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विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

" in "तुरगमृगपतिच्छाग".
Look at 'च' in line 27: it has a flat top, curved bottom, vertical stem. Yes, it looks like 'र्चे' or 'र्त्त्ये' or 'र्क्षे'!
Wait, look at 'र्दो' in L21:
It has a rounded back like 'द' or 'च'?
Wait, compare 'द' in 'मृगपतिच्छाग' (no 'द' there), compare 'द' in 'अदिति' (L22):
'द' in 'अदिति': rounded back, curl down.
In L21: it has a rounded back, curl down: 'र्दो'!
Wait, is there an anusvara on top? 'र्दो' or 'र्दों'? There's a dot above: 'र्दों' or maybe just ink smear?
Wait, look at L27 again:
" ) शिवमयमर्चे ( आर्द्रामरण्यौ ) "
Wait, look at "आर्द्रामरण्यौ":
Wait, is that "आर्द्रामरण्यौ" or "आर्द्राभरण्यौ"?
Look at the letter: it is 'भ'!
Wait, in "आर्द्राभरण्यौ", the third letter has the loop of 'भ', like 'भा' in 'भाद्रपद'.
Wait, is it 'भ' or 'म'?
Look at 'म' in 'शिवमयमर्चे': 'म'

द्वितीय खण्ड: अष्टकूट मिलान (वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह-मैत्री, गण, भकूट, नाड़ी)

प्रकरणम् ३ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । २३
(दैत्यगणे) ज्ञेयम् । परिणये विवाहे दनुजमनुजानां दैत्यनराणां मृत्युः ।
निर्ऋतितनयानां (राक्षसानां) अनिमिषैः (देवैः) सह स्वैरं (स्वाभा-
विकं) वैरं स्यात् । अर्थात् देवमनुजयोः, स्वस्वगणेच मित्रत्वं स्यात् ॥९॥
भा०—रोहिणी, पूर्वफाल्गुनी, उत्तरफाल्गुनी, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, पूर्वभा०,
उ०भा०, आर्द्रा, भरणी ये ९ नक्षत्र मनुष्यगण, श्रवण, स्वाती, अनुराधा, पुनर्वसु,
पुष्य, हस्त, रेवती, अश्विनी, मृगशिरा ये ९ नक्षत्र देवगण, और शेष—कृत्तिका,
आश्लेषा, मघा, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, मूल, धनिष्ठा, शतभिषा ये ६ नक्षत्र
दैत्यगण हैं। दैत्यमनुष्यगणों में मरण, देव और दैत्य के साथ विवाह में
स्वाभाविक शत्रुता होती है । अर्थात् अपने अपने गण में और देव मनुष्य में
मैत्री होती है ॥ ९ ॥
अथ राशिवैरं वश्यावश्यं चाह—
चापाजौ वृषभेण कुम्भमिथुनौ कर्केण मेषः स्त्रिया
शैलाग्नी सविषेण कार्मुकहरी नक्रेण नित्यद्विषौ ।
तद्वत् कुम्भतुले झषेण, वशगा सिंहं विनाऽन्ये नृणां
तद्भोज्या जलचारिणो हरिवशाः सर्वे विना वृश्चिकम् ॥१०॥
सं०—चापाजौ (धनुर्मेषौ) वृषभेण, कुम्भमिथुनौ कर्केण, मेषः
स्त्रिया कन्यया, शैलाग्नी (तुलमिथुनौ) सविषेण (वृश्चिकेन), कार्मुकहरी
(धनुःसिंहौ) नक्रेण (मकरेण सह) नित्यद्विषौ, तद्वत् कुम्भतुले झषेण
(मीनेन) नित्यद्विषौ ज्ञेयौ । अथ वश्यमैत्रीं कथयति—सिंहं विनाऽन्ये सर्वे
राशयो नृणां द्विपदानां वशगाः, जलचारिनः (जलचरराशयः) तद्भोज्याः
(तेषां नृराशीनां भक्ष्याः) तथा वृश्चिकं विना सर्वे राशयः हरिवशाः
(सिंहस्य वश्याः) भवन्ति ॥ १० ॥
भा०—धनु, मेष को वृष से, कुम्भमिथुन को कर्क से, मेष को कन्या से,
तुला मिथुन को वृश्चिक से, धनुर्सिंह को मकर से और कुम्भतुला को मीन से
स्वाभाविक शत्रुता है । वश्य कहते हैं—सिंह को छोड़ कर सब राशि द्विपद के
वश में हैं, और जलचर राशि द्विपद राशि का भक्ष्य है । और वृश्चिक को छोड़कर
सब राशि सिंह के वश्य हैं ॥ १० ॥
वि०—इससे परस्पर द्विर्द्वादश, और षट्काष्टक में शत्रुता तथा अन्य
(समसप्तक, चतुर्थदशम, तृतीयेकादश) में परस्पर मित्रता सिद्ध हुई ॥ १० ॥

२४ विवाहवृन्दावनम्- [मेलक-
राशिमैत्रग्रहमैत्रयोरन्यतरलाभेऽपि शुभत्वं कथयति-
स्याद्राशिमैत्रीधुरि कुम्भहर्योः करग्रहस्तद्ग्रहविग्रहेऽपि ।
तस्यामसत्यां मृगराजमीनावप्याहृतौ तद्ग्रहयोः सुहृत्त्वे ॥११॥
सं०-कुम्भहर्योः (कुम्भसिंहयोः समसप्तकत्वात्) राशिमैत्रीधुरि
(राशिमैत्र्यां सत्यां) तद्ग्रहविग्रहे (तयोः स्वामिनोः शत्रुत्वे) अपि
करग्रहः स्यात् । तथा तस्यां (राशिमैत्र्यां) असत्यां अपि तद्ग्रहयोः
(तत्स्वामिनोः) सुहृत्त्वे मृगराजमीनौ आहृतौ षट्काष्टकत्वेऽपि स्वामि-
सुहृत्त्वात् सिंहमीनौ स्वीकृतवित्यर्थः ॥११॥
भा०-कुम्भ सिंह में राशि मैत्री होने के कारण उनके स्वामियों (शनि,
सूर्य) में शत्रुता रहने पर भी विवाह शुभ कहा गया है । तथा-सिंह और मीन
में राशि मैत्री नहीं होने पर भी उनके स्वामियों (सूर्य गुरु) में मैत्री होने के
कारण विवाह में सिंह और मीन स्वीकृत है । अर्थात् राशि मैत्री स्वामिमैत्री
दोनों में एक भी हो तो विवाह शुभ है यदि दोनों हो तो बात ही क्या है ॥११॥
अथात्र प्रश्नं तदुत्तरं च कथयति-
पत्योर्विरोधे सति भृत्ययोः स्यान्मेलेप्यमेलस्तदलं भमैत्र्या ।
अत्रोच्यते किं न मिथो वधः स्यादेकस्य सेनानरयोर्विरोधात् १२
सं०-पत्योः (स्वामिनोः) विरोधे सति, भृत्ययोः मेलेऽपि अमेलः
स्यात्, तत् तस्मात् भमैत्र्या अलं (न प्रयोजनम्) । अत्र (अस्मिन्
प्रश्ने) उच्यते-एकस्य सेनानरयोः (सैन्यपुरुषयोः) मिथो विरोधात् किं
वधो न स्यात् ? अपि तु वधः स्यादेवातो राशिमैत्रमेव प्रधानम् ॥१२॥
भा०-स्वामियों में विरोध रहने पर नौकरों में यदि मेल भी हो तो वह
अमेल (विरोध) ही समझा जाता है । इसलिये राशिमैत्री व्यर्थ ही है, इस
प्रकार के प्रश्न में उत्तर यह है कि-एक ही राजा की सेनाओं में परस्पर विरोध
होने पर क्या वध नहीं होता है ?, अर्थात् अवश्य हो जाता है । अतः राशिमैत्री
ही में प्रधानता सिद्ध हुई ॥ १२ ॥
अत्र पुनः प्रत्युत्तरं कथयति-
अपश्यति स्वामिनि तद्वधश्चेद् गृहेश्वराणां किमदृष्टमस्ति ।
अतोऽधिकं चेत्प्रभुसख्यमेक ततो गतिः का समसप्तकस्य ॥१३॥

