विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ विवाहवृन्दावनम्- [ नवांशचिन्ता-
अत्र पुनः प्रत्युत्तरं कथयति-
द्विचरणः शुभभं च नवांशकस्तदयमेकतरः परिगृह्यते ।
इदमसंगतमंग तवेरितं जगति नैकवशात् किल सौहृदम् ॥ ५ ॥
सं० - नवांशको द्विचरणः, शुभभं च भवति, तदयं ( नवांशकः )
एकतरः ( द्विचरणो वा शुभभं वा ) परिगृह्यते, एवं त्वयोच्यते चेत्, तदा
हे अङ्ग ! इदं तवेरितं ( त्वया कथितं ) असङ्गतमेव । किल यतो जगति
संसारे एकवशात् सौहृदं न भवति ॥ ५ ॥
भा०-यदि ऐसा कहो कि--द्विपद और शुभग्रह की राशि इन दो में से
एक भी हो तो ग्रहण किया जाता है। परन्तु हे मित्र ! तुम्हारा यह भी कहना
असङ्गत है, क्योंकि संसार में केवल एक से ही मैत्री नहीं होती है ॥ ५ ॥
अथात्र सिद्धान्तमाह-
खचरयोः सखिता यदि कारणं ध्वनति सा नितरां यवनाध्वनि ।
कलशसिंहनवांशपशत्रुता परिणमत्युभयोरपि शास्त्रयोः ॥ ६ ॥
सं०-यदि खचरयोः (उदयास्तांशाधिपयोः) सखिता (मैत्री)
एव कारणं स्यात् तदा सा (सखिता = ग्रहमैत्री) यवनाध्वनि यवना-
चार्यमार्गे नितरां ध्वनति (शब्दायते सर्वत्र प्रसिद्धेत्यर्थः) । सत्याचार्यमतेन
धनुर्मिथुनयोः सखित्वाभावाद् यवनमैत्रमेव साधुतरमिति भावः । कुम्भ
सिंहांशत्यागे युक्तिं कथयति-उभयोः (यवन-सत्याचार्ययोर्द्वयोः) अपि
शास्त्रयोः कलशसिंहनवांशपशत्रुता परिणमति । अतो यवनमैत्र्यापि
तत्त्याज्यता सिद्धयत्यतो यवनमतमेव प्रधानमित्याचार्यस्याभिप्रायः ॥ ६ ॥
भा०-यदि लग्न सप्तम के नवांशाधिपों में मैत्री होना ही कारण हो तो-
वह मैत्री यवनशास्त्र में ही प्रसिद्ध है । सत्याचार्य के मत से धनु मिथुन के स्वामियों
में मैत्री नहीं है । और कुम्भ सिंह के स्वामियों में शत्रुता तो दोनों ही (यवन
और सत्याचार्य) के शास्त्र में प्रसिद्ध है । "इसलिये यवनमत से भी कुम्भ सिंह
त्याज्य है, अतः यवन ही का मत श्रेष्ठ है" यह आचार्य का आशय है ॥ ६ ॥
नवांशपतिमैत्री विचार्यते चेत्तर्हि राशिपतिमैत्री किं नेत्याह-
अथ तयोः समसप्तसुहृत्पथः कथमसूक्ष्मगतिः स च नैकधा ।
इह हि लग्नगतान्यनुमेनिरे तदखिलैः खलखेटगृहाण्यपि ॥ ७ ॥