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विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

३० विवाहवृन्दावनम्— [ नवांशचिन्ता-
भा०—जो लग्नदृष्टि को छोड़कर केवल नवांशदृष्टि से ही फल मानते हैं, वे
भी चन्द्रनवांश मैत्री से क्यों विमुख होते हैं । अस्तु यह बात दूर ही रहे, संसार
गतानुगतिक है (अर्थात् एक को जैसे करते देखता, वैसा दूसरा करता, फिर उसे
देख तीसरा करता है; अर्थात् चन्द्रनवांशमैत्री नहीं मानना अन्धपरम्परा है ) ॥
अथ नवांशचिन्ताध्यायः ।
तत्र नवांशोपपत्तिव्याजेन यवनमैत्रीं द्रढयति—
नवलवाधिपती उदयास्तयो-रनिमिषार्चितचान्द्रमसायनौ ।
वरपपतिवरयोः समवैरिणौ यदि तदिष्टफलेष्वपि फल्गुता ॥ १ ॥
सं०—उदयास्तयोः ( लग्नसप्तमभावयोः ) नवलवाधिपती नवांश-
स्वामिनौ यदि—अनिमिषार्चितचान्द्रमसायनौ ( गुरुबुधौ ) ‘सत्याचार्य-
मतेन’ समवैरिणौ, भवतस्तत् ( तदा ) इष्टफलेष्वपि फल्गुता ( विफलता )
स्यात् ॥ १ ॥
भा०—‘सत्याचार्य के मत से’ परस्पर समशत्रु गुरु और बुध यदि क्रम से
लग्न और सप्तमभाव के नवांश पति हो ( अर्थात् लग्न सप्तम में धनु और मिथुन
के नवांश हो ) तो इष्टफल में भी व्यर्थता हो जायगी ॥ १ ॥
वि०—विवाहलग्न पतिस्थान और सप्तमभाव जाया स्थान है अतः उन दोनों
के नवांशपति में मैत्री होने से वरवधू में भी मैत्री हो सकती है । इस विचार से
लग्न में द्विपदराशियों के नवांश प्रशस्त हैं । जैसे मिथुन, धनु । परञ्च सत्याचार्य
के मत से दोनों के अधिप सम शत्रु हैं, अतः प्रशस्त में भी अशुभत्व हो जायगा;
और यवनोक्तमैत्री से मिथुन, धनु के स्वामियों में परस्पर मैत्री है, अतः यवनमैत्री
से द्विपद नवांश में शुभत्व हो सकता है, सत्याचार्य के मत से नहीं ॥ १ ॥
अतो यवनोक्तसौहृदमेव ग्राह्यमित्याह—
तदुदयद्विपदांशनियामको यवनसौहृदमाद्रियतां जनः ।
इतरथा कथमस्तु करग्रहस्तनुफलं हि लवानवलम्बते ॥ २ ॥
सं०—तत् तस्मात् उदयद्विपदांशनियामकः ( लग्ने द्विपदनवांश-
प्रयोजकः ) जनः यवनसौहृदमाद्रियताम् । इतरथा ( सत्याचार्योक्तग्रह-
मैत्र्या द्विपदभिन्ननवांशे ) करग्रहः ( विवाहः ) कथं स्यात् । हि( यतः )
तनुफलं लवान् नवांशान् अवलम्बते आश्रयते । तथोक्तं प्राचीनैः—

प्रकरणम् ४ ] वसन्तलक्ष्मौसहितम् । ३१
"लग्ने द्विपद्गृहांशो शुभफलमन्यांशकोदये नेष्टम् ॥ २ ॥
भा०—इसलिये लग्न में द्विपद् नवांश को शुभ मानने वाले यत्न मैत्री को
स्वीकार करें। अन्यथा (नवांश मैत्री विना) विवाह कैसे हो सकता है?
क्योंकि लग्न का फल नवांश के आश्रित है ॥ २ ॥
अथान्याशङ्कां तद्दोषं च कथयति—
अथ रिपू यदि नोभयसप्तमौ तदयशः कलशस्य किमागतम् ।
द्विपदतां दधतोऽथ शुभर्क्षता यदि वृषानिमिषौ किमुपेक्षितौ ॥३॥
सं०—अथ यदि उभयसप्तमौ रिपू न 'समसप्तकयोः स्वभावमित्र-
त्वात्' तत् (तदा) द्विपदतां दधतः कलशस्य (कुम्भस्य) अयशोऽ-
शुभत्वं किमागतम् ? । अथ नवांशग्रहणे यदि शुभर्क्षता (शुभस्वामित्व-
मेव मुख्यं) तर्हि वृषानिमिषौ (वृषमीनौ) शुभस्वामिनौ किं उपेक्षितौ
परित्यक्तौ ? ॥ ३ ॥
भा०—यदि ऐसा कहा जाय कि परस्पर सप्तम में मैत्री होती है इसलिये
धनुमिथुन द्विपद् होने के कारण शुभ है — तो फिर कुम्भके उत्तरार्धमें द्विपद् होने
पर अशुभत्व क्यों हुआ ? । कहो, कि नवांशमें शुभर्क्षता (शुभग्रहकी राशि
होना) ही प्रधान है—तो फिर वृष और मीन क्यों त्याग कर दिये गये ? ॥ ३ ॥
पुनः प्रत्युत्तरं कथयति—
अमनुजाविति चेत्किमु शौनको नवलवं झषमादृतवान्मुनिः ।
शुभगृहद्विपदास्तलवः स चेद् भवतु तत्र किमस्तु तुलाधरः ॥ ४ ॥
सं०—तौ वृषमीनौ—अमनुजौ (द्विपदभिन्नौ) इति चेत्—तर्हि
शौनको मुनिः झषं नवलवं किमु आदृतवान् । तथा च तद्वाक्यम्—"प्रह-
सितवदना च मीनांशे" इति । अथ स मीनः शुभगृहद्विपदास्तलवः
(शुभस्य गृहं, द्विपदोऽस्तलवो यस्य स तथोक्तः) इति चेत् भवतु तदा
तत्र तुलाधरः (तुलाराशिः) किमस्तु (लग्ने तुलनवांशः कथमस्त्वित्यर्थः) ।
भा०—वृष और मीन शुभग्रह की राशि होने पर भी द्विपद नहीं हैं—
इसलिये अग्राह्य है, ऐसा कहा जाय तो —शौनक मुनि ने मीननवांश को क्यों ग्रहण
किया ? । कहो कि—मीन शुभग्रह की राशि है और उससे सप्तम द्विपद (कन्या)
का नवांश होता है इसलिये ग्राह्य है, तब तुला क्या होगा ? तुला से सप्तमनवांश
मेष का है वह तो न शुभराशि है न द्विपद् है तो फिर तुला क्यों ग्राह्य हुआ ॥४॥