प्रकरणम् ३ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । २५
सं०—स्वामिनि अपश्यति तद्वधः ( तयोः सेनानरयोर्वधः ) चेत् ।
तर्हि गृहेश्वराणां ( राशिस्वामिनां = खगानां ) किं अदृष्टम् ? न किमपि,
अर्थात् सर्वं दृष्टमेव । अतः प्रभुसख्यमेवाधिकम् । एवं चेत् तदा समसप्त-
कस्य का गतिः ? इत्युच्यताम् ॥ १३ ॥
भा०—यदि ऐसा कहा जाय कि—स्वामी के परोक्ष में ही सेना में विरोध
होने से वध होता है, स्वामी के समक्ष में नहीं ? तो फिर राशीश्वरों ( ग्रहों ) के
कौन स्थान अदृश्य हैं ? अर्थात् वे सब को देखते हैं । इसलिये स्वामियों की मैत्री
ही विशेष है । यदि स्वामी की मैत्री ही विशेष है तो फिर समसप्तक ( कुम्भ
सिंह आदि ) राशियों की ग्राह्यता की क्या गति होगी ? ॥ १३ ॥
अथात्र सिद्धान्तं कथयति—
स्वभावमैत्री सखिता स्वपत्योर्वशित्वमन्योन्यभयोनिशुद्धिः ।
परः परः पूर्वगमे गवेष्यो हस्ते त्रिवर्गी युगपद्युतिश्चेत् ॥१४॥
सं०—'राश्योः' स्वभावमैत्री १, स्वपत्योः सखिता २, वशित्वम् ३,
अन्योन्यभयोनिशुद्धिः ४, 'एषु चतुर्षु पदार्थेषु' पूर्वगमे पूर्वाभावे परः परो
गवेष्योऽन्वेषणीयः ( अर्थादादौ स्वभावमैत्री ( समसप्तकादिका ) गवेष्या,
तदलाभे स्वपत्योः सखिता ( मैत्री ), तदभावे राश्योर्वशित्वम्, तदलाभे
भयोनिशुद्धिर्गवेष्या । चेत् युगपद्युतिः ( चतुर्णां प्राप्तिः ) तदा हस्ते
त्रिवर्गी ( त्रयाणां 'धर्मार्थकामानां' वर्गाणां समाहारस्त्रिवर्गी ) स्यात् ॥
भा०—राशियों की स्वभावमैत्री १, स्वामियों की मैत्री २, वशित्व ३,
[L

२६ विवाहवृन्दावनम्- [ मेलक-


सं०-प्रसूतौ जन्मकाले, आपार्श्वकेन्द्रद्वयगाः स्वस्वपार्श्वकेन्द्रद्वय-
मध्यस्थाः, खपान्थाः ग्रहाः मिथस्तत्कालमित्राणि भवन्ति, अर्थादन्ये शत्रवो
भवन्ति । इदं तत्कालसख्यं स्त्रीनर-भृत्यराज्ञां ( स्त्रीनराणां, भृत्यस्वामिनां
च ) न्यूनामपि मैत्रीं ( स्वाभाविकग्रहमैत्रीं ) विशिनष्टि विशेषयति ।
अर्थात् स्वाभाविकसमोऽपि तत्कालमैत्र्या मित्रं भवति, स्वाभाविकशत्रुस्तु
तत्कालमैत्र्या समत्वं व्रजति, स्वाभाविकमित्रं तु अधिमित्रं भवतीत्यर्थः ॥

भा०-जन्मकुण्डली में ग्रहों के अपने स्थान से दोनों तरफ के दो केन्द्रों के
बीच में ( अर्थात् २, ३, ४, १२, ११, १० इन स्थानों में ) स्थित ग्रह तात्का-
लिक मित्र होते हैं । यह तात्कालिक मैत्री कन्यावर, और मालिक नौकर की अल्प
भी स्वाभाविक ग्रहमैत्री को विशेष बनाता है । अर्थात् तात्कालिक मैत्री से-
स्वाभाविक शत्रु भी सम, और स्वाभाविक सम मित्र और स्वाभाविक मित्र अधि-
मित्र हो जाता है ॥१५॥

अथ ग्रन्थकारः स्वदेशाभिप्रायिकवर्णमैत्रीं कथयति-

षट्कर्मणां शासितदेवदैत्यौ राजन्यकस्याधिपती कुजार्को ।
विट्-शूद्रयोश्चन्द्र-बुधौ शनिश्च संकीर्णपः स्त्रीनृषु वर्णमैत्री ॥१६॥

सं० - शासिसतदेवदैत्यौ ( गुरुशुकौ ) षट्कर्मणां ( ब्राह्मणानां )
अधिपती, कुजार्को राजन्यकस्य क्षत्रियस्याधिपती, चन्द्रबुधौ क्रमेण
विट्शूद्रयोः अधिपती ( वैश्यस्य चन्द्रः, शूद्रस्य बुध इत्यर्थः ), शनिश्च
संकीर्णपः ( संकराणां हीनवर्णानां पतिः ) एवं स्त्रीनृषु कन्यावरेषु वर्णमैत्री
विचार्या । अर्थात् वधूवरयोः राशीशयोर्वर्णौ विलोक्यौ, तत्रोत्तमवर्णो
वरः श्रेष्ठः, समवर्णः समः, हीनवर्णस्तु निकृष्ट इति ।
इयं वर्णमैत्री ग्रन्थकारेण स्वदेशाप्रायेणोक्ता, अन्यदेशेषु तु-
“द्विजा झषालिकर्कटास्ततो नृपा विशोऽघ्रिजाः । वरस्य वर्णतोऽधिका
वधूर्न शस्यते बुधैः” इत्यनेनैव वर्णमैत्री ग्राह्या ॥ १६ ॥

भा०-गुरु शुक्र ब्राह्मणों के अधिपति हैं, सूर्य और मंगल क्षत्रियों के, चन्द्रमा
वैश्यों का, बुध शूद्रों का, और शनि अन्त्यजों का अधिपति है । वरकन्या की
राश्यधिप से वर्णमैत्री देखना चाहिये । यथा कन्या से उच्चवर्ण वर श्रेष्ठ, समानवर्ण
मध्यम, और हीनवर्ण अधम होता है ॥ १६ ॥

यवीयसीत्याह—!

Wait, let's check L11:
"बुध के रवि छोड़कर सब ग्रह, बृहस्पति के मङ्गल छोड़कर सब ग्रह, शुक्र के रवि"
In "मङ्गल छोड़कर":
Wait, in "छोड़कर": look at L11: "छोड़रुर" or "छोड़कुर" or "छोड़कर"?
Let's zoom in on L11:
"बृहस्पति के मङ्गल छोड़कुर सब ग्रह" -> wait, is that "छोड़कर" or "छोड़कुर"?
Look at the 'क': it has a small loop, wait, no, it's 'छोड़कर', the 'क' has a loop that might look slightly broken or smudged, let's check:
"मङ्गल छोड़कर सब ग्रह" - looks like 'छोड़कर'.

