विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयवीयसीत्याह—!
Wait, let's check L11:
"बुध के रवि छोड़कर सब ग्रह, बृहस्पति के मङ्गल छोड़कर सब ग्रह, शुक्र के रवि"
In "मङ्गल छोड़कर":
Wait, in "छोड़कर": look at L11: "छोड़रुर" or "छोड़कुर" or "छोड़कर"?
Let's zoom in on L11:
"बृहस्पति के मङ्गल छोड़कुर सब ग्रह" -> wait, is that "छोड़कर" or "छोड़कुर"?
Look at the 'क': it has a small loop, wait, no, it's 'छोड़कर', the 'क' has a loop that might look slightly broken or smudged, let's check:
"मङ्गल छोड़कर सब ग्रह" - looks like 'छोड़कर'.
Everything looks very consistent and clear.वि०—ग्रन्थकारने अपने देश के अभिप्राय से यह वर्णमैत्री कहा है—अन्य
देशों में—'द्विजा झषालिकर्कटाः' इत्यादि राशियों के वर्णमैत्री देखना चाहिये १६
अथ यवनजातकोक्तग्रहमैत्रीं कथयति—
सुरगुरुर्ज्ञगुरू कविकोविदौ विरवयो विकुजा विरवीन्दवः ।
अशशिसूर्यकुजाः सुहृदो रवेर्यवनयुक्तिरियं न यवीयसी ॥१७॥
सं०—सुरगुरुः, ज्ञ-गुरू, कविकोविदौ, विरवयः, विकुजाः, विरवी-
न्दवः, अशशिसूर्यकुजाः, इति रवेः ( रविमारभ्य ) क्रमेण सप्तग्रहाणां
सुहृदः ( मित्राणि ) स्युः । मित्रतोऽन्ये शत्रव इत्यर्थादेव सिद्ध्यति । इयं
यवनयुक्तिः न यवीयसी ( न लघुतरा ), अपि तु गरीयस्येव ॥१७॥
भा०—सूर्य के बृहस्पति, चन्द्रमा के बुध, बृहस्पति, मङ्गल के बुध, शुक्र,
बुध के रवि छोड़कर सब ग्रह, बृहस्पति के मङ्गल छोड़कर सब ग्रह, शुक्र के रवि
चन्द्र को छोड़कर शेष सब ग्रह, तथा शनि के चन्द्र रवि मङ्गल छोड़कर शेष तीन
ग्रह मित्र हैं। अर्थात् मित्र से अन्य ग्रह शत्रु हैं। यह यवनाचार्य की युक्ति छोटी
( अमान्य ) नहीं है, अर्थात् माननीय है ॥१७॥
यवनयुक्तिः कथं न यवीयसीत्याह—
इदमुदीर्य वराहविरोचनो निजमतेऽपि न दूषितवान्पुनः ।
स बहु मन्यत एव यथातथं जयति शास्त्रमिदं यवनेष्वपि ॥१८॥
सं०—वराहविरोचनः ( वराहमिहिरः ) अपि इदं ( उपरोक्तं ग्रह-
मैत्रं ) निजमते ( बृहज्जातके ) उदीर्य ( उक्त्वा ) पुनर्न दूषितवान् ।
यवनेष्वपि इदं शास्त्रं यथातथं बहु अतिशयं जयतीति-स ( वराहमिहिरः )
मन्यत एव ( स्वीकारोत्येवेति ) ॥१८॥
भा०—वराहमिहिरार्य ने भी उपरोक्त यवनोक्त ग्रह-मैत्री अपने बृहज्जातक में
में कहकर फिर उसे दूषित नहीं किया । क्योंकि—'यवनों में भी यह शास्त्र यथार्थ
रूप से वर्तमान है' इस प्रकार वराह मिहिर भी मानते ही हैं ॥१८॥
यवनमतं कथं मन्यते इत्याह—
परमतं स्वमते विनिवेशितं यदि न दूषितमादृतमेव तत् ।
कलितकेवलसत्यमतः स तद्यवनयुक्तिषु नूनमनिस्पृहः ॥१९॥
सं०—यदि स्वमते विनिवेशितं परमतं न दूषितं तदा तत् ( परमतं )