३२ विवाहवृन्दावनम्- [ नवांशचिन्ता-
अत्र पुनः प्रत्युत्तरं कथयति-
द्विचरणः शुभभं च नवांशकस्तदयमेकतरः परिगृह्यते ।
इदमसंगतमंग तवेरितं जगति नैकवशात् किल सौहृदम् ॥ ५ ॥
सं० - नवांशको द्विचरणः, शुभभं च भवति, तदयं ( नवांशकः )
एकतरः ( द्विचरणो वा शुभभं वा ) परिगृह्यते, एवं त्वयोच्यते चेत्, तदा
हे अङ्ग ! इदं तवेरितं ( त्वया कथितं ) असङ्गतमेव । किल यतो जगति
संसारे एकवशात् सौहृदं न भवति ॥ ५ ॥
भा०-यदि ऐसा कहो कि--द्विपद और शुभग्रह की राशि इन दो में से
एक भी हो तो ग्रहण किया जाता है। परन्तु हे मित्र ! तुम्हारा यह भी कहना
असङ्गत है, क्योंकि संसार में केवल एक से ही मैत्री नहीं होती है ॥ ५ ॥
अथात्र सिद्धान्तमाह-
खचरयोः सखिता यदि कारणं ध्वनति सा नितरां यवनाध्वनि ।
कलशसिंहनवांशपशत्रुता परिणमत्युभयोरपि शास्त्रयोः ॥ ६ ॥
सं०-यदि खचरयोः (उदयास्तांशाधिपयोः) सखिता (मैत्री)
एव कारणं स्यात् तदा सा (सखिता = ग्रहमैत्री) यवनाध्वनि यवना-
चार्यमार्गे नितरां ध्वनति (शब्दायते सर्वत्र प्रसिद्धेत्यर्थः) । सत्याचार्यमतेन
धनुर्मिथुनयोः सखित्वाभावाद् यवनमैत्रमेव साधुतरमिति भावः । कुम्भ
सिंहांशत्यागे युक्तिं कथयति-उभयोः (यवन-सत्याचार्ययोर्द्वयोः) अपि
शास्त्रयोः कलशसिंहनवांशपशत्रुता परिणमति । अतो यवनमैत्र्यापि
तत्त्याज्यता सिद्धयत्यतो यवनमतमेव प्रधानमित्याचार्यस्याभिप्रायः ॥ ६ ॥
भा०-यदि लग्न सप्तम के नवांशाधिपों में मैत्री होना ही कारण हो तो-
वह मैत्री यवनशास्त्र में ही प्रसिद्ध है । सत्याचार्य के मत से धनु मिथुन के स्वामियों
में मैत्री नहीं है । और कुम्भ सिंह के स्वामियों में शत्रुता तो दोनों ही (यवन
और सत्याचार्य) के शास्त्र में प्रसिद्ध है । "इसलिये यवनमत से भी कुम्भ सिंह
त्याज्य है, अतः यवन ही का मत श्रेष्ठ है" यह आचार्य का आशय है ॥ ६ ॥
नवांशपतिमैत्री विचार्यते चेत्तर्हि राशिपतिमैत्री किं नेत्याह-
अथ तयोः समसप्तसुहृत्पथः कथमसूक्ष्मगतिः स च नैकधा ।
इह हि लग्नगतान्यनुमेनिरे तदखिलैः खलखेटगृहाण्यपि ॥ ७ ॥

प्रकरणम् ४ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ३३

सं०-अथ तयोः ( यवन-सत्याचार्यमतयोः ) समसप्तसुहृत्पथः कथं
असूक्ष्मगतिः ? अपि तु सूक्ष्मगतिरेव । स च ( सुहृत्पथः) हि यतः एकधा
न, अपि तु तत्कालनिसर्गभेदाद् द्विधाऽस्ति, तत् तस्मात् इह ( विवाहे )
अखिलैः ( समस्तैः = यवनसत्यादिभिः ) खलखेटगृहाणि ( पापभानि )
अपि अनुमेनिरे, किं पुनः शुभगृहाणीत्यर्थः ॥ ७ ॥
भा०-परस्परसमसप्तक मैत्री दोनों ( यवन और सत्याचार्य ) के शास्त्र में
असूक्ष्म कैसे हो सकता है ? अर्थात् सूक्ष्म ही है । परञ्च वह मैत्री एकही प्रकार
का नहीं है, अर्थात् तात्कालिक नैसर्गिक भेद से अनेक प्रकार है । इसलिये सब
( यवन-सत्य आदि ) आचार्यों ने पापग्रहराशियों को भी स्वीकार किया है, अर्थात्
लग्न में सब राशि गृहीत है ॥ ७ ॥
तत्रापि पूर्णशुभफलादिकत्वं प्रतिपादयति-
इति तुलाजितुमप्रमदाधनुः-प्रथमखण्डमखण्डफलं जगुः ।
सततमस्तपतिद्विषदीश्वरं नवलवं बलवन्ध्यपतिं त्यजेत् ॥ ८ ॥
सं०-इत्यस्मात् ( उपरोक्तकारणात् ) तुला-जितुम-प्रमदा-धनुः-
प्रथमखण्डं सततं ( अनवरतं ) अखण्डफलं ( पूर्णशुभफलं ) जगुः
( आचार्या ऊचुः ) । अथात्र विशेषं कथयति-अस्तपतिद्विषदीश्वरं
( अस्तपतेः सप्तमेशस्य द्विषत शत्रुः ईश्वरो यस्य तं ) नवलवं तथा बल-
वन्ध्यपतिं ( बलने वन्ध्यः पतिर्यस्य तं ) नवलवं ( नवांशं ) च त्यजेत् ॥
भा०--उपरोक्त कारणों से--तुला, मिथुन, कन्या और धनु का पूर्वार्ध इनमें
शुभ फल होता है। ऐसा प्राचीनाचार्यों ने कहा है। सप्तमेश के शत्रु जिस
राशि का स्वामी हो उस नवांश को तथा जिसका स्वामी निर्बल हो उस नवांश
को त्याग देना चाहिये ॥ ८ ॥
अथ लग्नसप्तमयोः शुद्धिं कथयति --
लवपतिः कुरुते लवलग्नयोः पतिमृतिं त्रिवसुव्ययवित्तगः ।
नवलवास्तपतिः प्रतिहन्त्यसून् मृगदृशश्च तदस्तभयोस्तथा ॥ ६ ॥
सं०-लवपतिः ( नवांशस्वामी ) लवलग्नयोः त्रिवसुव्ययवित्तगः
पतिमृतिं ( वरमरणं ) कुरुते । तथा नवलवास्तपतिः ( नवांशसप्तमेशः )
तदस्तभयोः ( नवांशसप्तमात्-लग्नसप्तमाद्वा ) तथा ( त्रिवसुव्ययवित्तगः )
मृगदृशः ( कन्यायाः ) असून् प्राणान् प्रतिहन्ति ( नाशयति ) ॥ ९ ॥
५

३४ विवाहवृन्दावनम्- [ नवांशचिन्ता-

भा०—उद्गगतनवांश का स्वामी नवांश से अथवा लग्न से ३, ८, १२, २*
इन स्थानों में हो तो वर का नाश करता है । यदि नवांश का सप्तमेश नवांश-
सप्तम से वा लग्न सप्तम से ३, ८, १२, २, में हो तो कन्या का नाश करता है ।
उभयहक् फलदा बलदाढ्य॑तो लवदृगुद्वहते क्रियदूनताम् ।
तदिह केवललग्नदृशः फलं शकलितं कलितं यवनेश्वरैः ॥१०॥
सं०—उभयदृक् ( उभयस्य = लग्नस्य, नवांशस्य च दृष्टिः ) बल-
दाढ्यंतो ( बलदृढ़त्वात् कारणात् ) फलदा ( विशिष्टफलप्रदा ) स्यात् ।
लवदृग् ( केवलनवांशदृष्टिः ) क्रियदूनतां ( किञ्चिन्न्यूनतां ) उद्वहते ।
तत् ( तस्मात् ) इह ( विवाहे ) केवललग्नदृशः फलं यवनेश्वरैः शकलितं
( खण्ड