Everything looks very consistent and clear.वि०—ग्रन्थकारने अपने देश के अभिप्राय से यह वर्णमैत्री कहा है—अन्य
देशों में—'द्विजा झषालिकर्कटाः' इत्यादि राशियों के वर्णमैत्री देखना चाहिये १६
अथ यवनजातकोक्तग्रहमैत्रीं कथयति—
सुरगुरुर्ज्ञगुरू कविकोविदौ विरवयो विकुजा विरवीन्दवः ।
अशशिसूर्यकुजाः सुहृदो रवेर्यवनयुक्तिरियं न यवीयसी ॥१७॥
सं०—सुरगुरुः, ज्ञ-गुरू, कविकोविदौ, विरवयः, विकुजाः, विरवी-
न्दवः, अशशिसूर्यकुजाः, इति रवेः ( रविमारभ्य ) क्रमेण सप्तग्रहाणां
सुहृदः ( मित्राणि ) स्युः । मित्रतोऽन्ये शत्रव इत्यर्थादेव सिद्ध्यति । इयं
यवनयुक्तिः न यवीयसी ( न लघुतरा ), अपि तु गरीयस्येव ॥१७॥
भा०—सूर्य के बृहस्पति, चन्द्रमा के बुध, बृहस्पति, मङ्गल के बुध, शुक्र,
बुध के रवि छोड़कर सब ग्रह, बृहस्पति के मङ्गल छोड़कर सब ग्रह, शुक्र के रवि
चन्द्र को छोड़कर शेष सब ग्रह, तथा शनि के चन्द्र रवि मङ्गल छोड़कर शेष तीन
ग्रह मित्र हैं। अर्थात् मित्र से अन्य ग्रह शत्रु हैं। यह यवनाचार्य की युक्ति छोटी
( अमान्य ) नहीं है, अर्थात् माननीय है ॥१७॥
यवनयुक्तिः कथं न यवीयसीत्याह—
इदमुदीर्य वराहविरोचनो निजमतेऽपि न दूषितवान्पुनः ।
स बहु मन्यत एव यथातथं जयति शास्त्रमिदं यवनेष्वपि ॥१८॥
सं०—वराहविरोचनः ( वराहमिहिरः ) अपि इदं ( उपरोक्तं ग्रह-
मैत्रं ) निजमते ( बृहज्जातके ) उदीर्य ( उक्त्वा ) पुनर्न दूषितवान् ।
यवनेष्वपि इदं शास्त्रं यथातथं बहु अतिशयं जयतीति-स ( वराहमिहिरः )
मन्यत एव ( स्वीकारोत्येवेति ) ॥१८॥
भा०—वराहमिहिरार्य ने भी उपरोक्त यवनोक्त ग्रह-मैत्री अपने बृहज्जातक में
में कहकर फिर उसे दूषित नहीं किया । क्योंकि—'यवनों में भी यह शास्त्र यथार्थ
रूप से वर्तमान है' इस प्रकार वराह मिहिर भी मानते ही हैं ॥१८॥
यवनमतं कथं मन्यते इत्याह—
परमतं स्वमते विनिवेशितं यदि न दूषितमादृतमेव तत् ।
कलितकेवलसत्यमतः स तद्यवनयुक्तिषु नूनमनिस्पृहः ॥१९॥
सं०—यदि स्वमते विनिवेशितं परमतं न दूषितं तदा तत् ( परमतं )

३८ विवाहवृन्दावनम्— { मेलक-
आहृतमेव । स वराहमिहिरः कलितकेवलसत्यमतः (कलितं संगृहीतं केवलं
सत्यस्य सत्याचार्यस्य मतं येन स तथोक्तः ) सन् यवनयुक्तिषु ( यवना-
चार्योक्तिषु ) नूनं अनिस्पृहः ( स्पृहायुक्तः ) स्यात् ॥ १९ ॥
भा०--यदि अपने मत में दूसरों का मत रख कर उसमें दोष न दिया जाय
तो वह ( परमत ) स्वीकृत ही समझा जाता है । अतः केवल सत्याचार्य के वचनों
को संग्रह करने वाले वराहमिहिर ने भी निश्चय यवनाचार्यों की कही उक्त ग्रहमैत्री
में स्पृहा की है ॥ १९ ॥
यवनयुक्तिषु स्पृहयैव वराहेण "केषाञ्चिदेवं मतम्” इत्यल्पमतत्वं
प्रतिपाद्य न खण्डितमित्याह—
किमबहुत्वमयं मिहिरो दिशन्ग्रहसुहृत्त्वमिदं जगृहे हृदि ।
उभयथापि समं सति तन्मते महति केऽपि भवेम वयं यतः ॥२०॥
सं०-अयं मिहिरः इदं 'यवनोक्तं' ग्रहसुहृत्त्वं दिशन् कथयन् हृदि
( मनसि ) अबहुत्वं ( अल्पमतत्वं ) किं जगृहे ( किं गृहीतवान् ? ),
अर्थात् अल्पमतत्वात् कथं न खण्डितम् ? । अत्रोच्यते—यतः 'तन्मते ( तस्य
यवनस्य मते ) महति सति वयं केपि भवेम' सत्याचार्यमते महति सति
वयं महान्त एवेत्युभयथापि (उभयत्रापि) समं तुल्यं स्यात् ॥ २० ॥
भ०—वराहमिहिरने यवनमैत्रीको कहते हुए हृदयमें उसका अल्पमतत्व क्यों
रखा ? । खण्डन क्यों न किया ? इसका उत्तर कहते हैं—क्योंकि यवनाचार्यका
मत श्रेष्ठ माना जाय तो हम भी श्रेष्ठ समझे जायेंगे, सत्याचार्यके मत श्रेष्ठ होनेसे
तो हम श्रेष्ठ हैं ही, इस प्रकार दोनों पक्ष बराबर अर्थात् दोनों हाथ लड्डू है ॥
स बहुसम्मतमनुसरतीति चेत् तदप्यसङ्गतमेवेत्याह—
बहुतरैः कृतमेव कृती स चेदनुससर्ति तदप्ययथातथम् ।
पृथगपि द्विगुणे त्रिगुणे सकृत्त्रिगुणमित्यबहूक्तिरियं यतः ॥२१॥
सं०—स कृती ( वराहमिहिरः ) बहुतरैः कृतमेवानुससर्ति ( बहु-
सम्मतमेवानुसरति ) इति चेत् तदप्ययथातथम् ( असङ्गतम् ), यतः
पृथक् द्विगुणे, त्रिगुणे 'प्राप्ते' अपि “सकृत् त्रिगुणम्” इयं अबहूक्तिः
( अल्पजनोक्तिरेव ) । वराहमिहिरेण तु “द्वित्रिगुणत्वे सकृत्त्रिगुणम्”
इत्युक्तमतः स न बहुसम्मतावलम्बीति सिद्धयति । तथाह कल्याणवर्मा—

प्रकरणम् ३ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । २४
“बहुताडनसम्प्राप्तौ यां करोत्येकवर्गणाम् ।
वराहमिहिराचार्यः सा न दृष्टा पुरातनैः ॥” इति ॥२१॥
वि०-ग्रन्थकारेण वराहमिहिरस्याशयमबुद्ध्वैव जल्पितम् । वराह-
मिहिरेण तु—श्लोकपूर्वार्धेन यवनादिग्रहमैत्रेऽल्पसम्मतत्वं प्रतिपाद्य, द्वि-
तीयार्धेन—“सत्याद्युक्तमेव ग्रहमैत्रं ग्राह्यमिति—स्वजातके—‘स्वलक्षण-
विधेर्विरोधान्यैर्यवनादिभिः प्रतिपादितं ग्रहमैत्रं न ग्राह्य”मिति च स्पष्ट-
मेवोक्तमिति विवेचनीयं विपश्चिद्भिः ॥२१॥
भा०—यदि ऐसा कहा जाय कि—‘वराहमिहिराचार्य—बहुसम्मत को ही
मानते हैं” तो यह भी असङ्गत ही है, क्योंकि—पृथक् पृथक् द्विगुण, त्रिगुण प्राप्त
होने पर भी उन्होंने एक बार त्रिगुण करना ही कहा है, परञ्च ऐसी बहुतों की
सम्मति नहीं है। इसलिये यवनोक्त मैत्री ग्राह्य है, यह ग्रन्थकार का आशय है ॥
अथ नवांशसख्ये विशेषं कथयात्—
अभिदुरावधिपौ सृजतः शुभं शशिनवांशकयोरिति देवलः ।
तदपि चारु न चारुषितैर्मुखैर्व्यवहरन्ति तथा वितथाशयाः ॥२२॥
सं०—शशिनवांशकयोः अभिदुरौ ( अभिन्नौ, मिथः सुहृदौ वा )
अधिपौ शुभं सृजतः (कुरुतः) इति देवलो मुनिः कथितवान् । तत् ( देव-
लोक्तं ) चारु ( सुष्ठुतरं ) अपि आरुषितैः, रोषपरिपूरितैर्मुखैः वितथाशयाः
( तुच्छहृदया जनाः ) तथा न व्यवहरन्ति चन्द्रनवांशसख्यं न स्वी-
कुर्वन्तीत्यर्थः ॥२२॥
भा०—‘वर कन्या के चन्द्रनवांशके पतियों में मैत्री हो तो शुभ होता है’ यह
देवल मुनि ने कहा है । परञ्च उसे शुभ होने पर भी कितने तुच्छ आशयवाले
रुष्टमुख होकर उस प्रकार ( मुनिकथनानुसार ) उसे व्यवहार में नहीं लाते हैं ॥
पुनर्विशेषं कथयति—
लवदृशैव हि लग्नदृशं विना फलममंसत येऽपि करग्रहे ।
शशिनवांशसखित्वपराङ्मुखाः किमलमस्तु गतानुगतं जगत् २३
सं०—येऽपि ‘आचार्याः’ लग्नदृशं विना लवदृशैव ( नवांशदृष्ट्यैव )
करग्रहे ( विवाहे ) फलं अमंसत ( मन्यन्ते स्म ) तेऽपि शशिनवांश-
सखित्वपराङ्मुखाः किं स्युः ? इत्यलमस्तु जगत् गतानुगतं स्यात् ॥२३॥

