विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ३ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । २५
सं०—स्वामिनि अपश्यति तद्वधः ( तयोः सेनानरयोर्वधः ) चेत् ।
तर्हि गृहेश्वराणां ( राशिस्वामिनां = खगानां ) किं अदृष्टम् ? न किमपि,
अर्थात् सर्वं दृष्टमेव । अतः प्रभुसख्यमेवाधिकम् । एवं चेत् तदा समसप्त-
कस्य का गतिः ? इत्युच्यताम् ॥ १३ ॥
भा०—यदि ऐसा कहा जाय कि—स्वामी के परोक्ष में ही सेना में विरोध
होने से वध होता है, स्वामी के समक्ष में नहीं ? तो फिर राशीश्वरों ( ग्रहों ) के
कौन स्थान अदृश्य हैं ? अर्थात् वे सब को देखते हैं । इसलिये स्वामियों की मैत्री
ही विशेष है । यदि स्वामी की मैत्री ही विशेष है तो फिर समसप्तक ( कुम्भ
सिंह आदि ) राशियों की ग्राह्यता की क्या गति होगी ? ॥ १३ ॥
अथात्र सिद्धान्तं कथयति—
स्वभावमैत्री सखिता स्वपत्योर्वशित्वमन्योन्यभयोनिशुद्धिः ।
परः परः पूर्वगमे गवेष्यो हस्ते त्रिवर्गी युगपद्युतिश्चेत् ॥१४॥
सं०—'राश्योः' स्वभावमैत्री १, स्वपत्योः सखिता २, वशित्वम् ३,
अन्योन्यभयोनिशुद्धिः ४, 'एषु चतुर्षु पदार्थेषु' पूर्वगमे पूर्वाभावे परः परो
गवेष्योऽन्वेषणीयः ( अर्थादादौ स्वभावमैत्री ( समसप्तकादिका ) गवेष्या,
तदलाभे स्वपत्योः सखिता ( मैत्री ), तदभावे राश्योर्वशित्वम्, तदलाभे
भयोनिशुद्धिर्गवेष्या । चेत् युगपद्युतिः ( चतुर्णां प्राप्तिः ) तदा हस्ते
त्रिवर्गी ( त्रयाणां 'धर्मार्थकामानां' वर्गाणां समाहारस्त्रिवर्गी ) स्यात् ॥
भा०—राशियों की स्वभावमैत्री १, स्वामियों की मैत्री २, वशित्व ३,
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