त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिशतिका 127
शर या बाण- जीवा के मध्य बिन्दु से होते हुए वृत्त के किसी बिन्दु को
स्पर्श करने वाले लम्ब को शर कहा जाता है।
प्रस्तुत सूत्र में जीवा तथा शर की लम्बाई के आधार पर उससे बनने वाले
लघु-वृत्त खण्ड के क्षेत्रफल को जानने का प्रकार बताया गया है।
उदाहरणम्
चापाकृतिनि क्षेत्रे त्रिहस्तबाणे त्रयोदशकरज्ये।
किं भवति फलं विद्वन् गणयित्वा कथय यदि वेत्सि॥ 86॥
न्यासः [चित्र: चापाकार क्षेत्र, शर/लम्ब = 3, जीवा = 13]
लब्धः फलवर्गः 640। अस्य मूलं शतवर्गगुणनादिना जातं फलं 25।
भागाश्च ²⁹/₁₀₀
सुक्षेमा अनुवाद-3 हाथ बाण या लम्ब वाले तथा 13 हाथ ज्या (जीवा)
वाले चाप या धनुष के आकार वाले क्षेत्र का क्या फल होगा। हे विद्वन् यदि जानते
हो तो गणना करके बताओ।
अनुशीलन-पूर्वोक्त सूत्रानुसार वृत्त-खण्ड का क्षेत्रफल
= √[ 10/9 { 3 (13 + 3) / 2 }² ] ⇒ √(10 × 24² / 9) = √(5760 / 9) = √640
⇒25.29 अथवा 25 ²⁹/₁₀₀ हाथ²
अथवा (√10 / 3) × 3 (13 + 3) / 2 ⇒ √10 × (48 / 6) ⇒ √10 × 8 ⇒ 25.29
प्रस्तुत सूत्र वृत्त के क्षेत्रफल द्वारा प्राप्त अर्ध-वृत्त के क्षेत्रफल के आधार पर
विकसित किया गया है। क्योंकि-
वृत्त का क्षेत्रफल = (√10 × व्यास²) / 4
अतः अर्धवृत्त का क्षेत्रफल = (√10 / 3) × [त्रिज्या (व्यास + त्रिज्या) / 2]