३० विवाहवृन्दावनम्— [ नवांशचिन्ता-
भा०—जो लग्नदृष्टि को छोड़कर केवल नवांशदृष्टि से ही फल मानते हैं, वे
भी चन्द्रनवांश मैत्री से क्यों विमुख होते हैं । अस्तु यह बात दूर ही रहे, संसार
गतानुगतिक है (अर्थात् एक को जैसे करते देखता, वैसा दूसरा करता, फिर उसे
देख तीसरा करता है; अर्थात् चन्द्रनवांशमैत्री नहीं मानना अन्धपरम्परा है ) ॥
अथ नवांशचिन्ताध्यायः ।
तत्र नवांशोपपत्तिव्याजेन यवनमैत्रीं द्रढयति—
नवलवाधिपती उदयास्तयो-रनिमिषार्चितचान्द्रमसायनौ ।
वरपपतिवरयोः समवैरिणौ यदि तदिष्टफलेष्वपि फल्गुता ॥ १ ॥
सं०—उदयास्तयोः ( लग्नसप्तमभावयोः ) नवलवाधिपती नवांश-
स्वामिनौ यदि—अनिमिषार्चितचान्द्रमसायनौ ( गुरुबुधौ ) ‘सत्याचार्य-
मतेन’ समवैरिणौ, भवतस्तत् ( तदा ) इष्टफलेष्वपि फल्गुता ( विफलता )
स्यात् ॥ १ ॥
भा०—‘सत्याचार्य के मत से’ परस्पर समशत्रु गुरु और बुध यदि क्रम से
लग्न और सप्तमभाव के नवांश पति हो ( अर्थात् लग्न सप्तम में धनु और मिथुन
के नवांश हो ) तो इष्टफल में भी व्यर्थता हो जायगी ॥ १ ॥
वि०—विवाहलग्न पतिस्थान और सप्तमभाव जाया स्थान है अतः उन दोनों
के नवांशपति में मैत्री होने से वरवधू में भी मैत्री हो सकती है । इस विचार से
लग्न में द्विपदराशियों के नवांश प्रशस्त हैं । जैसे मिथुन, धनु । परञ्च सत्याचार्य
के मत से दोनों के अधिप सम शत्रु हैं, अतः प्रशस्त में भी अशुभत्व हो जायगा;
और यवनोक्तमैत्री से मिथुन, धनु के स्वामियों में परस्पर मैत्री है, अतः यवनमैत्री
से द्विपद नवांश में शुभत्व हो सकता है, सत्याचार्य के मत से नहीं ॥ १ ॥
अतो यवनोक्तसौहृदमेव ग्राह्यमित्याह—
तदुदयद्विपदांशनियामको यवनसौहृदमाद्रियतां जनः ।
इतरथा कथमस्तु करग्रहस्तनुफलं हि लवानवलम्बते ॥ २ ॥
सं०—तत् तस्मात् उदयद्विपदांशनियामकः ( लग्ने द्विपदनवांश-
प्रयोजकः ) जनः यवनसौहृदमाद्रियताम् । इतरथा ( सत्याचार्योक्तग्रह-
मैत्र्या द्विपदभिन्ननवांशे ) करग्रहः ( विवाहः ) कथं स्यात् । हि( यतः )
तनुफलं लवान् नवांशान् अवलम्बते आश्रयते । तथोक्तं प्राचीनैः—

प्रकरणम् ४ ] वसन्तलक्ष्मौसहितम् । ३१
"लग्ने द्विपद्गृहांशो शुभफलमन्यांशकोदये नेष्टम् ॥ २ ॥
भा०—इसलिये लग्न में द्विपद् नवांश को शुभ मानने वाले यत्न मैत्री को
स्वीकार करें। अन्यथा (नवांश मैत्री विना) विवाह कैसे हो सकता है?
क्योंकि लग्न का फल नवांश के आश्रित है ॥ २ ॥
अथान्याशङ्कां तद्दोषं च कथयति—
अथ रिपू यदि नोभयसप्तमौ तदयशः कलशस्य किमागतम् ।
द्विपदतां दधतोऽथ शुभर्क्षता यदि वृषानिमिषौ किमुपेक्षितौ ॥३॥
सं०—अथ यदि उभयसप्तमौ रिपू न 'समसप्तकयोः स्वभावमित्र-
त्वात्' तत् (तदा) द्विपदतां दधतः कलशस्य (कुम्भस्य) अयशोऽ-
शुभत्वं किमागतम् ? । अथ नवांशग्रहणे यदि शुभर्क्षता (शुभस्वामित्व-
मेव मुख्यं) तर्हि वृषानिमिषौ (वृषमीनौ) शुभस्वामिनौ किं उपेक्षितौ
परित्यक्तौ ? ॥ ३ ॥
भा०—यदि ऐसा कहा जाय कि परस्पर सप्तम में मैत्री होती है इसलिये
धनुमिथुन द्विपद् होने के कारण शुभ है — तो फिर कुम्भके उत्तरार्धमें द्विपद् होने
पर अशुभत्व क्यों हुआ ? । कहो, कि नवांशमें शुभर्क्षता (शुभग्रहकी राशि
होना) ही प्रधान है—तो फिर वृष और मीन क्यों त्याग कर दिये गये ? ॥ ३ ॥
पुनः प्रत्युत्तरं कथयति—
अमनुजाविति चेत्किमु शौनको नवलवं झषमादृतवान्मुनिः ।
शुभगृहद्विपदास्तलवः स चेद् भवतु तत्र किमस्तु तुलाधरः ॥ ४ ॥
सं०—तौ वृषमीनौ—अमनुजौ (द्विपदभिन्नौ) इति चेत्—तर्हि
शौनको मुनिः झषं नवलवं किमु आदृतवान् । तथा च तद्वाक्यम्—"प्रह-
सितवदना च मीनांशे" इति । अथ स मीनः शुभगृहद्विपदास्तलवः
(शुभस्य गृहं, द्विपदोऽस्तलवो यस्य स तथोक्तः) इति चेत् भवतु तदा
तत्र तुलाधरः (तुलाराशिः) किमस्तु (लग्ने तुलनवांशः कथमस्त्वित्यर्थः) ।
भा०—वृष और मीन शुभग्रह की राशि होने पर भी द्विपद नहीं हैं—
इसलिये अग्राह्य है, ऐसा कहा जाय तो —शौनक मुनि ने मीननवांश को क्यों ग्रहण
किया ? । कहो कि—मीन शुभग्रह की राशि है और उससे सप्तम द्विपद (कन्या)
का नवांश होता है इसलिये ग्राह्य है, तब तुला क्या होगा ? तुला से सप्तमनवांश
मेष का है वह तो न शुभराशि है न द्विपद् है तो फिर तुला क्यों ग्राह्य हुआ ॥४॥

