सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 138 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 59

४६ विवाहवृन्दावनम्— [चन्द्रबल-
अस्तु किन्तु न पतिप्रतीपतां साऽन्यथा घटयितुं पटीयसी ॥ ६ ॥
सं०—प्रिये स्वामिनि प्रोषिते ( देशान्तरं गते ) सति, विकलवर्ष्मणि
( रुग्णशरीरे सति ) वा तोलिलिः 'मुनिः' स्त्रियं कार्यिणीं ( कार्याधि-
कारिणीं ) इयेष ऐच्छत् । अस्तु ( सा कार्यकारिणी भवतु ) किन्तु सा
( स्त्री तारा वा ) अन्यथा पतिप्रतीपतां ( स्वामिवैपरीत्यं ) घटयितुं ( कर्तुं )
न पटीयसी न क्षमा । अतः सत्येव चन्द्रानुकूलत्वे ताराबलं ग्राह्यमिति
सिद्धयति ॥ ९ ॥
भा०—पति के विदेश जाने पर अथवा रुग्ण होने पर तोलिलि मुनि स्त्री
को कार्यकारिणी कहे हैं। अस्तु ऐसा हो सकता है—परञ्च उस हालत में भी स्त्री
अपने स्वामी के अभिप्राय से विरुद्ध नहीं कर सकती है । अतः चन्द्रमा के क्षीण
रहने पर भी अनुकूलत्व देखना चाहिये केवल ताराका बल अकार्यक ही है ॥६॥
कृष्णपक्षेऽपि चन्द्रो न विनश्यतीत्याह—
क्रौर्यमेति बहुले स केवलं नैव नश्यति तमाममां वसन् ।
नास्ति चैष यदि तत्र तत्कथं तत्कृता जनिषु रिष्टरौद्रता ॥१०॥
सं०—बहुले कृष्णपक्षे स चन्द्रः क्रौर्यं ( क्रूरत्वं ) एति गच्छति ।
तथा अमांवसन्नपि नैव नश्यति तमाम् ( अतिशयेन नैव नश्यति ) । यदि
च एष ( चन्द्रः ) तत्र ( तस्याममायां ) नास्ति ( अतिशयेन नष्टः )
तत्तदा जनिषु जन्मकालेषु तत्कृता रिष्टरौद्रता रिष्टक्रूरता कथं स्यात् ? ।
अतोऽमायां चन्द्रो न नश्यति, किञ्च प्रकाशविहीनो भवति ॥१०॥
भा०—कृष्णपक्ष में चन्द्रमा में केवल क्रूरता होती है। अमावश्या में सूर्य
के साथ अस्त होने पर वह सर्वथा नष्ट नहीं हो जाता है। यदि कहो कि—
अमावश्या में चन्द्रमा नहीं रहता है। तो फिर अमावश्या में भी जन्मकालिक-
चन्द्रजन्य अरिष्ट की क्रूरता क्यों कही जाती है ? । अतः अमावश्या में चन्द्रमा
नष्ट नहीं हो जाते । सूर्य के साथ रहने से तेजविहीन मात्र हो जाते हैं ॥१०॥
ताराबले सिद्धान्तं कथयति –
पार्श्वगे निजपतौ कुटुम्बिनी दुर्बलेऽपि तदभीष्टकार्यकृत् ।
तारकाऽपि शशिनोऽनुकूलतासम्भवे भवति पक्षपातिनी ॥११॥
सं०—दुर्बलेऽपि निजपतौ पार्श्वगे ( निकटवर्तिनि ) सति कुटुम्बिनी
( तस्त्री ) तदभीष्टकार्यकृत् ( तस्य स्वभर्तुरभीष्टकार्यकारिणी ) भवति ।