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सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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पृष्ठ 159

त्रिशतिका 131
लम्बावधाकर्णपरिज्ञानाय सूत्रमार्याः
ऋजुवदनचतुर्बाहौ मुखोनभूमिर्धरा भवेत् त्र्यस्रे।
तद् बाहू पार्श्वभुजौ प्रकल्पयेन्मध्यलम्बाय।। 49।।
त्र्यस्रस्य फलं द्विगुणं भूभक्तं मध्यलम्बको भवति।
कोटिः स एव बाहुस्त्ववधा कर्णस्तु पार्श्वभुजः।। 50।।
भुजकोट्योः कृतिहीनात् पृथक्-पृथक् कर्णवर्गत्तो मूले।
कोटिभुजौ, तत्कृत्योर्युतितो मूलं प्रजायते कर्णः।। 51।।
पूर्वोक्तक्षेत्रस्य न्यासः अत्र जातं त्र्यस्रम्।
भुजयुतिदलं चतुर्थेत्यादिना लब्धं त्र्यस्रफलम् 84। अतो लब्धो मध्यलम्बः
12। एष एव कोटिः। लम्बे निपातिते उभयतोऽबाधे भुजौ। पार्श्वभुजौ कर्णौ।
लम्बस्य त्र्यस्रे दर्शनम्।
अत्र कोटिः 12। अस्य कृतिः 144
एतां कर्णयोरनयो 13। 15 पृथक् वर्गाभ्यां 169। 225 विशोध्य शेषयोर्मूले
भुजोऽवधा च 5। 9 अनयोः क्षेत्रे दर्शनम्।