३२ विवाहवृन्दावनम्- [ नवांशचिन्ता-
अत्र पुनः प्रत्युत्तरं कथयति-
द्विचरणः शुभभं च नवांशकस्तदयमेकतरः परिगृह्यते ।
इदमसंगतमंग तवेरितं जगति नैकवशात् किल सौहृदम् ॥ ५ ॥
सं० - नवांशको द्विचरणः, शुभभं च भवति, तदयं ( नवांशकः )
एकतरः ( द्विचरणो वा शुभभं वा ) परिगृह्यते, एवं त्वयोच्यते चेत्, तदा
हे अङ्ग ! इदं तवेरितं ( त्वया कथितं ) असङ्गतमेव । किल यतो जगति
संसारे एकवशात् सौहृदं न भवति ॥ ५ ॥
भा०-यदि ऐसा कहो कि--द्विपद और शुभग्रह की राशि इन दो में से
एक भी हो तो ग्रहण किया जाता है। परन्तु हे मित्र ! तुम्हारा यह भी कहना
असङ्गत है, क्योंकि संसार में केवल एक से ही मैत्री नहीं होती है ॥ ५ ॥
अथात्र सिद्धान्तमाह-
खचरयोः सखिता यदि कारणं ध्वनति सा नितरां यवनाध्वनि ।
कलशसिंहनवांशपशत्रुता परिणमत्युभयोरपि शास्त्रयोः ॥ ६ ॥
सं०-यदि खचरयोः (उदयास्तांशाधिपयोः) सखिता (मैत्री)
एव कारणं स्यात् तदा सा (सखिता = ग्रहमैत्री) यवनाध्वनि यवना-
चार्यमार्गे नितरां ध्वनति (शब्दायते सर्वत्र प्रसिद्धेत्यर्थः) । सत्याचार्यमतेन
धनुर्मिथुनयोः सखित्वाभावाद् यवनमैत्रमेव साधुतरमिति भावः । कुम्भ
सिंहांशत्यागे युक्तिं कथयति-उभयोः (यवन-सत्याचार्ययोर्द्वयोः) अपि
शास्त्रयोः कलशसिंहनवांशपशत्रुता परिणमति । अतो यवनमैत्र्यापि
तत्त्याज्यता सिद्धयत्यतो यवनमतमेव प्रधानमित्याचार्यस्याभिप्रायः ॥ ६ ॥
भा०-यदि लग्न सप्तम के नवांशाधिपों में मैत्री होना ही कारण हो तो-
वह मैत्री यवनशास्त्र में ही प्रसिद्ध है । सत्याचार्य के मत से धनु मिथुन के स्वामियों
में मैत्री नहीं है । और कुम्भ सिंह के स्वामियों में शत्रुता तो दोनों ही (यवन
और सत्याचार्य) के शास्त्र में प्रसिद्ध है । "इसलिये यवनमत से भी कुम्भ सिंह
त्याज्य है, अतः यवन ही का मत श्रेष्ठ है" यह आचार्य का आशय है ॥ ६ ॥
नवांशपतिमैत्री विचार्यते चेत्तर्हि राशिपतिमैत्री किं नेत्याह-
अथ तयोः समसप्तसुहृत्पथः कथमसूक्ष्मगतिः स च नैकधा ।
इह हि लग्नगतान्यनुमेनिरे तदखिलैः खलखेटगृहाण्यपि ॥ ७ ॥

प्रकरणम् ४ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ३३

सं०-अथ तयोः ( यवन-सत्याचार्यमतयोः ) समसप्तसुहृत्पथः कथं
असूक्ष्मगतिः ? अपि तु सूक्ष्मगतिरेव । स च ( सुहृत्पथः) हि यतः एकधा
न, अपि तु तत्कालनिसर्गभेदाद् द्विधाऽस्ति, तत् तस्मात् इह ( विवाहे )
अखिलैः ( समस्तैः = यवनसत्यादिभिः ) खलखेटगृहाणि ( पापभानि )
अपि अनुमेनिरे, किं पुनः शुभगृहाणीत्यर्थः ॥ ७ ॥
भा०-परस्परसमसप्तक मैत्री दोनों ( यवन और सत्याचार्य ) के शास्त्र में
असूक्ष्म कैसे हो सकता है ? अर्थात् सूक्ष्म ही है । परञ्च वह मैत्री एकही प्रकार
का नहीं है, अर्थात् तात्कालिक नैसर्गिक भेद से अनेक प्रकार है । इसलिये सब
( यवन-सत्य आदि ) आचार्यों ने पापग्रहराशियों को भी स्वीकार किया है, अर्थात्
लग्न में सब राशि गृहीत है ॥ ७ ॥
तत्रापि पूर्णशुभफलादिकत्वं प्रतिपादयति-
इति तुलाजितुमप्रमदाधनुः-प्रथमखण्डमखण्डफलं जगुः ।
सततमस्तपतिद्विषदीश्वरं नवलवं बलवन्ध्यपतिं त्यजेत् ॥ ८ ॥
सं०-इत्यस्मात् ( उपरोक्तकारणात् ) तुला-जितुम-प्रमदा-धनुः-
प्रथमखण्डं सततं ( अनवरतं ) अखण्डफलं ( पूर्णशुभफलं ) जगुः
( आचार्या ऊचुः ) । अथात्र विशेषं कथयति-अस्तपतिद्विषदीश्वरं
( अस्तपतेः सप्तमेशस्य द्विषत शत्रुः ईश्वरो यस्य तं ) नवलवं तथा बल-
वन्ध्यपतिं ( बलने वन्ध्यः पतिर्यस्य तं ) नवलवं ( नवांशं ) च त्यजेत् ॥
भा०--उपरोक्त कारणों से--तुला, मिथुन, कन्या और धनु का पूर्वार्ध इनमें
शुभ फल होता है। ऐसा प्राचीनाचार्यों ने कहा है। सप्तमेश के शत्रु जिस
राशि का स्वामी हो उस नवांश को तथा जिसका स्वामी निर्बल हो उस नवांश
को त्याग देना चाहिये ॥ ८ ॥
अथ लग्नसप्तमयोः शुद्धिं कथयति --
लवपतिः कुरुते लवलग्नयोः पतिमृतिं त्रिवसुव्ययवित्तगः ।
नवलवास्तपतिः प्रतिहन्त्यसून् मृगदृशश्च तदस्तभयोस्तथा ॥ ६ ॥
सं०-लवपतिः ( नवांशस्वामी ) लवलग्नयोः त्रिवसुव्ययवित्तगः
पतिमृतिं ( वरमरणं ) कुरुते । तथा नवलवास्तपतिः ( नवांशसप्तमेशः )
तदस्तभयोः ( नवांशसप्तमात्-लग्नसप्तमाद्वा ) तथा ( त्रिवसुव्ययवित्तगः )
मृगदृशः ( कन्यायाः ) असून् प्राणान् प्रतिहन्ति ( नाशयति ) ॥ ९ ॥
५

३४ विवाहवृन्दावनम्- [ नवांशचिन्ता-

भा०—उद्गगतनवांश का स्वामी नवांश से अथवा लग्न से ३, ८, १२, २*
इन स्थानों में हो तो वर का नाश करता है । यदि नवांश का सप्तमेश नवांश-
सप्तम से वा लग्न सप्तम से ३, ८, १२, २, में हो तो कन्या का नाश करता है ।
उभयहक् फलदा बलदाढ्य॑तो लवदृगुद्वहते क्रियदूनताम् ।
तदिह केवललग्नदृशः फलं शकलितं कलितं यवनेश्वरैः ॥१०॥
सं०—उभयदृक् ( उभयस्य = लग्नस्य, नवांशस्य च दृष्टिः ) बल-
दाढ्यंतो ( बलदृढ़त्वात् कारणात् ) फलदा ( विशिष्टफलप्रदा ) स्यात् ।
लवदृग् ( केवलनवांशदृष्टिः ) क्रियदूनतां ( किञ्चिन्न्यूनतां ) उद्वहते ।
तत् ( तस्मात् ) इह ( विवाहे ) केवललग्नदृशः फलं यवनेश्वरैः शकलितं
( खण्ड

