त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिशतिका 129
त्रिज्या-खण्ड के क्षेत्रफल के लिये वृत्त का व्यास या त्रिज्या को जानना
आवश्यक है। प्रस्तुत सूत्र में इसका उल्लेख नहीं है। अतः ब्रह्मगुप्त के सूत्र द्वारा¹
पहले इसे प्राप्त करते हैं-
व्यास (13² / (4×3)) + 3 = 17.083 अतः त्रिज्या = 8.5416 .....
यही त्रिज्या इसमें बनने वाले त्रिभुज का कर्ण भी है। अतः शुल्व सूत्र या
पाइथोगोरीय सूत्र द्वारा भी इसका यही परिमाप प्राप्त करते हैं-
त्रिभुज का कर्ण = √((6.5)² + (5.5416)²) ⇒ √(42.25+30.710067)
⇒ √72.960067 ⇒ 8.5416 ....
यहाँ त्रिज्या-खण्ड का कोण सामान्यतः 98⁰ है। श्रीधर के अनुसार π का
मान सामान्यतः 31/10 प्राप्त करने पर तथा त्रिज्या को सामान्यतः 8.5 मानने पर-
त्रिज्याखण्ड OA xB का क्षेत्रफल = (98⁰ / 360⁰) × (31 / 10) × (8.5)²
⇒ .8438.... × 72.25 ⇒ 60.9705....
त्रिभुज का लम्ब = 8.5 - 3 (शर) = 5.5
त्रिभुज का क्षेत्रफल = (13/2) × 5.5 ⇒ 71.5 / 2 ⇒ 35.75
वृत्त खण्ड का क्षेत्रफल = 60.9705-35.75 ⇒ 25.22 या 25 ²²⁄₁₀₀
यह क्षेत्रफल श्रीधर द्वारा प्राप्त परिणाम के उपरिलिखित कारणों से इसका
पूरी तरह मिल पाना सम्भव नहीं है।
एतेभ्योऽन्यत्र क्षेत्रेषु चतुरस्रचापवृत्तिपरिकल्पनया स्वकरणैः