प्रकरणम् ४ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ३५

सं०—इह ( विवाहकाले ) अंशपतिः विलग्नविलोकने सति निजं
नवांशकं कलयति ( पश्यति ) । नवांशपतिः यं अवलोकयते स तनोः
( लग्नात् ) पृथक् , यद्येवं तदा तदिष्टफलाय जलाञ्जलिः स्यात् ( लग्न-
फलमपि नष्टमेवेत्यर्थः ) ॥ १२ ॥
भा०—नवांशपति लग्न को देखने पर उसके मध्यस्थ अपने नवांश को भी
देखता ही है । अगर ऐसा कहो कि—जिस नवांश को वह देखता है, वह लग्न
से पृथक् है, तब तो लग्न के फल के लिये तिलाञ्जलि देना होगा ( अर्थात् शुभ
नवांशजन्य लग्न का शुभफल भी नहीं होगा ) ॥ १२ ॥
अपृथगस्ति स चेन्ननु पश्यता तनुमसावधिपेन निरूपितः ।
हृदयहारदृशैव मृगीदृशः प्रणयिना तरलस्तरलद्युतिः ॥१३॥
सं०—ननु ( अहो ! ) चेत् स ( नवांशः ) अपृथक् ( लग्नान्तर्गत
एव ) अस्ति, तदा असौ ( नवांशः ) तनुं पश्यता अधिपेन ( स्वस्वामिना )
निरूपितः ( दृष्ट एव ) । 'केन क इव'—मृगीदृशः (स्त्रियाः) हृदयहारदृशा
( हृदयहारे दृग्दृष्टिर्यस्य तेन ) प्रणयिना प्रियेण तरलद्युतिस्तरलो हार-
मध्यस्थमणिरिव । हारे दृष्टे तन्मध्यस्थो मणिरपि यथा दृष्टो भवति, तथैव
लग्ने दृष्टे तदन्तर्गतनवांशोऽपि दृष्ट एवेत्यर्थः ॥ १३ ॥
भा०—यदि नवांश लग्न के अन्तर्गत ही है तब तो—लग्न पर स्वामी की
दृष्टि होने से नवांश भी दृष्ट होगा, जैसे पति अपनी स्त्री के हृदयस्थितहार पर
दृष्टि रखने से हार के मध्यस्थित मणि को भी देखता ही है ॥ १३ ॥
अथ परमतं दूषयति—
तनुपतिस्तनुपस्तमथास्तपो यदि न पश्यति नश्यति तत्कृतम् ।
इति परः परमत्र मते पतेल्लवतरौ बत रौद्र इवाशनिः ॥१४॥
सं०—"यदि तनुपतिः तनुं, तथास्तपोऽस्तं ( सप्तमं ) न पश्यति
तदा तत्कृतं 'शुभफलं' नश्यति" इति परः प्राह । परं बत 'इति खेदे'
अत्र मते लवतरौ ( नवांशरूपवृक्षे ) रोद्रः कठोरः इव अशनिर्वज्रं पतेत् ॥
भा०—यदि लग्नेश लग्न को और सप्तमेश सप्तम को न देखे तो लग्न और
नवांश का फल नष्ट हो जाता है, ऐसा किसी ने कहा है । परञ्च इस प्रकार के
मत में तो नवांशरूपी वृक्ष पर कठोर वज्रपात ही है ॥ १४ ॥

३६ विवाहवृन्दावनम्- [ नवांशचिन्ता-
अथ जन्मलग्नराशिभ्यामुद्यास्तशुद्धिमाह-
जननलग्नभयोर्मृतिशासितुर्मृतिगतस्य च राशिनवांशकाः ।
तनुगता यदि तत्तनुते वधूरतिलका तिलकाय जलाञ्जलिम् ॥१५॥
सं०-जननलग्नभयोः ( जन्मलग्न-जन्मराशिभ्यां ) मृतिशासितुः
( अष्टमेशस्य ), मृतिगतस्य ( अष्टमस्थानस्थितस्य ) च राशिनवांशकाः
तनुगताः ( लग्नस्थिताः ) यदि स्युः, तत् तदा वधूः अतिलका स्वामिरहिता
सती तिलकाय (स्वामिने) जलाञ्जलिं तनुते- 'विधवा भवतीत्यर्थः' ।१५।
भा०-जन्मलग्न और जन्मराशि से अष्टमेश की राशि के वा अष्टमस्थान-
स्थित ग्रह की राशि के नवांश लग्न में हो तो वह स्त्री विधवा होकर अपने स्वामी
को जलाञ्जलि देती है ॥ १५ ॥
वि०- "स्वयं जलाञ्जलि देती है" इस शब्द से अनपत्यता योग भी सिद्ध
होता है ॥ १५ ॥
अथाष्टमलग्नदोषं तत्परिहारं च कथयति-
व्यलिवृषं जननर्क्षविलग्नयोर्भवनमष्टममभ्युदितं त्यजेत् ।
सितपुलस्तिमतेन तदीशता तनुसमेति समेति न दूषणम् ॥१६॥
सं०-जननर्क्षविलग्नयोः ( जन्मराशिलग्नाभ्यां ) व्यलिवृषं ( वृष-
वृश्चिकभिन्नं ) अष्टमभवनं अभ्युदितं ( लग्नगतं ) त्यजेत् । यतः तदीशता
( तयोर्वृषवृश्चिकयोरोशता = स्वामिता ) तनुसमा 'तत्स्वाम्येव लग्नस्यापि
स्वामीत्यर्थः' इत्यस्मात् सितपुलस्तिमतेन दूषणं न समेति ( नागच्छति ) ॥
भा०-जन्मलग्न और जन्मराशि से वृष वृश्चिक से अतिरिक्त अष्टमराशि
विवाहलग्न में छोड़ देना चाहिये । क्योंकि अष्टमस्थ वृश्चिक और वृष के स्वामी ही
लग्न का भी स्वामी होता है, इसलिये शुक्र और पुलस्ति के मत से दोष नहीं
आता है ॥ १६ ॥
वि०- मेष लग्न में अष्टम वृश्चिक, और तुला लग्न में अष्टम वृष पड़ता है,
अतः एकाधिपत्य होने के कारण वृष, वृश्चिक अष्टम होने पर भी विवाह लग्न में
ग्राह्य है । और अन्य त्याज्य है ॥ १६ ॥
अथ चरत्रययोगे दोषमाह-
चरलवञ्चरवेश्मगमुत्सृजेन्मृगतुलाधरगे मृगलक्ष्मणि ।
युवतिरत्र भवेत्कृतकौतुका मदनवत्यनवत्यजनोन्मुखी ॥१७॥

प्रकरणम् ४ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ३७

सं०-मृगलक्ष्मणि चन्द्रे मृगतुलाधरगे सति चरवेश्मगं ( चरलग्न-
गतं ) चरलवं ( चरनवांशं ) उत्सृजेत् ( त्यजेत् ) । यतोऽत्र कृतकौतुका
( विवाहिता ) युवतिः मदनवती कामातुरा सती अनवत्यजनोन्मुखी
( अनवस्य पुरातनस्य भर्तुः त्यजने उन्मुखी उत्सुका ) भवति ॥१७॥
भा०-मकर वा तुला में चन्द्रमा हो तो चरलग्न में चरनवांश त्याज्य है ।
क्योंकि उसमें विवाहिता स्त्री कामातुरा होकर पूर्वपति को त्याग कर परपुरुष से
प्रीति करने के लिये उत्कण्ठिता होती है ॥१७॥
अथ चतुर्थद्वादशभावयोर्दोषं तत्परिहारं चाह—
सुखगृहं सुखहृत्तनुजन्मनोरबलताशबलैः सुखकर्तृभिः ।
अपि तयोर्व्ययभं व्ययभंकृ चेद्विगतबाधनका धनकारिणः ॥१८॥
सं०-सुखकर्तृभिः ( चतुर्थेशादिसुखभावसम्बन्धिग्रहैः ) अबल-
ताशबलैः ( दौर्बल्यदूषितैः = निर्बलैः सद्भिः ) तनुजन्मनोः ( जन्मलग्न-
जन्मराश्योः ) सुखगृहं चतुर्थस्थानं 'विवाहलग्नगतं' सुखहृत् भवति ।
तयोः ( जन्मलग्न-राश्योः ) व्ययभं द्वादशगृहं अपि 'विवाहलग्नगतं'
व्ययभंकृ ( व्ययनिवारकं ) भवति—चेत् धनकारिणः ( द्वितीयेशादि-
धनभावसम्बन्धिग्रहाः ) विगतबाधनकाः ( बाधारहिताः = सबलाःस्युः )
तदा । निर्बलाश्चेत् तदा व्ययकारक एवेत्यर्थः ॥१८॥
भा०--चतुर्थेश आदि सुखकारक ग्रह निर्बल हो तो जन्मलग्न जन्मराशि से
चतुर्थ राशि विवाहलग्न में सुखनाशकारक होता है । तथा जन्मलग्न वा जन्म-
राशि से द्वादशराशि विवाहलग्न में पड़े और यदि द्वितीयेशादि धनकारक ग्रह
पुष्टबली हो तो व्यय को भंग करनेवाला होता है । अर्थात् धनकारक ग्रह निर्बल
हो तो व्ययकारक ही होता है ॥१८॥
जन्मकालिकपापगतनवांशदोषं तदपवादं च कथयति--
अशुभकृत्खलगः खलु योंशको जनुरनेहसि नेह सितांशुगे ।
तनुगतेपि शिवं युवयोष्योर्बलवतो लवतो न भयं क्वचित् ॥१६॥
सं०-जनुरनेहसि(जन्मकाले)अशुभकृत्खलगः योंऽशकः (नवांशः)
अस्ति, इह ( अस्मिन् नवांशे ) सितांशुगे ( चन्द्रगते )तनुगते ( लग्नस्थे )
अपि वा, युवयोष्योः ( वरकन्ययोः ) शिवं शुभफलं न स्यात् । परञ्च
बलवतो लवतः ( बलयुक्तान्नवांशात् ) क्वचिद् भयं न स्यात् ॥ १९ ॥