प्रकरणम् ४ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ३५

सं०—इह ( विवाहकाले ) अंशपतिः विलग्नविलोकने सति निजं
नवांशकं कलयति ( पश्यति ) । नवांशपतिः यं अवलोकयते स तनोः
( लग्नात् ) पृथक् , यद्येवं तदा तदिष्टफलाय जलाञ्जलिः स्यात् ( लग्न-
फलमपि नष्टमेवेत्यर्थः ) ॥ १२ ॥
भा०—नवांशपति लग्न को देखने पर उसके मध्यस्थ अपने नवांश को भी
देखता ही है । अगर ऐसा कहो कि—जिस नवांश को वह देखता है, वह लग्न
से पृथक् है, तब तो लग्न के फल के लिये तिलाञ्जलि देना होगा ( अर्थात् शुभ
नवांशजन्य लग्न का शुभफल भी नहीं होगा ) ॥ १२ ॥
अपृथगस्ति स चेन्ननु पश्यता तनुमसावधिपेन निरूपितः ।
हृदयहारदृशैव मृगीदृशः प्रणयिना तरलस्तरलद्युतिः ॥१३॥
सं०—ननु ( अहो ! ) चेत् स ( नवांशः ) अपृथक् ( लग्नान्तर्गत
एव ) अस्ति, तदा असौ ( नवांशः ) तनुं पश्यता अधिपेन ( स्वस्वामिना )
निरूपितः ( दृष्ट एव ) । 'केन क इव'—मृगीदृशः (स्त्रियाः) हृदयहारदृशा
( हृदयहारे दृग्दृष्टिर्यस्य तेन ) प्रणयिना प्रियेण तरलद्युतिस्तरलो हार-
मध्यस्थमणिरिव । हारे दृष्टे तन्मध्यस्थो मणिरपि यथा दृष्टो भवति, तथैव
लग्ने दृष्टे तदन्तर्गतनवांशोऽपि दृष्ट एवेत्यर्थः ॥ १३ ॥
भा०—यदि नवांश लग्न के अन्तर्गत ही है तब तो—लग्न पर स्वामी की
दृष्टि होने से नवांश भी दृष्ट होगा, जैसे पति अपनी स्त्री के हृदयस्थितहार पर
दृष्टि रखने से हार के मध्यस्थित मणि को भी देखता ही है ॥ १३ ॥
अथ परमतं दूषयति—
तनुपतिस्तनुपस्तमथास्तपो यदि न पश्यति नश्यति तत्कृतम् ।
इति परः परमत्र मते पतेल्लवतरौ बत रौद्र इवाशनिः ॥१४॥
सं०—"यदि तनुपतिः तनुं, तथास्तपोऽस्तं ( सप्तमं ) न पश्यति
तदा तत्कृतं 'शुभफलं' नश्यति" इति परः प्राह । परं बत 'इति खेदे'
अत्र मते लवतरौ ( नवांशरूपवृक्षे ) रोद्रः कठोरः इव अशनिर्वज्रं पतेत् ॥
भा०—यदि लग्नेश लग्न को और सप्तमेश सप्तम को न देखे तो लग्न और
नवांश का फल नष्ट हो जाता है, ऐसा किसी ने कहा है । परञ्च इस प्रकार के
मत में तो नवांशरूपी वृक्ष पर कठोर वज्रपात ही है ॥ १४ ॥

३६ विवाहवृन्दावनम्- [ नवांशचिन्ता-
अथ जन्मलग्नराशिभ्यामुद्यास्तशुद्धिमाह-
जननलग्नभयोर्मृतिशासितुर्मृतिगतस्य च राशिनवांशकाः ।
तनुगता यदि तत्तनुते वधूरतिलका तिलकाय जलाञ्जलिम् ॥१५॥
सं०-जननलग्नभयोः ( जन्मलग्न-जन्मराशिभ्यां ) मृतिशासितुः
( अष्टमेशस्य ), मृतिगतस्य ( अष्टमस्थानस्थितस्य ) च राशिनवांशकाः
तनुगताः ( लग्नस्थिताः ) यदि स्युः, तत् तदा वधूः अतिलका स्वामिरहिता
सती तिलकाय (स्वामिने) जलाञ्जलिं तनुते- 'विधवा भवतीत्यर्थः' ।१५।
भा०-जन्मलग्न और जन्मराशि से अष्टमेश की राशि के वा अष्टमस्थान-
स्थित ग्रह की राशि के नवांश लग्न में हो तो वह स्त्री विधवा होकर अपने स्वामी
को जलाञ्जलि देती है ॥ १५ ॥
वि०- "स्वयं जलाञ्जलि देती है" इस शब्द से अनपत्यता योग भी सिद्ध
होता है ॥ १५ ॥
अथाष्टमलग्नदोषं तत्परिहारं च कथयति-
व्यलिवृषं जननर्क्षविलग्नयोर्भवनमष्टममभ्युदितं त्यजेत् ।
सितपुलस्तिमतेन तदीशता तनुसमेति समेति न दूषणम् ॥१६॥
सं०-जननर्क्षविलग्नयोः ( जन्मराशिलग्नाभ्यां ) व्यलिवृषं ( वृष-
वृश्चिकभिन्नं ) अष्टमभवनं अभ्युदितं ( लग्नगतं ) त्यजेत् । यतः तदीशता
( तयोर्वृषवृश्चिकयोरोशता = स्वामिता ) तनुसमा 'तत्स्वाम्येव लग्नस्यापि
स्वामीत्यर्थः' इत्यस्मात् सितपुलस्तिमतेन दूषणं न समेति ( नागच्छति ) ॥
भा०-जन्मलग्न और जन्मराशि से वृष वृश्चिक से अतिरिक्त अष्टमराशि
विवाहलग्न में छोड़ देना चाहिये । क्योंकि अष्टमस्थ वृश्चिक और वृष के स्वामी ही
लग्न का भी स्वामी होता है, इसलिये शुक्र और पुलस्ति के मत से दोष नहीं
आता है ॥ १६ ॥
वि०- मेष लग्न में अष्टम वृश्चिक, और तुला लग्न में अष्टम वृष पड़ता है,
अतः एकाधिपत्य होने के कारण वृष, वृश्चिक अष्टम होने पर भी विवाह लग्न में
ग्राह्य है । और अन्य त्याज्य है ॥ १६ ॥
अथ चरत्रययोगे दोषमाह-
चरलवञ्चरवेश्मगमुत्सृजेन्मृगतुलाधरगे मृगलक्ष्मणि ।
युवतिरत्र भवेत्कृतकौतुका मदनवत्यनवत्यजनोन्मुखी ॥१७॥

