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विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

८ विवाहवृन्दावनम् । [ नक्षत्रशुद्धि-

अथैकार्गलादोषमाह—
विद्धा त्रयोदशभिरूर्ध्वगतैकरेखा
खार्जूरिकं तदिह शीर्षभतो भचक्रे ।
न्यस्ते सहाभिजिति तारकराजभान्वो-
स्तुल्यर्क्षगम्यगतयोर्नयनार्गलेयम् ॥१४॥

**सं०—**ऊर्ध्वगतैकरेखा त्रयोदशभिः 'तिर्यग्रेखाभिः' विद्धा सती खार्जूरिकं 'चक्रं' भवति । तदिहास्मिन् चक्रे शीर्षभतः ( वक्ष्यमाणशीर्षनक्षत्रात् ) सहाभिजिति ( अभिजित्सहिते ) भचक्रे न्यस्ते सति तुल्यर्क्षगम्यगतयोः तारकराज-भान्वोः ( सूर्यचन्द्रयोः ) एकरेखास्थयोरियं नयनार्गला ( एकार्गलाख्योदोषो ) भवति । रविचन्द्रयोर्मध्ये एकस्य नक्षत्रं यावद्गतं तावदेवान्यस्य गम्यं चेत्तदैवायं दोष इत्यनेनात्र पादवेधः सूचितः ।

**भा०—**एक ऊर्ध्वाधर रेखा को १३ तिरछी रेखा से वेध करने पर खार्जूर नामक चक्र होता है। इस चक्र में आगे कहे हुए शीर्ष नक्षत्र से आरम्भ कर अभिजित् सहित २८ नक्षत्रों का न्यास करने पर यदि सूर्य और चन्द्रमा एक रेखा में पड़ें तथा एक के नक्षत्र का गत और दूसरे का गम्य तुल्य हो तो 'यह नयनार्गला ( परस्पर दृष्टयर्गला अर्थात् एकार्गला ) नामक दोष होता है ॥१४॥

अथ शीर्षनक्षत्रज्ञानं तथैकार्गलाफलं चाह—
शीर्षभं भवति रूपसंयुता दुष्टयोगमितिरर्द्धिता सती ।
शेषिणी यदि च सार्द्धविश्वयुङ्मङ्गलङ्गलति सार्गले विधौ ॥१५॥

सं —"इयमर्गला व्याघातादिदुष्टयोगे सति ज्ञेयेति, दुष्टे योगे सति"—सा दुष्टयोगमितिः ( विष्कम्भादिदुष्टयोगावधिसंख्या ) रूपसंयुता ( एकयुता ) अर्द्धिता सती शीर्षभं ( शीर्षनक्षत्रं ) भवति । यदि सार्द्धिता शेषिणी ( शेषसहिता ) भवेत्, तदा सार्धविश्वयुक् ( सार्धत्रयोदशसहिता सती ) शीर्षभं ज्ञेयम् । एवं विधौ चन्द्रे सार्गले सति मङ्गलं ( विवाहादिशुभकार्यं ) गलति ( नश्यति ) ॥१५॥

**भा०—**व्याघातादि दुष्टयोग की संख्या में १ जोड़ कर आधा करने से जो संख्या हो वही शीर्ष नक्षत्र होता है। यदि आधा करने से शेष युत संख्या हो तो उसमें १३॥ साढ़े तेरह जोड़ने से शीर्ष नक्षत्र होता है। इस प्रकार चन्द्रमा अर्गलायुक्त हो तो विवाहादि मङ्गल कार्य का नाश होता है ॥१५॥