३८ विवाहवृन्दावनम्- [ लग्नबल-
भा० - जन्म समय में अशुभकारक पापग्रह जिस नवांश में हो वह विवाह-
कालिक चन्द्रमा में वा लग्न में पड़े तो वर कन्या को शुभ फल नहीं होता है ।
परञ्च वह नवांश बलवान् ( स्वामी-शुभ ग्रह से युत दृष्ट ) हो तो कहीं कुछ भी
भय नहीं होता है ॥१९॥
अथ दोषान्तरं कथयति--
अनुजनुर्मुतिगो मृतिपश्च यः स तनुगस्तनुते न शिवं कचित् ।
इति विविक्तिरियं फलदा सदा स इह सिद्धयति चेत्समयः स्फुटः ॥
सं - अनुजनुः ( जनुरनुक्रम्य = अनुजनुः, जन्मसमये इत्यर्थः )
मृतिगः ( अष्टमगतः ) यः, मृतिपश्च ( अष्टमपतिश्च ) यः स तनुगतः
( विवाहलग्नस्थः ) क्वचित् शिवं (शुभं) न तनुते । इत्येवं इयं (पूर्वोक्ता)
विविक्तिः ( विवेकोक्तिः ) 'तदैव' सदा फलदा स्यात्, चेत् यदि स समयः
( जन्मेष्टकालः, विवाहेष्टकालश्च ) स्फुटः सिद्ध्यति ॥२०॥
भा०- जन्मलग्न से अष्टमस्थान स्थित ग्रह और अष्टमेश जो हो वह ग्रह यदि
विवाह लग्न में पड़े तो कभी शुभ नहीं होता है । इस प्रकार यह पूर्वोक्त विवेक
तभी फलप्रद हो सकता है यदि जन्मेष्टकाल, और विवाहेष्टकाल अत्यन्त स्पष्ट हो ।
अन्यथा नहीं ॥ २० ॥
अथ लग्नबलाध्यायः ।
तत्र ग्रहाणां शुभाशुभस्थानानि कथयति-
अरिपराक्रमलाभविनाशगो रविरविश्रमसौख्यसुतार्थदः ।
मदनमूर्तिशयः शयसंग्रहे मृगदृशामशनिः शनिराहुवत् ॥ १ ॥
सं०-मृगदृशां ( स्त्रीणां ) शयसंग्रहे ( पाणिग्रहणे ) अरिपराक्रम-
लाभविनाशगः ( षष्ठतृतीयैकादशाष्टमस्थानस्थः ) रविः अविश्रमसौख्य-
सुतार्थदः ( अनायास-सुख-पुत्रधनप्रदः ) स्यात् । तथा-मदनमूर्तिशयः
( सप्तम-लग्नयोर्गतः ) अशनिः ( वज्रमिव, घातकः ) स्यात् । किंवत् ?
शनिराहुवत् ( शनिराहू यद्वदेषु स्थानेषु तद्वदित्यर्थः ) । अर्थात् शनिराहो-
रपि रवितुल्यमेव फलं स्यात्, केतुफलमपि राहुवज्ज्ञेयम् ॥ १ ॥

प्रकरणम् ५ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ३६
भा०--स्त्रियों के पाणिग्रहण समय में लग्न से ६, ३, ११, ८ इन स्थानों में
रवि हो तो अनायास सुख, पुत्र और धनदायक होता है । तथा सप्तमस्थान वा
लग्न में रवि हो तो वज्र के समान शुभफल का नाशक होता है । जैसे शनि राहु
और केतु । अर्थात् शनि राहु केतु भी इन स्थानों में रवि के समान ही हैं ॥
त्रिधनलाभसुखेषु शुभः शशी निधनमूर्त्तिरिपुष्वतिगर्हितः ।
अशुभशुक्रसखः स खनत्यसून् दिनकरोनकरो न करोति शम् ॥
सं० त्रिधनलाभसुखेषु 'स्थितः' शशी शुभः स्यात् । निधनमूर्त्ति-
रिपुषु ( अष्टम-लग्न-षष्ठेषु ) स शशी अतिगर्हितः ( अत्यन्तदुष्टः ) स्यात् ।
शेषस्थानेषु सामान्यगर्हितः' इत्यर्थात् सिद्ध्यति । तथा स ( चन्द्रः )
अशुभशुक्रसखः ( अशुभ-शुक्राभ्यां सहितः ) असून् प्राणान् खनति
( नाशयति ) । तथा दिनकरोनकरः ( दिनकरेण ऊनाः करा यस्य सः
सूर्येण सहास्तमितः ) शं सुखं न करोति ॥ २ ॥
भा०--चन्द्रमा विवाहलग्न से ३, २, ११, ४ इन स्थानों में शुभप्रद है ।
और ८, १, ६ इन स्थानों में अत्यन्त अशुभ है । अशुभग्रह वा शुक्र से युक्त चन्द्रमा
हो तो प्राणनाशक होता है, तथा सूर्य के साथ अस्त हो तो भी शुभफल नहीं
देता है ॥ २ ॥
अवनिजस्त्रिभवारिषु वृद्धये मृतिकरो मृतिमूर्त्तिमदाश्रितः ।
इह नभोयुजि जीवदृशं विना च्युतनया तनयामिषभुग्वधूः ॥ ३ ॥
सं०—अवनिर्जः ( मङ्गलः ) त्रिभवारिषु वृद्धये भवति, तथा—मृति-
मूर्त्तिमदाश्रितः मृतिकरो भवति । इह ( अस्मिन् मङ्गले ) नभोयुजि
( दशमस्थानस्थे ) सति जीवदृशं ( गुरुदृष्टिं ) विना वधूः ( स्त्री )
च्युतनया ( नीतिरहिता ) तनयामिषभुक् ( सन्तानघातिनी भवतीत्यर्थः )
जीवदृष्टिश्चेत् तदा शुभफलं स्यादित्यर्थात् सिद्ध्यति ॥ ३ ॥
भा०—मङ्गल विवाहलग्न से ३, ११, ६ में वृद्धिकारक होता है । और
८, १, ७ में मरणकारक होता है । यदि १० स्थान में हो और उस पर गुरु की
दृष्टि न हो तो वह स्त्री अनीति करने वाली और अपने सन्तान को नाश करनेवाली
होती है । यदि बृहस्पति की दृष्टि हो तो शुभफल समझना ॥ ३ ॥
व्ययगृहं विरहय्य हिमांशुजः सकलवेश्मसु वेश्मसुतार्थदः ।
स नियतं विदधाति वधूवरं यमकरे मकरेङ्गितमृत्युगः ॥ ४ ॥

