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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

प्रकरणम् ६ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ४५
वराय समर्प्यते' तस्य ( गोमहिष्यादेः सर्वस्य ) तद्वलं चन्द्रबलं दिश
प्रयच्छ । इत्यतिप्रसङ्गदोषो दर्शितः अतो वरस्यापि चन्द्रबलं ग्राह्यम् ॥६॥
भा०—धर्म अर्थ काम तीनों के मालिक भी पुरुष चन्द्रबल नहीं पाता है,
और कन्या ( जिसका दान किया जाता है वही ) यदि चन्द्रबल पाती है तो
फिर विवाह समय में गाय, पृथ्वी, भैंस इत्यादि जो कुछ दिये जाते हैं उनका
भी चन्द्रबल देखो । अर्थात् इस प्रकार अतिप्रसङ्ग दोष होता है अतः वर का
भी चन्द्रबल देखना चाहिये ॥ ६ ॥
इन्दुरिन्दुवदनानुगं बलं यच्छतीह युवतिग्रहो यतः ।
सन्नृणामपि कथं षडष्टगः खण्डयत्ययमसून् प्रसूतिषु ॥ ७ ॥
सं०—इन्दुः (चन्द्रः) इन्दुवदनानुगं ( युवत्यनुसारं ) बलं यच्छति,
यतः स युवतिग्रहः ( स्त्रीग्रहः ), इति चेत्, तदा अयं ( चन्द्रः ) प्रसूतिषु
जन्मसमयेषु षडष्टगः सन्नृणां ( पुरुषाणां ) असून् ( प्राणान् ) कथं
खण्डयति ? ( नाशयति ? ) । अतः पुरुषस्यापि चन्द्रबलं ग्राह्यमेवेति ॥७॥
भा०—यदि ऐसा कहो कि—चन्द्रमा स्त्री ग्रह है इसलिये स्त्री के अनुकूल
ही बल देता है ? तो फिर जन्म समय में षट्, अष्टम स्थानस्थ चन्द्रमा पुरुष का
प्राणापहारक क्यों होता है ? अतः वर का भी चन्द्रबल देखना ही चाहिये ॥७॥
होरयापि हिमरश्मिराहतः पुंस्फलेषु सुनफानफादिषु ।
अत्रिराह बहुलेपि तारकां तारकापतिबले बलीयसीम् ॥ ८ ॥
सं०—होरया ( जातकशास्त्रेण ) अपि पुंस्फलेषु ( पुरुषफलेषु )
सुनफाऽनफादिषु ‘योगेषु’ हिमरश्मिश्चन्द्रः आहतः । अतश्चन्द्रबलं ग्राह्य-
मेवेत्यर्थः । तथा अत्रिः 'मुनिः' बहुले ( कृष्णपक्षे ) अपि तारकापतिबले
सत्येव तारकां बलीयसीं आह । सत्येव चन्द्रबले तारा बलवती भवत्य-
तश्चन्द्रबलं वरस्यापि ग्राह्यमित्यर्थः ॥ ८ ॥
भा०—जातक शास्त्र ने भी पुरुषों के फल में सुनफा अनफा आदि योगों
में चन्द्रमा को ग्रहण किया है । अर्थात् चन्द्रमा से ही योगफल कहा है । तथा
अत्रिमुनि कृष्णपक्ष में भी चन्द्रबल ( शुभस्थानस्थित ) रहने पर ही तारा को
बलवती कहे हैं । अतः वर का भी चन्द्रबल ग्रहण करना चाहिये ॥ ८ ॥
पुनरन्यमतमुपन्यस्य दूषयति —
प्रोषिते विकलवर्ष्मणि प्रिये तोल्लिलिः स्त्रियमियेष कारिणीम् ।