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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

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पृष्ठ 46

प्रकरणम् ४ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ३३

सं०-अथ तयोः ( यवन-सत्याचार्यमतयोः ) समसप्तसुहृत्पथः कथं
असूक्ष्मगतिः ? अपि तु सूक्ष्मगतिरेव । स च ( सुहृत्पथः) हि यतः एकधा
न, अपि तु तत्कालनिसर्गभेदाद् द्विधाऽस्ति, तत् तस्मात् इह ( विवाहे )
अखिलैः ( समस्तैः = यवनसत्यादिभिः ) खलखेटगृहाणि ( पापभानि )
अपि अनुमेनिरे, किं पुनः शुभगृहाणीत्यर्थः ॥ ७ ॥
भा०-परस्परसमसप्तक मैत्री दोनों ( यवन और सत्याचार्य ) के शास्त्र में
असूक्ष्म कैसे हो सकता है ? अर्थात् सूक्ष्म ही है । परञ्च वह मैत्री एकही प्रकार
का नहीं है, अर्थात् तात्कालिक नैसर्गिक भेद से अनेक प्रकार है । इसलिये सब
( यवन-सत्य आदि ) आचार्यों ने पापग्रहराशियों को भी स्वीकार किया है, अर्थात्
लग्न में सब राशि गृहीत है ॥ ७ ॥
तत्रापि पूर्णशुभफलादिकत्वं प्रतिपादयति-
इति तुलाजितुमप्रमदाधनुः-प्रथमखण्डमखण्डफलं जगुः ।
सततमस्तपतिद्विषदीश्वरं नवलवं बलवन्ध्यपतिं त्यजेत् ॥ ८ ॥
सं०-इत्यस्मात् ( उपरोक्तकारणात् ) तुला-जितुम-प्रमदा-धनुः-
प्रथमखण्डं सततं ( अनवरतं ) अखण्डफलं ( पूर्णशुभफलं ) जगुः
( आचार्या ऊचुः ) । अथात्र विशेषं कथयति-अस्तपतिद्विषदीश्वरं
( अस्तपतेः सप्तमेशस्य द्विषत शत्रुः ईश्वरो यस्य तं ) नवलवं तथा बल-
वन्ध्यपतिं ( बलने वन्ध्यः पतिर्यस्य तं ) नवलवं ( नवांशं ) च त्यजेत् ॥
भा०--उपरोक्त कारणों से--तुला, मिथुन, कन्या और धनु का पूर्वार्ध इनमें
शुभ फल होता है। ऐसा प्राचीनाचार्यों ने कहा है। सप्तमेश के शत्रु जिस
राशि का स्वामी हो उस नवांश को तथा जिसका स्वामी निर्बल हो उस नवांश
को त्याग देना चाहिये ॥ ८ ॥
अथ लग्नसप्तमयोः शुद्धिं कथयति --
लवपतिः कुरुते लवलग्नयोः पतिमृतिं त्रिवसुव्ययवित्तगः ।
नवलवास्तपतिः प्रतिहन्त्यसून् मृगदृशश्च तदस्तभयोस्तथा ॥ ६ ॥
सं०-लवपतिः ( नवांशस्वामी ) लवलग्नयोः त्रिवसुव्ययवित्तगः
पतिमृतिं ( वरमरणं ) कुरुते । तथा नवलवास्तपतिः ( नवांशसप्तमेशः )
तदस्तभयोः ( नवांशसप्तमात्-लग्नसप्तमाद्वा ) तथा ( त्रिवसुव्ययवित्तगः )
मृगदृशः ( कन्यायाः ) असून् प्राणान् प्रतिहन्ति ( नाशयति ) ॥ ९ ॥
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