प्रकरणम् ४ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ३७

सं०-मृगलक्ष्मणि चन्द्रे मृगतुलाधरगे सति चरवेश्मगं ( चरलग्न-
गतं ) चरलवं ( चरनवांशं ) उत्सृजेत् ( त्यजेत् ) । यतोऽत्र कृतकौतुका
( विवाहिता ) युवतिः मदनवती कामातुरा सती अनवत्यजनोन्मुखी
( अनवस्य पुरातनस्य भर्तुः त्यजने उन्मुखी उत्सुका ) भवति ॥१७॥
भा०-मकर वा तुला में चन्द्रमा हो तो चरलग्न में चरनवांश त्याज्य है ।
क्योंकि उसमें विवाहिता स्त्री कामातुरा होकर पूर्वपति को त्याग कर परपुरुष से
प्रीति करने के लिये उत्कण्ठिता होती है ॥१७॥
अथ चतुर्थद्वादशभावयोर्दोषं तत्परिहारं चाह—
सुखगृहं सुखहृत्तनुजन्मनोरबलताशबलैः सुखकर्तृभिः ।
अपि तयोर्व्ययभं व्ययभंकृ चेद्विगतबाधनका धनकारिणः ॥१८॥
सं०-सुखकर्तृभिः ( चतुर्थेशादिसुखभावसम्बन्धिग्रहैः ) अबल-
ताशबलैः ( दौर्बल्यदूषितैः = निर्बलैः सद्भिः ) तनुजन्मनोः ( जन्मलग्न-
जन्मराश्योः ) सुखगृहं चतुर्थस्थानं 'विवाहलग्नगतं' सुखहृत् भवति ।
तयोः ( जन्मलग्न-राश्योः ) व्ययभं द्वादशगृहं अपि 'विवाहलग्नगतं'
व्ययभंकृ ( व्ययनिवारकं ) भवति—चेत् धनकारिणः ( द्वितीयेशादि-
धनभावसम्बन्धिग्रहाः ) विगतबाधनकाः ( बाधारहिताः = सबलाःस्युः )
तदा । निर्बलाश्चेत् तदा व्ययकारक एवेत्यर्थः ॥१८॥
भा०--चतुर्थेश आदि सुखकारक ग्रह निर्बल हो तो जन्मलग्न जन्मराशि से
चतुर्थ राशि विवाहलग्न में सुखनाशकारक होता है । तथा जन्मलग्न वा जन्म-
राशि से द्वादशराशि विवाहलग्न में पड़े और यदि द्वितीयेशादि धनकारक ग्रह
पुष्टबली हो तो व्यय को भंग करनेवाला होता है । अर्थात् धनकारक ग्रह निर्बल
हो तो व्ययकारक ही होता है ॥१८॥
जन्मकालिकपापगतनवांशदोषं तदपवादं च कथयति--
अशुभकृत्खलगः खलु योंशको जनुरनेहसि नेह सितांशुगे ।
तनुगतेपि शिवं युवयोष्योर्बलवतो लवतो न भयं क्वचित् ॥१६॥
सं०-जनुरनेहसि(जन्मकाले)अशुभकृत्खलगः योंऽशकः (नवांशः)
अस्ति, इह ( अस्मिन् नवांशे ) सितांशुगे ( चन्द्रगते )तनुगते ( लग्नस्थे )
अपि वा, युवयोष्योः ( वरकन्ययोः ) शिवं शुभफलं न स्यात् । परञ्च
बलवतो लवतः ( बलयुक्तान्नवांशात् ) क्वचिद् भयं न स्यात् ॥ १९ ॥

३८ विवाहवृन्दावनम्- [ लग्नबल-
भा० - जन्म समय में अशुभकारक पापग्रह जिस नवांश में हो वह विवाह-
कालिक चन्द्रमा में वा लग्न में पड़े तो वर कन्या को शुभ फल नहीं होता है ।
परञ्च वह नवांश बलवान् ( स्वामी-शुभ ग्रह से युत दृष्ट ) हो तो कहीं कुछ भी
भय नहीं होता है ॥१९॥
अथ दोषान्तरं कथयति--
अनुजनुर्मुतिगो मृतिपश्च यः स तनुगस्तनुते न शिवं कचित् ।
इति विविक्तिरियं फलदा सदा स इह सिद्धयति चेत्समयः स्फुटः ॥
सं - अनुजनुः ( जनुरनुक्रम्य = अनुजनुः, जन्मसमये इत्यर्थः )
मृतिगः ( अष्टमगतः ) यः, मृतिपश्च ( अष्टमपतिश्च ) यः स तनुगतः
( विवाहलग्नस्थः ) क्वचित् शिवं (शुभं) न तनुते । इत्येवं इयं (पूर्वोक्ता)
विविक्तिः ( विवेकोक्तिः ) 'तदैव' सदा फलदा स्यात्, चेत् यदि स समयः
( जन्मेष्टकालः, विवाहेष्टकालश्च ) स्फुटः सिद्ध्यति ॥२०॥
भा०- जन्मलग्न से अष्टमस्थान स्थित ग्रह और अष्टमेश जो हो वह ग्रह यदि
विवाह लग्न में पड़े तो कभी शुभ नहीं होता है । इस प्रकार यह पूर्वोक्त विवेक
तभी फलप्रद हो सकता है यदि जन्मेष्टकाल, और विवाहेष्टकाल अत्यन्त स्पष्ट हो ।
अन्यथा नहीं ॥ २० ॥
अथ लग्नबलाध्यायः ।
तत्र ग्रहाणां शुभाशुभस्थानानि कथयति-
अरिपराक्रमलाभविनाशगो रविरविश्रमसौख्यसुतार्थदः ।
मदनमूर्तिशयः शयसंग्रहे मृगदृशामशनिः शनिराहुवत् ॥ १ ॥
सं०-मृगदृशां ( स्त्रीणां ) शयसंग्रहे ( पाणिग्रहणे ) अरिपराक्रम-
लाभविनाशगः ( षष्ठतृतीयैकादशाष्टमस्थानस्थः ) रविः अविश्रमसौख्य-
सुतार्थदः ( अनायास-सुख-पुत्रधनप्रदः ) स्यात् । तथा-मदनमूर्तिशयः
( सप्तम-लग्नयोर्गतः ) अशनिः ( वज्रमिव, घातकः ) स्यात् । किंवत् ?
शनिराहुवत् ( शनिराहू यद्वदेषु स्थानेषु तद्वदित्यर्थः ) । अर्थात् शनिराहो-
रपि रवितुल्यमेव फलं स्यात्, केतुफलमपि राहुवज्ज्ञेयम् ॥ १ ॥

प्रकरणम् ५ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ३६
भा०--स्त्रियों के पाणिग्रहण समय में लग्न से ६, ३, ११, ८ इन स्थानों में
रवि हो तो अनायास सुख, पुत्र और धनदायक होता है । तथा सप्तमस्थान वा
लग्न में रवि हो तो वज्र के समान शुभफल का नाशक होता है । जैसे शनि राहु
और केतु । अर्थात् शनि राहु केतु भी इन स्थानों में रवि के समान ही हैं ॥
त्रिधनलाभसुखेषु शुभः शशी निधनमूर्त्तिरिपुष्वतिगर्हितः ।
अशुभशुक्रसखः स खनत्यसून् दिनकरोनकरो न करोति शम् ॥
सं० त्रिधनलाभसुखेषु 'स्थितः' शशी शुभः स्यात् । निधनमूर्त्ति-
रिपुषु ( अष्टम-लग्न-षष्ठेषु ) स शशी अतिगर्हितः ( अत्यन्तदुष्टः ) स्यात् ।
शेषस्थानेषु सामान्यगर्हितः' इत्यर्थात् सिद्ध्यति । तथा स ( चन्द्रः )
अशुभशुक्रसखः ( अशुभ-शुक्राभ्यां सहितः ) असून् प्राणान् खनति
( नाशयति ) । तथा दिनकरोनकरः ( दिनकरेण ऊनाः करा यस्य सः
सूर्येण सहास्तमितः ) शं सुखं न करोति ॥ २ ॥
भा०--चन्द्रमा विवाहलग्न से ३, २, ११, ४ इन स्थानों में शुभप्रद है ।
और ८, १, ६ इन स्थानों में अत्यन्त अशुभ है । अशुभग्रह वा शुक्र से युक्त चन्द्रमा
हो तो प्राणनाशक होता है, तथा सूर्य के साथ अस्त हो तो भी शुभफल नहीं
देता है ॥ २ ॥
अवनिजस्त्रिभवारिषु वृद्धये मृतिकरो मृतिमूर्त्तिमदाश्रितः ।
इह नभोयुजि जीवदृशं विना च्युतनया तनयामिषभुग्वधूः ॥ ३ ॥
सं०—अवनिर्जः ( मङ्गलः ) त्रिभवारिषु वृद्धये भवति, तथा—मृति-
मूर्त्तिमदाश्रितः मृतिकरो भवति । इह ( अस्मिन् मङ्गले ) नभोयुजि
( दशमस्थानस्थे ) सति जीवदृशं ( गुरुदृष्टिं ) विना वधूः ( स्त्री )
च्युतनया ( नीतिरहिता ) तनयामिषभुक् ( सन्तानघातिनी भवतीत्यर्थः )
जीवदृष्टिश्चेत् तदा शुभफलं स्यादित्यर्थात् सिद्ध्यति ॥ ३ ॥
भा०—मङ्गल विवाहलग्न से ३, ११, ६ में वृद्धिकारक होता है । और
८, १, ७ में मरणकारक होता है । यदि १० स्थान में हो और उस पर गुरु की
दृष्टि न हो तो वह स्त्री अनीति करने वाली और अपने सन्तान को नाश करनेवाली
होती है । यदि बृहस्पति की दृष्टि हो तो शुभफल समझना ॥ ३ ॥
व्ययगृहं विरहय्य हिमांशुजः सकलवेश्मसु वेश्मसुतार्थदः ।
स नियतं विदधाति वधूवरं यमकरे मकरेङ्गितमृत्युगः ॥ ४ ॥

