विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ३ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । २३
(दैत्यगणे) ज्ञेयम् । परिणये विवाहे दनुजमनुजानां दैत्यनराणां मृत्युः ।
निर्ऋतितनयानां (राक्षसानां) अनिमिषैः (देवैः) सह स्वैरं (स्वाभा-
विकं) वैरं स्यात् । अर्थात् देवमनुजयोः, स्वस्वगणेच मित्रत्वं स्यात् ॥९॥
भा०—रोहिणी, पूर्वफाल्गुनी, उत्तरफाल्गुनी, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, पूर्वभा०,
उ०भा०, आर्द्रा, भरणी ये ९ नक्षत्र मनुष्यगण, श्रवण, स्वाती, अनुराधा, पुनर्वसु,
पुष्य, हस्त, रेवती, अश्विनी, मृगशिरा ये ९ नक्षत्र देवगण, और शेष—कृत्तिका,
आश्लेषा, मघा, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, मूल, धनिष्ठा, शतभिषा ये ६ नक्षत्र
दैत्यगण हैं। दैत्यमनुष्यगणों में मरण, देव और दैत्य के साथ विवाह में
स्वाभाविक शत्रुता होती है । अर्थात् अपने अपने गण में और देव मनुष्य में
मैत्री होती है ॥ ९ ॥
अथ राशिवैरं वश्यावश्यं चाह—
चापाजौ वृषभेण कुम्भमिथुनौ कर्केण मेषः स्त्रिया
शैलाग्नी सविषेण कार्मुकहरी नक्रेण नित्यद्विषौ ।
तद्वत् कुम्भतुले झषेण, वशगा सिंहं विनाऽन्ये नृणां
तद्भोज्या जलचारिणो हरिवशाः सर्वे विना वृश्चिकम् ॥१०॥
सं०—चापाजौ (धनुर्मेषौ) वृषभेण, कुम्भमिथुनौ कर्केण, मेषः
स्त्रिया कन्यया, शैलाग्नी (तुलमिथुनौ) सविषेण (वृश्चिकेन), कार्मुकहरी
(धनुःसिंहौ) नक्रेण (मकरेण सह) नित्यद्विषौ, तद्वत् कुम्भतुले झषेण
(मीनेन) नित्यद्विषौ ज्ञेयौ । अथ वश्यमैत्रीं कथयति—सिंहं विनाऽन्ये सर्वे
राशयो नृणां द्विपदानां वशगाः, जलचारिनः (जलचरराशयः) तद्भोज्याः
(तेषां नृराशीनां भक्ष्याः) तथा वृश्चिकं विना सर्वे राशयः हरिवशाः
(सिंहस्य वश्याः) भवन्ति ॥ १० ॥
भा०—धनु, मेष को वृष से, कुम्भमिथुन को कर्क से, मेष को कन्या से,
तुला मिथुन को वृश्चिक से, धनुर्सिंह को मकर से और कुम्भतुला को मीन से
स्वाभाविक शत्रुता है । वश्य कहते हैं—सिंह को छोड़ कर सब राशि द्विपद के
वश में हैं, और जलचर राशि द्विपद राशि का भक्ष्य है । और वृश्चिक को छोड़कर
सब राशि सिंह के वश्य हैं ॥ १० ॥
वि०—इससे परस्पर द्विर्द्वादश, और षट्काष्टक में शत्रुता तथा अन्य
(समसप्तक, चतुर्थदशम, तृतीयेकादश) में परस्पर मित्रता सिद्ध हुई ॥ १० ॥