विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० विवाहवृन्दावनम्— [ नवांशचिन्ता-
भा०—जो लग्नदृष्टि को छोड़कर केवल नवांशदृष्टि से ही फल मानते हैं, वे
भी चन्द्रनवांश मैत्री से क्यों विमुख होते हैं । अस्तु यह बात दूर ही रहे, संसार
गतानुगतिक है (अर्थात् एक को जैसे करते देखता, वैसा दूसरा करता, फिर उसे
देख तीसरा करता है; अर्थात् चन्द्रनवांशमैत्री नहीं मानना अन्धपरम्परा है ) ॥
अथ नवांशचिन्ताध्यायः ।
तत्र नवांशोपपत्तिव्याजेन यवनमैत्रीं द्रढयति—
नवलवाधिपती उदयास्तयो-रनिमिषार्चितचान्द्रमसायनौ ।
वरपपतिवरयोः समवैरिणौ यदि तदिष्टफलेष्वपि फल्गुता ॥ १ ॥
सं०—उदयास्तयोः ( लग्नसप्तमभावयोः ) नवलवाधिपती नवांश-
स्वामिनौ यदि—अनिमिषार्चितचान्द्रमसायनौ ( गुरुबुधौ ) ‘सत्याचार्य-
मतेन’ समवैरिणौ, भवतस्तत् ( तदा ) इष्टफलेष्वपि फल्गुता ( विफलता )
स्यात् ॥ १ ॥
भा०—‘सत्याचार्य के मत से’ परस्पर समशत्रु गुरु और बुध यदि क्रम से
लग्न और सप्तमभाव के नवांश पति हो ( अर्थात् लग्न सप्तम में धनु और मिथुन
के नवांश हो ) तो इष्टफल में भी व्यर्थता हो जायगी ॥ १ ॥
वि०—विवाहलग्न पतिस्थान और सप्तमभाव जाया स्थान है अतः उन दोनों
के नवांशपति में मैत्री होने से वरवधू में भी मैत्री हो सकती है । इस विचार से
लग्न में द्विपदराशियों के नवांश प्रशस्त हैं । जैसे मिथुन, धनु । परञ्च सत्याचार्य
के मत से दोनों के अधिप सम शत्रु हैं, अतः प्रशस्त में भी अशुभत्व हो जायगा;
और यवनोक्तमैत्री से मिथुन, धनु के स्वामियों में परस्पर मैत्री है, अतः यवनमैत्री
से द्विपद नवांश में शुभत्व हो सकता है, सत्याचार्य के मत से नहीं ॥ १ ॥
अतो यवनोक्तसौहृदमेव ग्राह्यमित्याह—
तदुदयद्विपदांशनियामको यवनसौहृदमाद्रियतां जनः ।
इतरथा कथमस्तु करग्रहस्तनुफलं हि लवानवलम्बते ॥ २ ॥
सं०—तत् तस्मात् उदयद्विपदांशनियामकः ( लग्ने द्विपदनवांश-
प्रयोजकः ) जनः यवनसौहृदमाद्रियताम् । इतरथा ( सत्याचार्योक्तग्रह-
मैत्र्या द्विपदभिन्ननवांशे ) करग्रहः ( विवाहः ) कथं स्यात् । हि( यतः )
तनुफलं लवान् नवांशान् अवलम्बते आश्रयते । तथोक्तं प्राचीनैः—