४० विवाहवृन्दावनम्— [ लग्नबल-
सं०—हिमांशुजः ( बुधः ) व्ययगृहं विरहय्य ( त्यक्त्वा ) सकल-
वेश्मसु वेश्मसुतार्थदः स्यात् । स ( बुधः ) मकरेङ्गित-मृत्युगः ( सप्तमा-
ष्टमस्थानस्थितः ) वधूवरं नियतं यमकरे विदधाति (मृत्युं प्रापयतीत्यर्थः) ।
भा०—बुध विवाहलग्न से १२ को छोड़कर शेष ( १, २, ३, ४, ५, ६,
९, १०, ११ ) स्थानों में, गृह, पुत्र और धन दायक होता है। तथा ७ । ८
स्थानों में हो तो वर और कन्या को यमराज के हाथ में पहुँचा देता है, ॥ ४ ॥
गुरुरनन्त्यमदेषु मुदं श्रियं सृजति कालगृहे गृहभङ्गदः ।
अशुभकृन्मकरेपि करग्रहे न मृगराजगतो जगतो हितः ॥ ५ ॥
सं०—गुरुः विवाहे अनन्त्यमदेषु ( द्वादश-सप्तमरहितेषु ) स्थानेषु
स्थितः मुदं ( हर्षं ) श्रियं ( सम्पत्तिं ) च सृजति करोति । कालगृहे
( अष्टमस्थाने ) स्थितः गृहभङ्गदः (गृहं भार्या, तद्विनाशको भवतीत्यर्थः) ।
मकरेऽपि 'स्थितो गुरुः' अशुभकृत् स्यात् । मृगराजगतः ( सिंहस्थितः )
गुरुः जगतः ( संसारस्य ) हितो न भवति ॥ ५ ॥
भा०-बृहस्पति विवाह लग्न से १, २, ३, ४, ५, ६, ९, १०, ११ इन
स्थानों में आनन्द और सम्पत्ति दायक होता है। अष्टम स्थान में स्त्री का नाश-
कारक होता है। तथा मकरस्थ गुरु अशुभ होता है। ओर सिंहस्थ गुरु संसार
का हितकारक नहीं होता है ॥ ५ ॥
सहसपत्ननिमीलनमन्मथे प्रथमदेवगुरुर्गुरुभीतिकृत् ।
वहति शेषगृहेषु महोत्सवं व्ययगतः समतां स मतान्तरात् ॥ ६ ॥
सं०—प्रथमदेवगुरुः ( शुक्रः ) सहसपत्ननिमीलनमन्मथे*स्थितः
गुरुभीतिकृत् ( महाभयकारकः ) स्यात् । शेषगृहेषु महोत्सवं वहति
ददाति । मतान्तरात् व्ययगतः ( द्वादशस्थः ) स ( शुक्रः ) समतां वहति
( शुभाशुभं न ददातीत्यर्थः ) ॥ ६ ॥
भा०—शुक्र विवाह लग्न से ३, ६, ८, ७ इन स्थानों में महा भयकारक
होता है। शेष स्थानो में अतिशय मङ्गलकारक है। तथा मतान्तर ( अन्याचार्यों
के मत ) से १२ स्थान में सम हो जाता है ( अर्थात् शुभ अशुभ कुछ भी नहीं
देता हैं ) ॥ ६ ॥

  • नामैकदेशग्रहणेन नामग्रहणात्—'सहे'ति सहजं तृतीयं स्थानम् ॥

प्रकरणम् ५] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ४१
अथ दुरधरा ( कर्तरो ) दोषं जामित्रदोषं च कथयति --
खलकृता तनुरोहिणीमित्रयोर्दुरधरा विधुरां कुरुते वधूम् ।
श्रुतिशरांशमितं स्मरभे तयोर्ग्रहमपुण्यमपुण्यमिव त्यजेत् ॥ ७ ॥
सं०-तनुरोहिणीमित्रयोः ( लग्नचन्द्रयोः ) खलकृता पापग्रहजनिता
दुरधरा 'कर्तरी'* वधूं विधुरां ( दुःखिनीं ) कुरुते । तयोः (लग्नचन्द्रयोः)
स्मरभे ( सप्तमे ) श्रुतिशरांशं चतुःपञ्चाशन्नवांशं इतं ( प्राप्तं ) अपुण्यं
( पापग्रहं ) अपुण्यं ( पापं ) इव त्यजेत् ॥ ७ ॥
भा०-विवाहकालिक लग्न और चन्द्रमा में पापसम्बन्धी दुरधरा ( कर्तरी
योग ) हो तो स्त्री दुःखभागिनी ( पतिरहिता ) होती है । तथा लग्न वा चन्द्रमा
से सप्तम में ५४ वाँ नवांश में स्थित पापग्रह को पाप के समान ही त्याग कर
देना चाहिये ॥ ७ ॥
अथ गुरुशुक्रयोर्बाल्यादिदोषं कथयति-
क्षिपति सप्त दिनान्युदयास्तयोः सुरगुरुश्च भृगुश्च गतैष्ययोः ।
इह युगेपि युगस्य करग्रहः स्फुटममङ्गलदो गलदोजसि ॥ ८ ॥
सं०-सुरगुरुः, भृगुश्च गतैष्ययोः उदयास्तयोः ( उदये गते, अस्ते
एष्ये सतीत्यर्थः ) सप्तदिनानि क्षिपति ( शुभकार्यं विनाशयतीत्यर्थः ) तथा
इहास्मिन् युगे ( गुरु-शुक्रद्वये ) गलदोजसि ( निर्बले ) अपि युगस्य
( वधूवरद्वयस्य ) करग्रहः ( विवाहः ) स्फुटं अमङ्गलदो भवति ॥ ८ ॥
भा०-गुरु और शुक्र उदय से पीछे और अस्त होने से पूर्व ७।७ दिन
शुभकार्य के विनाशकारक होते हैं । अर्थात् ७ दिन बाल्य और ७ दिन वृद्ध रहते
हैं, उसमें विवाहादि शुभकार्य त्याज्य है । तथा ये ( गुरु, शुक्र ) यदि निर्बल हों
तब भी वरवधू का विवाह अत्यन्त अशुभप्रद होता है ॥ ८ ॥
अथात्र विशेषं कथयति-
शिशुजरत्वमहान्युदयास्तयोर्दश चतुर्दश चाङ्गिरसः स्फुटम् ।
उशनसो दश पञ्च च पश्चिमे गतिवशाच्चिदशाहमपश्चिमे ॥ ६ ॥
सं०-अङ्गिरसः ( गुरोः ) उदयास्तयोः दश चतुर्दश अहानि
( दिनानि ) 'क्रमेण' स्फुटं शिशुजरत्वं ( बाल्य-वृद्धत्वं ) स्यात् । उशनसः