४० विवाहवृन्दावनम्— [ लग्नबल-
सं०—हिमांशुजः ( बुधः ) व्ययगृहं विरहय्य ( त्यक्त्वा ) सकल-
वेश्मसु वेश्मसुतार्थदः स्यात् । स ( बुधः ) मकरेङ्गित-मृत्युगः ( सप्तमा-
ष्टमस्थानस्थितः ) वधूवरं नियतं यमकरे विदधाति (मृत्युं प्रापयतीत्यर्थः) ।
भा०—बुध विवाहलग्न से १२ को छोड़कर शेष ( १, २, ३, ४, ५, ६,
९, १०, ११ ) स्थानों में, गृह, पुत्र और धन दायक होता है। तथा ७ । ८
स्थानों में हो तो वर और कन्या को यमराज के हाथ में पहुँचा देता है, ॥ ४ ॥
गुरुरनन्त्यमदेषु मुदं श्रियं सृजति कालगृहे गृहभङ्गदः ।
अशुभकृन्मकरेपि करग्रहे न मृगराजगतो जगतो हितः ॥ ५ ॥
सं०—गुरुः विवाहे अनन्त्यमदेषु ( द्वादश-सप्तमरहितेषु ) स्थानेषु
स्थितः मुदं ( हर्षं ) श्रियं ( सम्पत्तिं ) च सृजति करोति । कालगृहे
( अष्टमस्थाने ) स्थितः गृहभङ्गदः (गृहं भार्या, तद्विनाशको भवतीत्यर्थः) ।
मकरेऽपि 'स्थितो गुरुः' अशुभकृत् स्यात् । मृगराजगतः ( सिंहस्थितः )
गुरुः जगतः ( संसारस्य ) हितो न भवति ॥ ५ ॥
भा०-बृहस्पति विवाह लग्न से १, २, ३, ४, ५, ६, ९, १०, ११ इन
स्थानों में आनन्द और सम्पत्ति दायक होता है। अष्टम स्थान में स्त्री का नाश-
कारक होता है। तथा मकरस्थ गुरु अशुभ होता है। ओर सिंहस्थ गुरु संसार
का हितकारक नहीं होता है ॥ ५ ॥
सहसपत्ननिमीलनमन्मथे प्रथमदेवगुरुर्गुरुभीतिकृत् ।
वहति शेषगृहेषु महोत्सवं व्ययगतः समतां स मतान्तरात् ॥ ६ ॥
सं०—प्रथमदेवगुरुः ( शुक्रः ) सहसपत्ननिमीलनमन्मथे*स्थितः
गुरुभीतिकृत् ( महाभयकारकः ) स्यात् । शेषगृहेषु महोत्सवं वहति
ददाति । मतान्तरात् व्ययगतः ( द्वादशस्थः ) स ( शुक्रः ) समतां वहति
( शुभाशुभं न ददातीत्यर्थः ) ॥ ६ ॥
भा०—शुक्र विवाह लग्न से ३, ६, ८, ७ इन स्थानों में महा भयकारक
होता है। शेष स्थानो में अतिशय मङ्गलकारक है। तथा मतान्तर ( अन्याचार्यों
के मत ) से १२ स्थान में सम हो जाता है ( अर्थात् शुभ अशुभ कुछ भी नहीं
देता हैं ) ॥ ६ ॥

  • नामैकदेशग्रहणेन नामग्रहणात्—'सहे'ति सहजं तृतीयं स्थानम् ॥

प्रकरणम् ५] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ४१
अथ दुरधरा ( कर्तरो ) दोषं जामित्रदोषं च कथयति --
खलकृता तनुरोहिणीमित्रयोर्दुरधरा विधुरां कुरुते वधूम् ।
श्रुतिशरांशमितं स्मरभे तयोर्ग्रहमपुण्यमपुण्यमिव त्यजेत् ॥ ७ ॥
सं०-तनुरोहिणीमित्रयोः ( लग्नचन्द्रयोः ) खलकृता पापग्रहजनिता
दुरधरा 'कर्तरी'* वधूं विधुरां ( दुःखिनीं ) कुरुते । तयोः (लग्नचन्द्रयोः)
स्मरभे ( सप्तमे ) श्रुतिशरांशं चतुःपञ्चाशन्नवांशं इतं ( प्राप्तं ) अपुण्यं
( पापग्रहं ) अपुण्यं ( पापं ) इव त्यजेत् ॥ ७ ॥
भा०-विवाहकालिक लग्न और चन्द्रमा में पापसम्बन्धी दुरधरा ( कर्तरी
योग ) हो तो स्त्री दुःखभागिनी ( पतिरहिता ) होती है । तथा लग्न वा चन्द्रमा
से सप्तम में ५४ वाँ नवांश में स्थित पापग्रह को पाप के समान ही त्याग कर
देना चाहिये ॥ ७ ॥
अथ गुरुशुक्रयोर्बाल्यादिदोषं कथयति-
क्षिपति सप्त दिनान्युदयास्तयोः सुरगुरुश्च भृगुश्च गतैष्ययोः ।
इह युगेपि युगस्य करग्रहः स्फुटममङ्गलदो गलदोजसि ॥ ८ ॥
सं०-सुरगुरुः, भृगुश्च गतैष्ययोः उदयास्तयोः ( उदये गते, अस्ते
एष्ये सतीत्यर्थः ) सप्तदिनानि क्षिपति ( शुभकार्यं विनाशयतीत्यर्थः ) तथा
इहास्मिन् युगे ( गुरु-शुक्रद्वये ) गलदोजसि ( निर्बले ) अपि युगस्य
( वधूवरद्वयस्य ) करग्रहः ( विवाहः ) स्फुटं अमङ्गलदो भवति ॥ ८ ॥
भा०-गुरु और शुक्र उदय से पीछे और अस्त होने से पूर्व ७।७ दिन
शुभकार्य के विनाशकारक होते हैं । अर्थात् ७ दिन बाल्य और ७ दिन वृद्ध रहते
हैं, उसमें विवाहादि शुभकार्य त्याज्य है । तथा ये ( गुरु, शुक्र ) यदि निर्बल हों
तब भी वरवधू का विवाह अत्यन्त अशुभप्रद होता है ॥ ८ ॥
अथात्र विशेषं कथयति-
शिशुजरत्वमहान्युदयास्तयोर्दश चतुर्दश चाङ्गिरसः स्फुटम् ।
उशनसो दश पञ्च च पश्चिमे गतिवशाच्चिदशाहमपश्चिमे ॥ ६ ॥
सं०-अङ्गिरसः ( गुरोः ) उदयास्तयोः दश चतुर्दश अहानि
( दिनानि ) 'क्रमेण' स्फुटं शिशुजरत्वं ( बाल्य-वृद्धत्वं ) स्यात् । उशनसः

  • द्वितीय-द्वादशयोर्ग्रहस्थित्या दुरधरा भवति ॥
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