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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 138 में से

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पृष्ठ 44

प्रकरणम् ४ ] वसन्तलक्ष्मौसहितम् । ३१
"लग्ने द्विपद्गृहांशो शुभफलमन्यांशकोदये नेष्टम् ॥ २ ॥
भा०—इसलिये लग्न में द्विपद् नवांश को शुभ मानने वाले यत्न मैत्री को
स्वीकार करें। अन्यथा (नवांश मैत्री विना) विवाह कैसे हो सकता है?
क्योंकि लग्न का फल नवांश के आश्रित है ॥ २ ॥
अथान्याशङ्कां तद्दोषं च कथयति—
अथ रिपू यदि नोभयसप्तमौ तदयशः कलशस्य किमागतम् ।
द्विपदतां दधतोऽथ शुभर्क्षता यदि वृषानिमिषौ किमुपेक्षितौ ॥३॥
सं०—अथ यदि उभयसप्तमौ रिपू न 'समसप्तकयोः स्वभावमित्र-
त्वात्' तत् (तदा) द्विपदतां दधतः कलशस्य (कुम्भस्य) अयशोऽ-
शुभत्वं किमागतम् ? । अथ नवांशग्रहणे यदि शुभर्क्षता (शुभस्वामित्व-
मेव मुख्यं) तर्हि वृषानिमिषौ (वृषमीनौ) शुभस्वामिनौ किं उपेक्षितौ
परित्यक्तौ ? ॥ ३ ॥
भा०—यदि ऐसा कहा जाय कि परस्पर सप्तम में मैत्री होती है इसलिये
धनुमिथुन द्विपद् होने के कारण शुभ है — तो फिर कुम्भके उत्तरार्धमें द्विपद् होने
पर अशुभत्व क्यों हुआ ? । कहो, कि नवांशमें शुभर्क्षता (शुभग्रहकी राशि
होना) ही प्रधान है—तो फिर वृष और मीन क्यों त्याग कर दिये गये ? ॥ ३ ॥
पुनः प्रत्युत्तरं कथयति—
अमनुजाविति चेत्किमु शौनको नवलवं झषमादृतवान्मुनिः ।
शुभगृहद्विपदास्तलवः स चेद् भवतु तत्र किमस्तु तुलाधरः ॥ ४ ॥
सं०—तौ वृषमीनौ—अमनुजौ (द्विपदभिन्नौ) इति चेत्—तर्हि
शौनको मुनिः झषं नवलवं किमु आदृतवान् । तथा च तद्वाक्यम्—"प्रह-
सितवदना च मीनांशे" इति । अथ स मीनः शुभगृहद्विपदास्तलवः
(शुभस्य गृहं, द्विपदोऽस्तलवो यस्य स तथोक्तः) इति चेत् भवतु तदा
तत्र तुलाधरः (तुलाराशिः) किमस्तु (लग्ने तुलनवांशः कथमस्त्वित्यर्थः) ।
भा०—वृष और मीन शुभग्रह की राशि होने पर भी द्विपद नहीं हैं—
इसलिये अग्राह्य है, ऐसा कहा जाय तो —शौनक मुनि ने मीननवांश को क्यों ग्रहण
किया ? । कहो कि—मीन शुभग्रह की राशि है और उससे सप्तम द्विपद (कन्या)
का नवांश होता है इसलिये ग्राह्य है, तब तुला क्या होगा ? तुला से सप्तमनवांश
मेष का है वह तो न शुभराशि है न द्विपद् है तो फिर तुला क्यों ग्राह्य हुआ ॥४॥