प्रकरणम् १ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ६
वि०— व्याघात आदि दुष्टयोग में जब सूर्य नक्षत्र से अभिजित् सहित गणना
करने से चन्द्रमा विषम नक्षत्र में पड़े तभी यह योग होता है । सम संख्य नक्षत्र
में पड़ने से नहीं होता है । इसलिये रामाचार्य ने मुहूर्तचिन्तामणि में सरल
प्रकार कहा है यथा—
व्याघात-गण्ड-व्यतिपातपूर्वे शूलाऽन्त्य-वज्रे परिघाऽतिगण्डे ।
योगे विरुद्धे त्वभिजित्समेतः खाजूरमर्काद् विषमे शशी चेत् ॥
उदाहरण—मानों व्याघात योग में रेवती में सूर्य और चित्रा में चन्द्रमा है
तो सूर्य नक्षत्र रेवती से चन्द्र नक्षत्र चित्रा तक गिनने से विषम संख्या १५ हुई
अतएव एकार्गला दोष हुआ ।
अब इस ग्रन्थ के अनुसार व्याघात की संख्या १३ में १ जोड़कर आधा करने
स्पष्टार्थ चक्र — से ७ हुआ अतः अश्विनी से ७ वाँ पुनर्वसु शीर्ष
पु. नक्षत्र हुआ । अतः पुनर्वसु को चक्र के शीर्ष
आ ─────┬───── पु. (मस्तक) पर लिखकर क्रम से अभिजित् समेत
मृ ─────┼───── श्ले २८ नक्षत्रों को न्यास करने से एक रेखा में
रो ─────┼───── म सूर्य और चन्द्रमा पड़े अतः एकार्गल दोष हुआ ।
कृ ─────┼───── पू. तथा दुष्टयोग गण्ड की संख्या १० में १
भ ─────┼───── उ. जोड़ कर आधा करने से शेष सहित (अर्थात् ५॥
अ ─────┼───── ह साढ़े पाँच) हुआ अतः इसमें साढ़े तेरह १३॥
सूर्य० रे ──┼── चि चन्द्र. जोड़ने से १९ वाँ मूल शीर्ष नक्षत्र हुआ ।
उ ─────┼───── स्वा इस प्रकार चक्र न्यास करने पर एक रेखा में
पू ─────┼───── वि. सूर्य और चन्द्रमा पड़े तो एकार्गल दोष होता
श ─────┼───── अनु है । उसमें भी यदि एक प्रथम चरण में और
ध ─────┼───── ज्ये अन्य चतुर्थ चरण में हो, अथवा एक द्वितीय
श्र ─────┼───── मू में और अन्य तृतीय में हो तो विशेष दोष
अ ─────┴───── पू समझना ॥ १५ ॥
उ.
अथार्गलायामन्याचार्यमतं कथयति—
त्यक्त्वा गतैष्यस्य परे तु हेतुमुज्झन्ति नक्षत्रमशेषमेव ।
एकार्गलस्यैव हि सा च भङ्गी सन्ध्यागतं यद्गलहस्तयन्ति ॥१६॥
सं०—परे श्रीपत्याद्याचार्यास्तु गतैष्यस्य हेतुं त्यक्त्वा अशेषं (समस्तं)
एव नक्षत्रं उज्झन्ति (त्यजन्ति) हि (यस्मात्) ते सन्ध्यागतं (सन्ध्यो-
२

