विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ विवाहवृन्दावनम्- [ नवांशचिन्ता-
अथ जन्मलग्नराशिभ्यामुद्यास्तशुद्धिमाह-
जननलग्नभयोर्मृतिशासितुर्मृतिगतस्य च राशिनवांशकाः ।
तनुगता यदि तत्तनुते वधूरतिलका तिलकाय जलाञ्जलिम् ॥१५॥
सं०-जननलग्नभयोः ( जन्मलग्न-जन्मराशिभ्यां ) मृतिशासितुः
( अष्टमेशस्य ), मृतिगतस्य ( अष्टमस्थानस्थितस्य ) च राशिनवांशकाः
तनुगताः ( लग्नस्थिताः ) यदि स्युः, तत् तदा वधूः अतिलका स्वामिरहिता
सती तिलकाय (स्वामिने) जलाञ्जलिं तनुते- 'विधवा भवतीत्यर्थः' ।१५।
भा०-जन्मलग्न और जन्मराशि से अष्टमेश की राशि के वा अष्टमस्थान-
स्थित ग्रह की राशि के नवांश लग्न में हो तो वह स्त्री विधवा होकर अपने स्वामी
को जलाञ्जलि देती है ॥ १५ ॥
वि०- "स्वयं जलाञ्जलि देती है" इस शब्द से अनपत्यता योग भी सिद्ध
होता है ॥ १५ ॥
अथाष्टमलग्नदोषं तत्परिहारं च कथयति-
व्यलिवृषं जननर्क्षविलग्नयोर्भवनमष्टममभ्युदितं त्यजेत् ।
सितपुलस्तिमतेन तदीशता तनुसमेति समेति न दूषणम् ॥१६॥
सं०-जननर्क्षविलग्नयोः ( जन्मराशिलग्नाभ्यां ) व्यलिवृषं ( वृष-
वृश्चिकभिन्नं ) अष्टमभवनं अभ्युदितं ( लग्नगतं ) त्यजेत् । यतः तदीशता
( तयोर्वृषवृश्चिकयोरोशता = स्वामिता ) तनुसमा 'तत्स्वाम्येव लग्नस्यापि
स्वामीत्यर्थः' इत्यस्मात् सितपुलस्तिमतेन दूषणं न समेति ( नागच्छति ) ॥
भा०-जन्मलग्न और जन्मराशि से वृष वृश्चिक से अतिरिक्त अष्टमराशि
विवाहलग्न में छोड़ देना चाहिये । क्योंकि अष्टमस्थ वृश्चिक और वृष के स्वामी ही
लग्न का भी स्वामी होता है, इसलिये शुक्र और पुलस्ति के मत से दोष नहीं
आता है ॥ १६ ॥
वि०- मेष लग्न में अष्टम वृश्चिक, और तुला लग्न में अष्टम वृष पड़ता है,
अतः एकाधिपत्य होने के कारण वृष, वृश्चिक अष्टम होने पर भी विवाह लग्न में
ग्राह्य है । और अन्य त्याज्य है ॥ १६ ॥
अथ चरत्रययोगे दोषमाह-
चरलवञ्चरवेश्मगमुत्सृजेन्मृगतुलाधरगे मृगलक्ष्मणि ।
युवतिरत्र भवेत्कृतकौतुका मदनवत्यनवत्यजनोन्मुखी ॥१७॥