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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 138 में से

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पृष्ठ 48

प्रकरणम् ४ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ३५

सं०—इह ( विवाहकाले ) अंशपतिः विलग्नविलोकने सति निजं
नवांशकं कलयति ( पश्यति ) । नवांशपतिः यं अवलोकयते स तनोः
( लग्नात् ) पृथक् , यद्येवं तदा तदिष्टफलाय जलाञ्जलिः स्यात् ( लग्न-
फलमपि नष्टमेवेत्यर्थः ) ॥ १२ ॥
भा०—नवांशपति लग्न को देखने पर उसके मध्यस्थ अपने नवांश को भी
देखता ही है । अगर ऐसा कहो कि—जिस नवांश को वह देखता है, वह लग्न
से पृथक् है, तब तो लग्न के फल के लिये तिलाञ्जलि देना होगा ( अर्थात् शुभ
नवांशजन्य लग्न का शुभफल भी नहीं होगा ) ॥ १२ ॥
अपृथगस्ति स चेन्ननु पश्यता तनुमसावधिपेन निरूपितः ।
हृदयहारदृशैव मृगीदृशः प्रणयिना तरलस्तरलद्युतिः ॥१३॥
सं०—ननु ( अहो ! ) चेत् स ( नवांशः ) अपृथक् ( लग्नान्तर्गत
एव ) अस्ति, तदा असौ ( नवांशः ) तनुं पश्यता अधिपेन ( स्वस्वामिना )
निरूपितः ( दृष्ट एव ) । 'केन क इव'—मृगीदृशः (स्त्रियाः) हृदयहारदृशा
( हृदयहारे दृग्दृष्टिर्यस्य तेन ) प्रणयिना प्रियेण तरलद्युतिस्तरलो हार-
मध्यस्थमणिरिव । हारे दृष्टे तन्मध्यस्थो मणिरपि यथा दृष्टो भवति, तथैव
लग्ने दृष्टे तदन्तर्गतनवांशोऽपि दृष्ट एवेत्यर्थः ॥ १३ ॥
भा०—यदि नवांश लग्न के अन्तर्गत ही है तब तो—लग्न पर स्वामी की
दृष्टि होने से नवांश भी दृष्ट होगा, जैसे पति अपनी स्त्री के हृदयस्थितहार पर
दृष्टि रखने से हार के मध्यस्थित मणि को भी देखता ही है ॥ १३ ॥
अथ परमतं दूषयति—
तनुपतिस्तनुपस्तमथास्तपो यदि न पश्यति नश्यति तत्कृतम् ।
इति परः परमत्र मते पतेल्लवतरौ बत रौद्र इवाशनिः ॥१४॥
सं०—"यदि तनुपतिः तनुं, तथास्तपोऽस्तं ( सप्तमं ) न पश्यति
तदा तत्कृतं 'शुभफलं' नश्यति" इति परः प्राह । परं बत 'इति खेदे'
अत्र मते लवतरौ ( नवांशरूपवृक्षे ) रोद्रः कठोरः इव अशनिर्वज्रं पतेत् ॥
भा०—यदि लग्नेश लग्न को और सप्तमेश सप्तम को न देखे तो लग्न और
नवांश का फल नष्ट हो जाता है, ऐसा किसी ने कहा है । परञ्च इस प्रकार के
मत में तो नवांशरूपी वृक्ष पर कठोर वज्रपात ही है ॥ १४ ॥