त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिशतिका 125
सुक्षेमा अनुवाद-किसी वृत्त में 10 विष्कम्भ या व्यास वाला क्षेत्र होने पर
उसकी परिधि क्या होगी। हे विद्वन्! अगर जानते हो तो उस वृत्त का क्षेत्रफल भी
बताओ।
अनुशीलन-उपरिलिखित नियमानुसार परिधि तथा क्षेत्रफल इस प्रकार है-
परिधि का सूत्र √(10 × व्यास²)
उदाहरण √(10 × 10²) = √1000
इस प्रकार 1000 का वर्गमूल ही परिधि है।
क्षेत्रफल का सूत्र √(10 (व्यास/2)⁴)
उदाहरण √(10 (10/2)⁴)
⇒ √(10× 5 × 5 × 5 × 5) = √6250
इस प्रकार इस 6250 का वर्गमूल क्षेत्रफल है।
अथामूलदराशेरासन्नमूलानयनम्
राशेरमूलदस्याहतस्य वर्गेण केनचिन्महता।
मूलं शेषेण विना विभजेद् गुणवर्गमूलेन।। 46।।
शतवर्गगुणनादिना लब्धः परिधिः 31³¹⁄₅₀ क्षेत्रफलम् 79¹⁄₂₀ ।।
सुक्षेमा अनुवाद-पूर्णांक में वर्गमूल प्रदान न करने वाली राशि का
(आसन्न मूल प्राप्त करने के लिये) उस राशि को किसी राशि के बड़े वर्ग से
गुणित करके उसका वर्गमूल प्राप्त करें। इसमें पूर्ण वर्गमूल के पश्चात् जो शेष
राशि बचे उसे छोड़ दें। अनन्तर पूर्ण वर्गमूल राशि को पूर्व में वर्ग के रूप में गुणित
राशि के वर्गमूल से विभाजित करें¹। इससे उस राशि का आसन्न वर्गमूल प्राप्त
होता है।
अनुशीलन-इस श्लोक में पूर्ण वर्गमूल प्रदान न करने वाली राशि का
समीपतम वर्गमूल प्राप्त करने की विधि बताई गई है। उपरिलिखित उदाहरण में
परिधि तथा क्षेत्रफल की दोनों संख्याओं का वर्गमूल पूर्णांक में नहीं है। अतः इस
विधि से इनका आसन्न वर्गमूल ज्ञात करते हैं-
१. गृहीतशिष्यतो मूलराशेरमूलदस्य सुव्यक्तमासन्नं मूलं ग्राह्यम्। यथा तस्य राशेः केनचिन्महता
वर्गेण हतस्य मूलविधिना मूलं गृहीत्वा शेषं त्यजेत्। प्राप्तं मूलं गुणवर्गमूलेन विभजेत्।–पाटी-गणित
टीका श्लोक ११८