१० विवाहवृन्दावनम्- [ नक्षत्रशुद्धि-
दितं सूर्याच्चतुर्दशं) नक्षत्रं यद् (यद्वत्) समस्तमेव गलहस्तयन्ति (त्यजन्ति)
सैव एकार्गलस्यापि भङ्गी रचनायुक्तिः । यद्वत् सन्ध्योदितं सूर्येण चरण-
विद्धमपि समस्तमेव नक्षत्रं त्यजन्ति तद्वदेवैकार्गलगतमपि समस्तमेव
त्यजन्तीत्यर्थः ॥१६॥
भा०-श्रीपति आदि अन्याचार्य गतगम्य के हेतु (पादवेध) को छोड़कर
समस्त नक्षत्रको ही त्याज्य कहे हैं। क्योंकि वे सन्ध्योदित (अर्थात् सूर्यसे १४
वाँ) चन्द्रनक्षत्रको त्याज्य कहे हैं वही युक्ति एकार्गल विद्ध नक्षत्रके त्याज्यमें
भी है ॥ १६ ॥
अथ कैश्चित् क्रूरात् षड्भान्तरितनक्षत्रं दूषितं, तच्च चान्द्रजामित्रपरि-
णतमेवेत्याह-
क्रूरस्य भार्धान्तरमृक्षमेवमनिष्टमित्येष विशेषवादः ।
पापाच्चतुःपञ्चलवेषु चान्द्रं जामित्रमस्मात् खलु पर्यणंंसीत् ॥१७॥
सं०-एवं क्रूरस्य पापग्रहस्य भार्धान्तरं ( षड्भान्तरितं ) ऋक्षं
( नक्षत्रं ) अनिष्टमित्येष केषाञ्चिदाचार्याणां विशेषवादः स्यात् । स तु
अस्मात् पापात चतुःपञ्चलवेषु ( चतुःपञ्चाशन्नवमांशेषु ) चान्द्रं ( चन्द्र-
सम्बन्धि ) जामित्रमेव पर्यणंंसीत् 'चन्द्रजामित्रेणैव परिणत इत्यर्थः ॥१७॥
भा०-पापग्रह से ६ राशि अन्तरपर जो नक्षत्र हो वह अनिष्ट है । इस प्रकार
कितने आचार्यों की विशेषोक्ति है । परन्तु वह तो पापग्रह से ५४ वाँ नवांश पर
स्थित चन्द्रमा के जामित्र ही होता है । अर्थात् ६ राशिपर पापग्रह पड़ता है तो
चन्द्रजामित्र होता है, तथा ६ राशि में ५४ नवांश होते हैं इसलिये उक्त
विशेषोक्ति चन्द्रजामित्र में ही आ गया ॥ १७ ॥
अथ कैश्चित् पादवेधे युक्तिरुक्ता तां दूषयति -
क्षतादृते दिग्धशरार्दितस्य शस्तं मृगस्यामिषमेवमन्ये ।
क्रूराङ्घ्रिवेधाय पदं वदन्ति तेनैव तेषां निजपक्षहानिः ॥१८॥
विश्लेषमायाति यथासुभिः स्वैरेणः शरेणैकदिशि क्षतोपि ।
तथाङ्घ्रिवेधादपि तारकाणां क्रूरस्य नश्येद्बलरूपसम्पत् ॥१९॥
सं०-यथा-दिग्धशरेण ( विषाक्तबाणेन ) अर्दितस्य मृगस्य
आमिषं ( मांसं ) क्षतात् ऋते ( क्षतं विनाऽन्यत ) शस्तं, एवं अन्ये

