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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

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पृष्ठ 62

प्रकरणम् ७ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ४६
आपतन्तममृतद्युतिं सुधा-स्नानदानहवनांशलालसः ॥ ४ ॥
सं०—वृत्तयोः ( क्रान्तिमण्डलविमण्डलयोः ) पतनमेव पातः, इति
'गोलविज्ञाः' आहुः । अत्र ( सम्पाते ) सुधा-स्नान-दान-हवनांशलालसः
( सुधायाश्चन्द्रबिम्बगतामृतस्य स्नानदानहवनांशस्य च लालसा यस्य
स तथोक्तः सन् ) राहुः आपतन्तं आगच्छन्तं अमृतद्युतिं ( सुधांशुं )
ईक्षते ( ग्रहीतुमवलोकयतीत्यर्थः ) ॥ ४ ॥
भा०— "चन्द्रविमण्डल ( चन्द्रमार्ग ) और क्रान्तिमण्डल" ( सूर्यमार्ग )
इन दोनों वृत्तका योग ही पात कहलाता है. इस प्रकार गोलज्ञाताओं ने कहा
है । उसी में सर्वदा स्थित राहु अमृत, स्नान, दान, और हवन के अंश की
लालसा से अपने समीप में आते हुए चन्द्रमा को देखता रहता है ॥ ४ ॥
वि०—जब पृथिवी की छाया उक्त पात के स्थान में जाती है उस समय
चन्द्रमा भी यदि उसके समीप पहुँचते हैं तो राहु चन्द्रमा को ग्रहण करता है।
उस समय लोग राहु के निमित्त भी दान और हवन करते हैं । उस अंश को
पाकर और चन्द्रबिम्ब में जो अमृत है उसका पान करके राहु सन्तुष्ट होता है ॥
एवं चेत् तदा प्रतिमासं ग्रहणं किं न भवतीत्याह—
सैंहिकेयगृहतामुपेयुषोर्दूरगो वियति वृत्तपातयोः ।
ग्रासमेति न रविर्न चन्द्रमा गृह्यते स खलु पार्श्वगस्तयोः ॥ ५ ॥
सं०—सैंहिकेयगृहतां ( राहुभवनत्वं ) उपेयुषोः ( प्राप्तवतोः ) वृत्त-
पातयोः वियत्याकाशे दूरगो दूरस्थितो रविः, चन्द्रमाश्च ग्रासं नैति ( न
प्राप्नोति ) । तथा तयोः ( पातयोः ) पार्श्वगः समीपस्थः स रविः, चन्द्र-
माश्च खलु निश्चयेन गृह्यते 'तेन राहुणेति' शेषः ॥ ५ ॥
भा०—राहु के गृहस्वरूप क्रान्तिवृत्त और चन्द्रविमण्डल के दोनों सम्पात
से जब आकाश में रवि और चन्द्रमा दूर रहते हैं तब राहु से ग्रस्त नहीं होते हैं ।
जब उक्त वृत्तपात के समीप में पड़ते हैं तब राहु से ग्रस्त हो जाते हैं ॥ ५ ॥
अथ जातकसंहिताभ्यां राहुसत्तां कथयति—
राशिवृत्तवसतिः स सूर्यवद्भावगोचरफलैर्न हीयते ।
रिष्टभङ्गजननैकनायको होरिकैरपि स कैर्न कीर्त्यते ॥ ६ ॥
सं०—राशिवृत्तवसतिः ( राशिवृत्ते वसतिर्वासो यस्य ) स राहुः
सूर्यवद्भावगोचरफलैः न हीयते ( सदा क्रान्तिवृत्ते स्थितत्वात् राहुरपि
७