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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

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पृष्ठ 37

२४ विवाहवृन्दावनम्- [मेलक-
राशिमैत्रग्रहमैत्रयोरन्यतरलाभेऽपि शुभत्वं कथयति-
स्याद्राशिमैत्रीधुरि कुम्भहर्योः करग्रहस्तद्ग्रहविग्रहेऽपि ।
तस्यामसत्यां मृगराजमीनावप्याहृतौ तद्ग्रहयोः सुहृत्त्वे ॥११॥
सं०-कुम्भहर्योः (कुम्भसिंहयोः समसप्तकत्वात्) राशिमैत्रीधुरि
(राशिमैत्र्यां सत्यां) तद्ग्रहविग्रहे (तयोः स्वामिनोः शत्रुत्वे) अपि
करग्रहः स्यात् । तथा तस्यां (राशिमैत्र्यां) असत्यां अपि तद्ग्रहयोः
(तत्स्वामिनोः) सुहृत्त्वे मृगराजमीनौ आहृतौ षट्काष्टकत्वेऽपि स्वामि-
सुहृत्त्वात् सिंहमीनौ स्वीकृतवित्यर्थः ॥११॥
भा०-कुम्भ सिंह में राशि मैत्री होने के कारण उनके स्वामियों (शनि,
सूर्य) में शत्रुता रहने पर भी विवाह शुभ कहा गया है । तथा-सिंह और मीन
में राशि मैत्री नहीं होने पर भी उनके स्वामियों (सूर्य गुरु) में मैत्री होने के
कारण विवाह में सिंह और मीन स्वीकृत है । अर्थात् राशि मैत्री स्वामिमैत्री
दोनों में एक भी हो तो विवाह शुभ है यदि दोनों हो तो बात ही क्या है ॥११॥
अथात्र प्रश्नं तदुत्तरं च कथयति-
पत्योर्विरोधे सति भृत्ययोः स्यान्मेलेप्यमेलस्तदलं भमैत्र्या ।
अत्रोच्यते किं न मिथो वधः स्यादेकस्य सेनानरयोर्विरोधात् १२
सं०-पत्योः (स्वामिनोः) विरोधे सति, भृत्ययोः मेलेऽपि अमेलः
स्यात्, तत् तस्मात् भमैत्र्या अलं (न प्रयोजनम्) । अत्र (अस्मिन्
प्रश्ने) उच्यते-एकस्य सेनानरयोः (सैन्यपुरुषयोः) मिथो विरोधात् किं
वधो न स्यात् ? अपि तु वधः स्यादेवातो राशिमैत्रमेव प्रधानम् ॥१२॥
भा०-स्वामियों में विरोध रहने पर नौकरों में यदि मेल भी हो तो वह
अमेल (विरोध) ही समझा जाता है । इसलिये राशिमैत्री व्यर्थ ही है, इस
प्रकार के प्रश्न में उत्तर यह है कि-एक ही राजा की सेनाओं में परस्पर विरोध
होने पर क्या वध नहीं होता है ?, अर्थात् अवश्य हो जाता है । अतः राशिमैत्री
ही में प्रधानता सिद्ध हुई ॥ १२ ॥
अत्र पुनः प्रत्युत्तरं कथयति-
अपश्यति स्वामिनि तद्वधश्चेद् गृहेश्वराणां किमदृष्टमस्ति ।
अतोऽधिकं चेत्प्रभुसख्यमेक ततो गतिः का समसप्तकस्य ॥१३॥