प्रकरणम् १ ] वसन्तलक्ष्मीसाहतम् । ११

आचार्याः क्रूराङ्घ्रिवेधाय पदं ( दृष्टान्तं ) वदन्ति, परञ्च तेनैव 'दृष्टान्तेन'
तेषां निजपक्षहानिः स्यात् । तां हानिं दर्शयति—यथा शरेण एकदि-
श्यपि ( एकस्मिन्नङ्गविभागेऽपि ) क्षतः ( विद्धः ) एणः ( मृगः ) स्वैः
असुभिः (सर्वप्राणैः) विश्लेषं (वियोगं) आयाति 'मृत्युं प्राप्नोतीत्यर्थः, तथैव
क्रूरस्य ( पापग्रहस्य ) अङ्घ्रिवेधात् तारकाणां ( नक्षत्राणां ) अपि बल-
रूपसम्पत् नश्येत् । अतएव पापविद्धं शमस्तमेव नक्षत्रं त्यजेदिति भावः ॥
भा०—जैसे विषयुक्त शर से मारे हुए हरिण के क्षत स्थल को छोड़ कर
अन्य समस्त अङ्गों का मांस प्रशस्त माना जाता है इसी दृष्टान्त से दूसरे आचार्यों
ने पापग्रह के पाद वेध मात्र को त्याज्य कहा समस्त नक्षत्र को नहीं । परञ्च
उसी दृष्टान्त से उन आचार्यों के अपने पक्ष की ही हानि हुई — क्योंकि—जैसे
किसी एक अङ्ग में भी शर से विद्ध होने पर हरिण समस्त शरीरस्थ प्राणों से
विमुक्त हो जाता है, उसी प्रकार पापग्रह से चरण वेध होने पर भी समस्त
नक्षत्रों का बलरूप सम्पत्ति नष्ट हो जाती है । इसलिये पापविद्ध समस्त नक्षत्र
को ही त्याग देना चाहिये यह ग्रन्थकार का अभिप्राय है । कहा भी है—"अशुभ
विद्धमशेषमुडु त्यजेत्” ॥१८-१९॥
अथ चण्डायुधदोषमाह—
यदन्तगं हर्षणसाध्यशूलगण्डव्यतीपातकवैधृतीनाम् ।
तत्रैव चन्द्रोडुनि चण्डमैशमस्त्रं पतेन्मङ्गलभङ्गलक्ष्म ॥२०॥
सं०—हर्षण-साध्य-शूल-गण्ड-व्यतीपातक-वैधृतीनां अन्तगं यन्नक्षत्रं
तत्रैव ( तस्मिन्नेव ) नक्षत्रे ऐशं ( ईशसम्बन्धि ) चण्डमस्त्रं पतेत्, तत्
मङ्गलभङ्गलक्ष्म ( मङ्गलस्य शुभस्य भङ्गकारकं ) ज्ञेयम् ॥२०॥
भा०—हर्षण, साध्य, शूल, गण्ड, व्यतीपात और वैधृति इन ६ योगों के
अन्त में जो नक्षत्र रहता है उस नक्षत्र पर शङ्कर का चण्ड आयुध पतित होता है,
वह मङ्गल कार्य का भङ्गकारक होता है ॥२०॥
अथ दुष्टयोगानां वर्ज्यघाटकाः, ग्रहणदुष्टसमयं चाह —
गं-शू-वि-व-व्याऽतिषु षट्शरत्रित्रिनन्दषट्का घटिकाः क्रमेण ।
द्व्यंशं त्यजेत्पारिघमिन्दुभान्वोः पर्वएयतीते दिनसप्तकं च ॥२१॥
सं०—गं-शू-वि-व-व्याऽतिषु ( गण्ड-शूल-विष्कम्भ-वज्र-व्याघाता-
ऽतिगण्डेषु ) क्रमेण षट्-शर-त्रि-त्रि-नन्द-षट्का घटिकाः त्यजेत् । पारिघं

१२ विवाहवृन्दावनम्- [ नक्षत्रशुद्धि-
(परिघस्येदं पारिघं ) द्वयंशं ( अर्धं ) त्यजेत् । तथा—इन्दुभान्वोः
पर्वणि ( ग्रहणे ) अतीते ( गते ) सति दिनसप्तकं च त्यजेत् ॥२१॥
भा०—गण्ड में ६, शूल में ५, विष्कम्भ में ३, वज्र में ३, व्याघात में ९,
और अतिगण्ड में ६ घटी आरम्भ से त्याज्य है। तथा परिघयोग का पूर्वार्ध
त्याज्य है। एवं सूर्य चन्द्रमा के ग्रहण के बाद ७ दिन सब शुभ कार्यों में
त्याज्य है ॥ २१ ॥
अथ ग्रहभेदादिगतनक्षत्रदोषं कथयति-
यस्मिन्नृक्षे वीक्ष्यते सैंहिकेयो भेदस्ताराखेटयोर्यत्र वा स्यात् ।
आषण्मासन्तत्र लग्नेन्दुभाजि भ्राजिष्णु स्यान्नो शुभंकर्म किञ्चित् ॥
सं०- यस्मिन् ऋक्षे सैंहिकेयो राहुः वीक्ष्यते दृश्यते ( ग्रहणं भवती-
त्यर्थः ) यत्र वा ताराखेटयोः ( मङ्गलादिकयोर्द्वयोर्ग्रहयोः ) भेदः ( योगः )
तत्र नक्षत्रे लग्नेन्दुभाजि ( लग्नस्थे, चन्द्राक्रान्ते वा ) आषण्मासं षण्-
मासपर्यन्तं किञ्चित् शुभं कर्म भ्राजिष्णु ( शोभनं ) न स्यात् ॥२२॥
भा०—जिस नक्षत्र में राहु देख पड़े ( अर्थात् ग्रहण हो ) और जिस नक्षत्र
में मंगलादि ५ ग्रहों में किसी दो का भेद योग हो उस नक्षत्र में स्थित चन्द्रमा,
और लग्न को ६ मास पर्यन्त त्याग देना चाहिये क्योंकि उस नक्षत्र में शुभकर्म
अच्छा नहीं होता है ॥ २२ ॥
पापमुक्तनक्षत्रस्य शुद्धिं पातदोषं चाह-
उत्पातपापग्रहमुक्तमृक्षं यदीन्दुराक्रम्य पुनर्भुनक्ति ।
तदा तदर्हं सकलेषु कर्मसु त्यजेत्समक्रान्तितनू रवीन्द्वोः ॥२३॥
सं०-उत्पातपापग्रहमुक्तं ( त्रिविधोत्पातेन, पापग्रहेण त्यक्तं ) ऋक्षं
( नक्षत्रं ) यदि इन्दुश्चन्द्र आक्रम्य पुनः ( द्वितीयवारं ) भुनक्ति तदा तत्
नक्षत्रं सकलेषु कर्मसु अर्हं योग्यं भवति । तथा रवीन्द्वोः समक्रान्तितनू
तुल्यक्रान्ती सकलेषु कर्मसु त्यजेत् ॥ २३ ॥
भा०-जिस नक्षत्र में उत्पात हुआ हो उसको और पापग्रह से त्यक्त
नक्षत्र को यदि चन्द्रमा दोबारा भोग करै तो वह नक्षत्र ६ मास के भीतर भी
सब शुभकार्य में शुभ होता है। तथा सूर्य और चन्द्रमा की तुल्य क्रान्ति को भी
शुभ कार्य में त्याग करना चाहिये ॥ २३ ॥