  • द्वितीय-द्वादशयोर्ग्रहस्थित्या दुरधरा भवति ॥
    ६

' or 'तृ'?
Wait! Look at the translation in line 27:
"पुत्र आदि तथा मित्रों"
Wait, where does "आदि" come from?
Wait, does it say "पुत्रमित्र"?
Wait, in line 20: "तत्कुलमित्रजनेष्वपि"
In line 23: "तत्कुलमित्रजनेषु ( तयोर्वधूवरयोः कुलेषु मित्रजनेषु च )"
In line 27: "उसके कुल ( पुत्र आदि ) तथा मित्रों ( सम्बन्धियों ) में"
Here:
"कुल" -> translated as "(पुत्र आदि)"!
"मित्र" -> translated as "मित्रों (सम्बन्धियों)"!
Wait! "तत्कुलमित्रजनेष्वपि" has कुल and मित्र!
In line 31, does the verse say: "पुत्रमित्रतिथिष्वपि"?
Wait, if it's "पुत्रमित्रतिथिष्वपि":
पु (1) त्र (2)
मि (3) त्र (4)
ति (5) थि (6)
ष्व (7) पि (8)
= 8 syllables!
पु-त्र-मि-त्र-ति-थि-ष्व-पि!
Yes! 8 syllables!
Let's look at letter 3 and 4:
Letter 3: म with hrasva i = 'मि'! Wait, look at the vertical line and loop: it has a loop at the bottom, just like '

प्रकरणम् ६ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ४३


अथ चन्द्रबलाध्यायः ।
तत्रादावन्येषां मतं दूषयति-
कन्यकावितरणाय पूरुषः पात्रमात्रमिति नैन्दवम्बलम् ।
केचिदस्य वितरन्ति कोविदाः कोविदां किल करोतु तन्मनः ॥ १ ॥
सं०—कन्यकावितरणाय ( कन्यादानाय ) पूरुषः (वरः ) 'पात्रमा-
त्रम्' इत्यस्मात् केचित् कोविदाः ( पण्डिताः ) अस्य वरस्य ऐन्दवं बलं
( चन्द्रबलं ) न वितरन्ति ( न ददति = न विचारयन्तीत्यर्थः ) । तन्मनः
( तेषां कोविदानां मनः ) कोविदां करोतु ? (को जानातु ?) ॥ १ ॥
भा०—कन्यादान के लिये वर पात्रमात्र है' इस अभिप्राय से कितने आचार्य
वरका चन्द्रबल नहीं देते हैं। परञ्च इसप्रकार उनका मन कौन समझ सकता है ?
अथ दोषं कथयति-
ईदृशं यदि ततः प्रतिग्रहग्राहिणोऽस्य किमभिप्रपञ्चितैः ।
सांशनाडिगणयोनिशुद्धिभिर्जन्मलग्नभवनव्ययाष्टगैः ॥ २ ॥
सं०—"पात्रमात्रत्वात् वरस्य चन्द्रबलं न देयम्” यदि ईदृशं तदा
प्रतिग्रहग्राहिणः अस्य ( वरस्य ) सांशनाडिगणयोनिशुद्धिभिः, तथा जन्म-
लग्नभवनव्ययाष्टगैरित्यादिभिः अभिप्रपञ्चितैः किं ? । यदि 'अंश-
नाडिगणादीनां शुद्धिर्विलोक्यते तदा चन्द्रबलमपि विचार्यमेव, चेत्प्रतिग्राहि-
त्वात् चन्द्रबलं न विचार्य तर्हि योनिनाड्यादीनां शुद्धिरपि न विचार्येत्यर्थः ।
भा०—यदि ऐसा ही है कि—'प्रतिग्राही होने से पात्र मात्र समझ कर वर
का चन्द्रबल नहीं देखा जाय' तो फिर—अंश, नाडी, गण, योनि आदि की शुद्धि
और जन्मलग्न के अष्टम द्वादश आदि शुद्धि इत्यादि प्रपञ्चों से क्या प्रयोजन ?
अर्थात् सब कुछ विचारते हैं तो चन्द्रबल भी देखना ही चाहिये ॥ २ ॥
लग्निको नवलवः पुमन्तकृत् स्वामिना यदि न युक्तवीक्षितः ।
सङ्गमं दिशति दीर्घनिद्रया पत्युरिन्दुतनुकामगो ग्रहः ॥ ३ ॥
सं०—लग्निको नवलवः ( लग्नगतो नवांशः ) यदि स्वामिना युक्त-
वीक्षितः न भवेत् तदा पुमन्तकृत् ( वरनाशकरो ) भवति । इन्दुतनुका-
मगः ( चन्द्रलग्नाभ्यां सप्तमस्थः ) ग्रहः पत्युः दीर्घनिद्रया (मृत्युना) सङ्गमं
दिशति ( ददाति ) ॥ ३ ॥

४४ विवाहवृन्दावनम्- [-चन्द्रबल-
भा०-विवाह लग्नगत नवांश यदि अपने स्वामी से युक्त दृष्ट न हो तो
वर का नाशकारक होता है। तथा चन्द्रमा और लग्न से सप्तम स्थान स्थित ग्रह
भी वर को मृत्यु के साथ सङ्गम कराता है ॥ ३ ॥
चन्द्रमस्युपचयात्परिच्युते चारुगोचरचरैः परैरपि ।
कर्तुरायतिशुभं सभंगुरं निर्दिशन्ति सितशौनकादयः ॥ ४ ॥
एवमादिफलवादिनो नृणामैन्दवं बलमुशन्ति किं न ते ।
भानुरप्युपचये नृजन्मतों यन्मतांक्तिषु तदिष्टमेव नः ॥ ५ ॥
सं०-चन्द्रमसि उपचयात् परिच्युते (क्षीणे सतीत्यर्थः) परैः
(भौमादिग्रहैः) चारुगोचरचरैः (शुभस्थानस्थितैः) अपि कर्तुः
(वरस्य) आयतिशुभं (भविष्यशुभफलं) सभङ्गुरं (नश्वरं) इति
सितशोनकादयः निर्दिशन्ति कथयन्ति । एवमादिफलवादिनः (इत्याद्युप-
रोक्तफलवक्तारो ये जनाः सन्ति) ते नृणां (पुरुषाणां) ऐन्दवं बलं
(चान्द्रं बलं) किं न उशन्ति ? किं नेच्छन्ति ? ये चन्द्रादुक्तफलानि स्वी-
कुर्वन्ति ते चन्द्रबलमपि स्वीकुर्वन्त्वित्यर्थः । तथा-यन्मतोक्तिषु नृजन्मतः
पुरुषजन्मराशित उपचयेषु स्थितो भानुः शुभः, तत् नः (अस्माकमपि)
इष्टमेव ॥४॥५॥
भा०- 'चन्द्रमा के क्षीण रहने पर मंगलादि ग्रहों के उत्तम स्थान में होने से
भी पुरुष का भविष्य फल नाशवान् होता है" ऐसा सित शौनकादिक आचार्यों ने
कहा है। इत्यादि चन्द्रमा से उपरोक्त फल को जो मानते वे वर का चन्द्रबल भी
क्यों नहीं स्वीकार करते हैं ? अर्थात् उनको चन्द्रबल मानना ही चाहिये । और
जिनके मत में पुरुष की जन्मराशि से उपचय स्थान में सूर्य शुभ हैं वह तो हमारा
भी इष्ट ही है ॥४॥५॥
अथान्यप्रकारेणापि दोषं कथयति-
न त्रिवर्गपतिना नरेण चेत् कन्यया शशिवलं समाप्यते ।
दीयते यदिह गोमहीमहिष्यादि तर्हि दिश तस्य तद्वलम् ॥ ६ ॥
सं०-त्रिवर्गपतिना (धर्मार्थकामस्वामिना अपि) नरेण शशिवलं
(चन्द्रबलं) न समाप्यते, कन्ययैव (यस्या दानं भवति तयैव) शशिवलं
समाप्यते चेत्, तदा गोमही-महिष्यादि यद् वस्तु दीयते 'विवाहकाले

