक के नियमानुसार किसी वृत्त-खण्ड या कार्मुक के क्षेत्रफल
का सूत्र इस प्रकार होगा-
वृत्त-खण्ड का क्षेत्रफल = √[ 10/9 { शर (जीवा + शर) / 2 }² ]
अथवा ⇒ (√10 / 3) × { शर (जीवा + शर) / 2 }
प्रस्तुत श्लोक में रेखागणित के अनेक पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग किया
गया है। उनकी परिभाषा इस प्रकार है-
चाप अथवा कार्मुक- यह किसी वृत्त का ऐसा वृत्त-खण्ड है, जिसे कोई
जीवा परिसीमित करती है। सामान्यतः लघु-वृत्तखण्ड को यह नाम दिया जाता है।
चाप तथा कार्मुक दोनों का मूल अर्थ धनुष है। लघु-वृत्त-खण्ड के धनुष का
आकार का बनने से प्राचीन गणित में इसके लिये दोनों नाम सार्थक हैं।
जीवा- वृत्त के किसी भी बिन्दु से खींची गई सरल रेखा जो अन्त में वृत्त
के ही किसी बिन्दु का स्पर्श करती हो, उसे जीवा (chord) कहते हैं।