प्रकरणम् १ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । १३
क्रान्तिसाम्यसम्भवमाह—
त्रिभागशेषे ध्रुवनाम्नि चैन्द्रे त्र्यंशे गते सम्प्रति सम्भवोऽस्य ।
मानार्धयोगाधिकमिन्दुभान्वोः क्रान्त्यन्तरं चेन्न तदैष दोषः ॥२४॥
सं०—ध्रुवनाम्नि योगे त्रिभागशेषे सति, ऐन्द्रे योगे च त्र्यंशे गते
सति सम्प्रत्यास्मिन् समये अस्य ( क्रान्तिसाम्यस्य ) सम्भवः स्यात् ।
इन्दुभान्वोः क्रान्त्यन्तरं मानार्धयोगाधिकं चेत् तदा एष दोषो न
स्यात् । चन्द्रार्कयोर्बिम्बयोगाधार्दल्पे क्रान्त्यन्तरे सति दोष इत्यर्थः ॥२४॥
भा०—ध्रुव योग के तृतीयांश अवशेष रहने पर और ऐन्द्रयोग के तृतीयांश
बीतने पर क्रान्तिसाम्य का सम्भव होता है । अर्थात् वहाँ क्रान्ति बनाकर देखना
यदि रवि चन्द्रमा के बिम्बयोगाधं से क्रान्ति का अन्तर अधिक हो तो दोष नहीं
होता है । अर्थात् बिम्बयोगाधं से अल्प अन्तर हो तो दोष समझना चाहिये ॥२४॥
वि०—ग्रन्थारम्भ समय में १२ के लगभग अयनांश ( क्रान्तिपात ) था
अतः ध्रुवयोग में क्रान्तिसाम्य व्यतीपात नामक, तथा ऐन्द्रयोग में क्रान्तिसाम्य
वैधृत नामक होता है । इष्ट समय में अयनांश संस्कार से जो योग आवे उसमें
क्रान्तिसाम्य का सम्भव देखना चाहिये । यथा—केशवोक्त संस्कार—
“त्रिघ्नाऽयनांशा नखभाजितास्तद्धीनाश्च सार्धत्रिभुवोऽद्रिपृक्ताः ।
तत्तुल्ययुत्योर्गतयोर्विलोक्यौ पातौ व्यतीपातक-वैधृताख्यौ ॥”
अर्थ—अयनांश को ३ से गुना कर २० के भाग देने से जो लब्धि हो उसको
साढ़े तेरह (१३॥) में घटाने से जो संख्या हो उतने विष्कम्भादि योग में व्यतीपात
नामक, तथा उसी लब्धि को २७ में घटाने से जो संख्या हो विष्कम्भादि
उस योग में वैधृतनामक क्रान्तिसाम्य दोष होता है ।
उदा०—अयनांश २१ । ३० । ३२ को ३ से गुना कर ६४ । ३१ । ३६
इसमें २० का भाग देने से ३ । १३ इसको साढ़े तेरह ( १३ । ३० ) में घटाने
से ( १० । १७ ) ग्यारहवाँ ( वृद्धि ) योग की १७ घटी बीतने पर क्रान्तिसाम्य
का सम्भव हो सकता है । तथा २७ में उसी लब्धि ३।१३ को घटाने से २३।४७
बचे, अर्थात् चौबीसवाँ शुक्लयोग की ४७ घटी पर क्रान्तिसाम्य का सम्भव होगा ॥
अथ नक्षत्रशुद्धिप्रशंसामाह—
स्फुरददूषणभूषणकान्तयो यदि भवन्ति मृगाङ्कमृगीदृशः ।
करमवाप्य वरः सुतनोस्तदा शुभरसं भरसम्भृतमश्नुते ॥२५॥