प्रकरणम् ६ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ४५
वराय समर्प्यते' तस्य ( गोमहिष्यादेः सर्वस्य ) तद्वलं चन्द्रबलं दिश
प्रयच्छ । इत्यतिप्रसङ्गदोषो दर्शितः अतो वरस्यापि चन्द्रबलं ग्राह्यम् ॥६॥
भा०—धर्म अर्थ काम तीनों के मालिक भी पुरुष चन्द्रबल नहीं पाता है,
और कन्या ( जिसका दान किया जाता है वही ) यदि चन्द्रबल पाती है तो
फिर विवाह समय में गाय, पृथ्वी, भैंस इत्यादि जो कुछ दिये जाते हैं उनका
भी चन्द्रबल देखो । अर्थात् इस प्रकार अतिप्रसङ्ग दोष होता है अतः वर का
भी चन्द्रबल देखना चाहिये ॥ ६ ॥
इन्दुरिन्दुवदनानुगं बलं यच्छतीह युवतिग्रहो यतः ।
सन्नृणामपि कथं षडष्टगः खण्डयत्ययमसून् प्रसूतिषु ॥ ७ ॥
सं०—इन्दुः (चन्द्रः) इन्दुवदनानुगं ( युवत्यनुसारं ) बलं यच्छति,
यतः स युवतिग्रहः ( स्त्रीग्रहः ), इति चेत्, तदा अयं ( चन्द्रः ) प्रसूतिषु
जन्मसमयेषु षडष्टगः सन्नृणां ( पुरुषाणां ) असून् ( प्राणान् ) कथं
खण्डयति ? ( नाशयति ? ) । अतः पुरुषस्यापि चन्द्रबलं ग्राह्यमेवेति ॥७॥
भा०—यदि ऐसा कहो कि—चन्द्रमा स्त्री ग्रह है इसलिये स्त्री के अनुकूल
ही बल देता है ? तो फिर जन्म समय में षट्, अष्टम स्थानस्थ चन्द्रमा पुरुष का
प्राणापहारक क्यों होता है ? अतः वर का भी चन्द्रबल देखना ही चाहिये ॥७॥
होरयापि हिमरश्मिराहतः पुंस्फलेषु सुनफानफादिषु ।
अत्रिराह बहुलेपि तारकां तारकापतिबले बलीयसीम् ॥ ८ ॥
सं०—होरया ( जातकशास्त्रेण ) अपि पुंस्फलेषु ( पुरुषफलेषु )
सुनफाऽनफादिषु ‘योगेषु’ हिमरश्मिश्चन्द्रः आहतः । अतश्चन्द्रबलं ग्राह्य-
मेवेत्यर्थः । तथा अत्रिः 'मुनिः' बहुले ( कृष्णपक्षे ) अपि तारकापतिबले
सत्येव तारकां बलीयसीं आह । सत्येव चन्द्रबले तारा बलवती भवत्य-
तश्चन्द्रबलं वरस्यापि ग्राह्यमित्यर्थः ॥ ८ ॥
भा०—जातक शास्त्र ने भी पुरुषों के फल में सुनफा अनफा आदि योगों
में चन्द्रमा को ग्रहण किया है । अर्थात् चन्द्रमा से ही योगफल कहा है । तथा
अत्रिमुनि कृष्णपक्ष में भी चन्द्रबल ( शुभस्थानस्थित ) रहने पर ही तारा को
बलवती कहे हैं । अतः वर का भी चन्द्रबल ग्रहण करना चाहिये ॥ ८ ॥
पुनरन्यमतमुपन्यस्य दूषयति —
प्रोषिते विकलवर्ष्मणि प्रिये तोल्लिलिः स्त्रियमियेष कारिणीम् ।

४६ विवाहवृन्दावनम्— [चन्द्रबल-
अस्तु किन्तु न पतिप्रतीपतां साऽन्यथा घटयितुं पटीयसी ॥ ६ ॥
सं०—प्रिये स्वामिनि प्रोषिते ( देशान्तरं गते ) सति, विकलवर्ष्मणि
( रुग्णशरीरे सति ) वा तोलिलिः 'मुनिः' स्त्रियं कार्यिणीं ( कार्याधि-
कारिणीं ) इयेष ऐच्छत् । अस्तु ( सा कार्यकारिणी भवतु ) किन्तु सा
( स्त्री तारा वा ) अन्यथा पतिप्रतीपतां ( स्वामिवैपरीत्यं ) घटयितुं ( कर्तुं )
न पटीयसी न क्षमा । अतः सत्येव चन्द्रानुकूलत्वे ताराबलं ग्राह्यमिति
सिद्धयति ॥ ९ ॥
भा०—पति के विदेश जाने पर अथवा रुग्ण होने पर तोलिलि मुनि स्त्री
को कार्यकारिणी कहे हैं। अस्तु ऐसा हो सकता है—परञ्च उस हालत में भी स्त्री
अपने स्वामी के अभिप्राय से विरुद्ध नहीं कर सकती है । अतः चन्द्रमा के क्षीण
रहने पर भी अनुकूलत्व देखना चाहिये केवल ताराका बल अकार्यक ही है ॥६॥
कृष्णपक्षेऽपि चन्द्रो न विनश्यतीत्याह—
क्रौर्यमेति बहुले स केवलं नैव नश्यति तमाममां वसन् ।
नास्ति चैष यदि तत्र तत्कथं तत्कृता जनिषु रिष्टरौद्रता ॥१०॥
सं०—बहुले कृष्णपक्षे स चन्द्रः क्रौर्यं ( क्रूरत्वं ) एति गच्छति ।
तथा अमांवसन्नपि नैव नश्यति तमाम् ( अतिशयेन नैव नश्यति ) । यदि
च एष ( चन्द्रः ) तत्र ( तस्याममायां ) नास्ति ( अतिशयेन नष्टः )
तत्तदा जनिषु जन्मकालेषु तत्कृता रिष्टरौद्रता रिष्टक्रूरता कथं स्यात् ? ।
अतोऽमायां चन्द्रो न नश्यति, किञ्च प्रकाशविहीनो भवति ॥१०॥
भा०—कृष्णपक्ष में चन्द्रमा में केवल क्रूरता होती है। अमावश्या में सूर्य
के साथ अस्त होने पर वह सर्वथा नष्ट नहीं हो जाता है। यदि कहो कि—
अमावश्या में चन्द्रमा नहीं रहता है। तो फिर अमावश्या में भी जन्मकालिक-
चन्द्रजन्य अरिष्ट की क्रूरता क्यों कही जाती है ? । अतः अमावश्या में चन्द्रमा
नष्ट नहीं हो जाते । सूर्य के साथ रहने से तेजविहीन मात्र हो जाते हैं ॥१०॥
ताराबले सिद्धान्तं कथयति –
पार्श्वगे निजपतौ कुटुम्बिनी दुर्बलेऽपि तदभीष्टकार्यकृत् ।
तारकाऽपि शशिनोऽनुकूलतासम्भवे भवति पक्षपातिनी ॥११॥
सं०—दुर्बलेऽपि निजपतौ पार्श्वगे ( निकटवर्तिनि ) सति कुटुम्बिनी
( तस्त्री ) तदभीष्टकार्यकृत् ( तस्य स्वभर्तुरभीष्टकार्यकारिणी ) भवति ।

प्रकरणम् ७ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ४७
तथैव तारकापि शशिनश्चन्द्रस्यानुकूलताऽसम्भवे पक्षपातिनी भवति ।
अतः कृष्णपक्षेऽपि चन्द्रानुकूलत्वे एव ताराबलं ग्राह्यमिति सिद्धम् ॥११॥
भा०—दुर्बल भी अपना पति समीप में रहता है तो स्त्री उसके इच्छानुसार
ही कार्य करती है । इसी प्रकार तारा भी चन्द्रमा के अनुकूलता अभाव होने पर
चन्द्रमा ही की पक्षपातिनी होती है । अर्थात् कृष्णपक्ष में भी चन्द्रमा प्रतिकूल
रहता है तो तारा भी अशुभ फल को ही देती है । और चन्द्रमा के शुभ स्थान
स्थित होने पर शुभ फल देती है । इससे सिद्ध हुआ कि कृष्णपक्ष में भी चन्द्रमा
को अनुकूल स्थान में ही रहना चाहिये ॥११॥

