सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 138 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 52

प्रकरणम् ५ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ३६
भा०--स्त्रियों के पाणिग्रहण समय में लग्न से ६, ३, ११, ८ इन स्थानों में
रवि हो तो अनायास सुख, पुत्र और धनदायक होता है । तथा सप्तमस्थान वा
लग्न में रवि हो तो वज्र के समान शुभफल का नाशक होता है । जैसे शनि राहु
और केतु । अर्थात् शनि राहु केतु भी इन स्थानों में रवि के समान ही हैं ॥
त्रिधनलाभसुखेषु शुभः शशी निधनमूर्त्तिरिपुष्वतिगर्हितः ।
अशुभशुक्रसखः स खनत्यसून् दिनकरोनकरो न करोति शम् ॥
सं० त्रिधनलाभसुखेषु 'स्थितः' शशी शुभः स्यात् । निधनमूर्त्ति-
रिपुषु ( अष्टम-लग्न-षष्ठेषु ) स शशी अतिगर्हितः ( अत्यन्तदुष्टः ) स्यात् ।
शेषस्थानेषु सामान्यगर्हितः' इत्यर्थात् सिद्ध्यति । तथा स ( चन्द्रः )
अशुभशुक्रसखः ( अशुभ-शुक्राभ्यां सहितः ) असून् प्राणान् खनति
( नाशयति ) । तथा दिनकरोनकरः ( दिनकरेण ऊनाः करा यस्य सः
सूर्येण सहास्तमितः ) शं सुखं न करोति ॥ २ ॥
भा०--चन्द्रमा विवाहलग्न से ३, २, ११, ४ इन स्थानों में शुभप्रद है ।
और ८, १, ६ इन स्थानों में अत्यन्त अशुभ है । अशुभग्रह वा शुक्र से युक्त चन्द्रमा
हो तो प्राणनाशक होता है, तथा सूर्य के साथ अस्त हो तो भी शुभफल नहीं
देता है ॥ २ ॥
अवनिजस्त्रिभवारिषु वृद्धये मृतिकरो मृतिमूर्त्तिमदाश्रितः ।
इह नभोयुजि जीवदृशं विना च्युतनया तनयामिषभुग्वधूः ॥ ३ ॥
सं०—अवनिर्जः ( मङ्गलः ) त्रिभवारिषु वृद्धये भवति, तथा—मृति-
मूर्त्तिमदाश्रितः मृतिकरो भवति । इह ( अस्मिन् मङ्गले ) नभोयुजि
( दशमस्थानस्थे ) सति जीवदृशं ( गुरुदृष्टिं ) विना वधूः ( स्त्री )
च्युतनया ( नीतिरहिता ) तनयामिषभुक् ( सन्तानघातिनी भवतीत्यर्थः )
जीवदृष्टिश्चेत् तदा शुभफलं स्यादित्यर्थात् सिद्ध्यति ॥ ३ ॥
भा०—मङ्गल विवाहलग्न से ३, ११, ६ में वृद्धिकारक होता है । और
८, १, ७ में मरणकारक होता है । यदि १० स्थान में हो और उस पर गुरु की
दृष्टि न हो तो वह स्त्री अनीति करने वाली और अपने सन्तान को नाश करनेवाली
होती है । यदि बृहस्पति की दृष्टि हो तो शुभफल समझना ॥ ३ ॥
व्ययगृहं विरहय्य हिमांशुजः सकलवेश्मसु वेश्मसुतार्थदः ।
स नियतं विदधाति वधूवरं यमकरे मकरेङ्गितमृत्युगः ॥ ४ ॥