सं०—यदि मृगाङ्कमृगीदृशः ( मृगाङ्कस्य चन्द्रस्य मृगीदृशः = स्त्रि-
यस्ताराः = नक्षत्राणीत्यर्थः ) स्फुरद्दूषणभूषणकान्तयः ( अस्तादिदोष-
रहिताः ) भवन्ति तदा सुतनोः ( कुमार्याः ) करं अवाप्य पाणिग्रहं कृत्वा
वरः भरसंभृतं ( अतिशयं ) शुभरसं (सुखभोगं) अश्नुते लभते इत्यर्थः ॥
भा०—जो नक्षत्र वेधादि दोष रहित देदीप्यमान कान्तियुत हों उनमें वधू
के पाणिग्रहण करने से वर अतिशय सुख का भोग करता है ॥ २५ ॥

अथ कालमीमांसाध्यायः ।
जन्मराश्योरेव मेलके युक्तिं कथयति—
जन्मलग्नमिदमङ्गमङ्गिनां मेनिरे मन इतीन्दुमन्दिरम् ।
सौहृदं हि मनसोर्न देहयोर्मेलकस्तदयमिन्दुगेहयोः ॥ १ ॥
सं०—देहिनां 'यत्' जन्मलग्नं इदं अङ्गं ( शरीरं ) तथा इन्दुमन्दिरं
( चन्द्रराशिः ) इति मनः मेनिरे । हि ( यतः ) सौहृदं ( मित्रत्वं ) मनसो-
रेव भवति, देहयोस्तु सौहृदं न भवति, तत् ( तस्मात् ) इन्दुगेहयोः
(वधूवरचन्द्रराश्योः) अयं मेलकः स्यात् । न तु जन्मलग्नयोरित्यर्थः ॥१॥
भा०—प्राणियों का जन्मलग्न शरीर, और चन्द्रराशि मन कहा गया है ।
मैत्री मन में ही होती है, शरीर में नहीं इसलिये वर कन्या की मनस्वरूप चन्द्र-
राशियों का ही मेलापक विचार उचित है ॥ १ ॥
यदि चन्द्रराश्योर्मेलकस्तर्हि सूक्ष्मयोस्तन्नवांशयो-
रपि कथं नेति दृष्टान्तेन कथयति—
चन्द्रराशिवशमेव सौहृदं सूक्ष्मयोरपि न किं नवांशयोः ।
एवमस्तु मकरांशगे रवौ कर्कटेऽपि किमु नोत्तरायणम् ॥ २ ॥
सं०—चन्द्रराशिवशं ( वधूवरयोर्जन्मराश्यनुसारं ) एव सौहृदं
'कथितं' तर्हि सूक्ष्मयोः तन्नवांशयोरपि कथं नेति, एवमस्तु ( एवं प्रश्न-
श्चेत् तदा ) मकरांशगे ( मकरनवांशस्थे ) रवौ ( सूर्ये ) कर्कटेऽपि
उत्तरायणं किमु न भवति ? । अयनादिकं यतो राशिवशादेव भवति
तस्माद्राश्योरेव मेलकोऽपि समुचित इत्यर्थः ॥ २ ॥