अथ राहुसत्ताध्यायः ।
तत्रादौ वराहमिहिरमतं दूषयति—
यद्वराहमिहिरो न राहुरित्याह ताण्डवितबाहुरुच्चकैः ।
संहितास्मृतिसहायिनी वहत्यत्र तत्पथविमाथिनी श्रुतिः ॥ १ ॥
सं०—'राहुः न' इति उच्चैस् ताण्डवितबाहुः (

सं०—दिक्पतेरस्य राहोः इयं नैर्ऋती दिक् वर्तते, राहुरेव नैर्ऋती-
दिक्पतिरित्यर्थः । तथाऽसौ राहुः ध्यान-दानबलिभिः फलाप्तये भवति ।
तथा चास्य राहोः शशभृद्विमण्डल-क्रान्तिमण्डलमिश्रश्चतुष्पथं ( चन्द्रवि-
मण्डल-क्रान्तिमण्डलसम्पातरूपं ) वेश्म गृहमस्ति । अतो राहुरस्त्येवेति ।
वि०—अत्र—“राहुर्नास्ती”ति वराहमिहिरमतमारोप्य व्यर्थमेव
खण्ड्यते ग्रन्थकारेण । वस्तुतस्तु—“राहुर्नास्तीति” न वराहमिहिरस्य मतं ।
यतस्तेन स्वल्पजातके—“प्राच्यादीशा रविसितकुजराहुयमेन्दुसौम्यवाक्-
पतयः” इति राहोर्दिक्पतित्वं प्रतिपाद्य तत्सत्तैव प्रतिपादितेति विवेचनीयं
निष्पक्षपातहृदयैर्विद्वद्भिः ॥ २ ॥
भा०—दिक्पति राहु की ही यह नैऋति दिशा है । तथा ध्यान, दान, और
पूजा से भी राहु फलप्रद होता है । और चन्द्रमा का विमण्डल तथा क्रान्ति-
मण्डल का परस्पर सम्पातरूप चतुष्पथ इस राहु का स्थान है । अतः राहु की
सत्ता विद्यमान है ॥ २ ॥
वि०—वराहमिहिर ने तो—“प्रागाद्या रविशुक्रलोहिततमः” इत्यादि श्लोकों
से बृहज्जातक में राहु की सत्ता ही सिद्ध की है । फिर भी यहाँ ग्रन्थकार—
“राहु नहीं है” ऐसा वराहमिहिर का मत कल्पनाकर व्यर्थ ही खण्डन कर रहे हैं।
'ग्रहणे राहुश्छादको नास्तो'ति कस्य चिन्मतं खण्डयति —
सोन्धकारचरतां वहन्महीच्छायया विशति सोममण्डलम् ।
दीपितापरदलेन्दुमण्डलच्छायया सह च सूर्यमण्डलम् ॥ ३ ॥
सं०—स राहुः अन्धकारचरतां वहन् ( अन्धकारे चरन् ) महीच्छा-
यया सह-सोममण्डलं चन्द्रविम्बं विशति । तथा च दीपितापरदलेन्दु-
मण्डलच्छायया ( दीपितं अपरदलं = ऊर्ध्वस्थदलं यस्य तस्येन्दुमण्डलस्य
च्छायया ) सह सूर्यमण्डलं च विशति सूर्यविम्बं ग्रसतीत्यर्थः ॥ ३ ॥
भा०—वह राहु अन्धकार में रहता हुआ पृथ्वी की छाया ( भूभा ) के
साथ चन्द्रमण्डल में प्रवेश करता है । तथा प्रकाशित है ऊपर का आधा भाग
जिसका ऐसे चन्द्रबिम्ब की छाया के साथ सूर्य मण्डल में प्रवेश करता है । अतः
ग्रहण में भी राहु छादक और कारण सिद्ध होता है ॥ ३ ॥
वृत्तयोः सम्पातः कथं राहुरित्याह—
वृत्तयोः पतनमेव पात इत्याहुरत्र किल राहुरीक्ष्यते ।

प्रकरणम् ७ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ४६
आपतन्तममृतद्युतिं सुधा-स्नानदानहवनांशलालसः ॥ ४ ॥
सं०—वृत्तयोः ( क्रान्तिमण्डलविमण्डलयोः ) पतनमेव पातः, इति
'गोलविज्ञाः' आहुः । अत्र ( सम्पाते ) सुधा-स्नान-दान-हवनांशलालसः
( सुधायाश्चन्द्रबिम्बगतामृतस्य स्नानदानहवनांशस्य च लालसा यस्य
स तथोक्तः सन् ) राहुः आपतन्तं आगच्छन्तं अमृतद्युतिं ( सुधांशुं )
ईक्षते ( ग्रहीतुमवलोकयतीत्यर्थः ) ॥ ४ ॥
भा०— "चन्द्रविमण्डल ( चन्द्रमार्ग ) और क्रान्तिमण्डल" ( सूर्यमार्ग )
इन दोनों वृत्तका योग ही पात कहलाता है. इस प्रकार गोलज्ञाताओं ने कहा
है । उसी में सर्वदा स्थित राहु अमृत, स्नान, दान, और हवन के अंश की
लालसा से अपने समीप में आते हुए चन्द्रमा को देखता रहता है ॥ ४ ॥
वि०—जब पृथिवी की छाया उक्त पात के स्थान में जाती है उस समय
चन्द्रमा भी यदि उसके समीप पहुँचते हैं तो राहु चन्द्रमा को ग्रहण करता है।
उस समय लोग राहु के निमित्त भी दान और हवन करते हैं । उस अंश को
पाकर और चन्द्रबिम्ब में जो अमृत है उसका पान करके राहु सन्तुष्ट होता है ॥
एवं चेत् तदा प्रतिमासं ग्रहणं किं न भवतीत्याह—
सैंहिकेयगृहतामुपेयुषोर्दूरगो वियति वृत्तपातयोः ।
ग्रासमेति न रविर्न चन्द्रमा गृह्यते स खलु पार्श्वगस्तयोः ॥ ५ ॥
सं०—सैंहिकेयगृहतां ( राहुभवनत्वं ) उपेयुषोः ( प्राप्तवतोः ) वृत्त-
पातयोः वियत्याकाशे दूरगो दूरस्थितो रविः, चन्द्रमाश्च ग्रासं नैति ( न
प्राप्नोति ) । तथा तयोः ( पातयोः ) पार्श्वगः समीपस्थः स रविः, चन्द्र-
माश्च खलु निश्चयेन गृह्यते 'तेन राहुणेति' शेषः ॥ ५ ॥
भा०—राहु के गृहस्वरूप क्रान्तिवृत्त और चन्द्रविमण्डल के दोनों सम्पात
से जब आकाश में रवि और चन्द्रमा दूर रहते हैं तब राहु से ग्रस्त नहीं होते हैं ।
जब उक्त वृत्तपात के समीप में पड़ते हैं तब राहु से ग्रस्त हो जाते हैं ॥ ५ ॥
अथ जातकसंहिताभ्यां राहुसत्तां कथयति—
राशिवृत्तवसतिः स सूर्यवद्भावगोचरफलैर्न हीयते ।
रिष्टभङ्गजननैकनायको होरिकैरपि स कैर्न कीर्त्यते ॥ ६ ॥
सं०—राशिवृत्तवसतिः ( राशिवृत्ते वसतिर्वासो यस्य ) स राहुः
सूर्यवद्भावगोचरफलैः न हीयते ( सदा क्रान्तिवृत्ते स्थितत्वात् राहुरपि
७