प्रकरणम् २] वसन्तरत्नमीसहितम् । १५
भा०- "यदि जन्मकालिक चन्द्रराशि ( जन्मराशि ) से ही मेलापक विचारा
जाता है तो उससे भी सूक्ष्म चन्द्रनवांश से क्यों नहीं किया जाय ?" यदि ऐसा
प्रश्न हो तो—जब कर्क राशि में मकर के नवांश (सप्तम नवांश ) में सूर्य
रहता है तब उत्तरायण क्यों नहीं होता है ? । अर्थात् जैसे अयन और गोल राशि
से ही होता उसी प्रकार मेलक विचार भी राशि ही से उचित है ॥ २ ॥
अयनादिकं राशिवशादेवेति सप्रमाणमाह—
मासषट्क्रमयनं च दक्षिणादित्य एति तदिति श्रुतिर्जगौ ।
मूलसंक्रमसमां विवस्वतः स्वस्वभङ्गिनमृतवोऽपि बिभ्रति ॥ ३ ॥
सं०-आदित्यः ( सूर्यः ) मासषट्कं दक्षिणा❄ (दक्षिणस्यां दिशि )
एति ( गच्छति ) तत् दक्षिणा 'अयनं' इति श्रुतिः (वेदः) जगौ कथयती-
त्यर्थः । तथा—ऋतवः (वसन्तादयः ) अपि विवस्वतः ( सूर्यस्य ) मूल-
संक्रमसमां स्वस्वभङ्गिं ( स्वस्वाकृतिं ) विभ्रति ( धारयन्ति ) अतो मूल-
राशिवशादेव घटितविचारः समुचित इत्यर्थः ॥ ३ ॥
भा०—सूर्य ६ मास (कर्क से धनु पर्यन्त) दक्षिण दिशा को चलते हैं
उसीको दक्षिणायन वेद ने भी कहा है। दूसरा प्रमाण यह है कि वसन्तादि ऋतु
भी सूर्य की राशि संक्रान्ति से ही अपनी अपनी भङ्गी ( चिह्न ) को धारण करती
है । नवांश से नहीं । अर्थात् सूर्य जब मीन में जाता है तभी वसन्त का चिह्न
( वृक्षादिकों में नव पल्लवादि होना ), दृश्य होता है, मीन के नवांश में जाने से
नहीं अतः राशिवश ही मेलकविधि समुचित है ॥ ३ ॥
पुनरन्यां युक्तिं कथयति-
किं दिनर्क्षविरहे करग्रहो नेष्यते तदुदयक्षणेष्वपि ।
स्थूलमेवमखिलं जगत्फलं तद्विशेषयति सूक्ष्मतागतिः ॥ ४ ॥
सं०-दिनर्क्षविरहे ( विवाहविहितदिवसनक्षत्रालाभे ) तदुदयक्षणेषु
( तन्नक्षत्रमुहूर्तेषु ) अपि करग्रहः (विवाहः ) किं नेष्यते ? एवं अखिलं
जगत्फलं स्थूलं, तत् ( स्थूलं फलं ) सूक्ष्मतागतिः विशेषयति, स्थूले सूक्ष्म-
तालाभश्चेत् तदा स्थूलफले विशेषतां प्रतिपादयतीत्यर्थः ॥ ४ ॥
भा०-विवाहविहित दिननक्षत्र नहीं प्राप्त होने पर विहित नक्षत्र के मुहूर्त
❄ "दक्षिणा" इत्यव्ययम् ।

१६ विवाहवृन्दावनम्- [ कालमीमांसा-

में क्या विवाह नहीं कहा है ? अवश्य कहा है । “धिष्ण्ये प्रोक्तं तस्य भस्योदये
वा” इत्यादि । परञ्च संसार का समस्त फल स्थूल है, उस स्थूल फल को सूक्ष्मता
विशेष करती है । अर्थात् स्थूल में सूक्ष्म का लाभ हो तो विशेष फल होता है ॥
यदि सूक्ष्मता स्थूलं विशेषयति तदा सूक्ष्मतेव किं
न ग्राह्या इत्यत्र हेतुं प्रतिपादयति-
अव्यवस्थितिरिति प्रतिवेलं तत्तदूहनविकल्पसमूहैः ।
स्थूलमप्यनुसरन्ति कृतीन्द्राः केवलं न रमणीयमणीयः ॥ ५ ॥
सं०-इति ( एवं सूक्ष्मताग्रहणे ) प्रतिवेलं ( प्रतिक्षणं ) तत्त-
दूहनविकल्पसमूहैः ( तत्तद्वेलाया ऊहनविकल्पास्तर्कवितर्ककल्पनास्तत्-
समूहैः) अव्यवस्थितिः स्यात् । अतः कृतीन्द्राः गर्गादयः स्थूलमप्यनुसरन्ति ।
केवलं अणीयः ( सूक्ष्मतरमेव ) न रमणीयं भवति ॥ ५ ॥
भा०-सूक्ष्मता के लिये प्रत्येक क्षण में तर्क वितर्क से तत्तत् समय के अनेक
कल्पनाओं से अव्यवस्थिति हो जायगी । इसलिये गर्गादि महर्षियों ने स्थूल का
भी अनुसरण किया केल सूक्ष्म अच्छा नहीं है ॥ ५ ॥
अथ सूक्ष्मफलस्य विशेषतां प्रतिपाद्य तद्ग्राह्यतां कथयति -
भिन्नभिन्नफलभाग्भुवि भूयानेकधिष्ण्यदिनजोऽपि जनोऽयम् ।
सूक्ष्मताऽपि ननु तेन गरिष्ठा सा च मूलमनुरुध्य विधेया ॥ ६ ॥
सं०-भुवि भूयान् ( बहुतरः ) अयं विद्यमानो जनः एकधिष्ण्य-
दिनजोऽपि ( एकनक्षत्रतिथ्युत्पन्नोऽपि ) भिन्नभिन्नफलभाग् 'दृश्यते'
तेन सूक्ष्मतापि गरिष्ठा ( गरीयसी ) किञ्च सा सूक्ष्मता मूलं ( स्थूल-
फलं ) अनुरुध्य 'एव' विधेया विचार्या ॥ ६ ॥
भा०-संसार में ऐसे बहुत लोग हैं जो एक नक्षत्र; एक तिथि
में उत्पन्न हुए भी भिन्न भिन्न फल के भागी हैं। इस लिये सूक्ष्मता भी विशेष
है। परञ्च वह सूक्ष्मता मूल (अर्थात् स्थूल) के अनुरोध से ही ग्रहण करना
चाहिये ॥ ६ ॥
अथ केवलसूक्ष्मताग्रहणेऽनवस्थां दर्शयति-
सूक्ष्मो नवांशाद् द्विरसांश एवं त्रिंशल्लवस्तल्लवतोऽपि सूक्ष्मः ।
ततोऽपि लिप्तेत्यवलिप्तवाचां दृगेतु कस्यां नियतौ समस्याम् ॥७॥

प्रकरणम् २ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । १७
सं०—‘राशितो नवांशः सूक्ष्म उक्तः’ । नवांशादपि द्विरशांशः ( द्वा-
दशांशः ) सूक्ष्मः, एवं तद्वतः ( द्वादशांशतः ) अपि त्रिंशल्लवः सूक्ष्मः,
ततोऽपि ( त्रिंशल्लवादपि ) लिप्ता ( षष्ट्यंशः ) इत्येवं अवलिप्तवाचां
जनानां दृक् ( दृष्टिः ) कस्यां नियतौ समस्यां ( समाधानं ) एतु गच्छतु
न कस्यामपीत्यर्थः, सूक्ष्मताया अवसानाभावात् ॥ ७ ॥
भा०—राशि से नवांश सूक्ष्म कहा गया है । सूक्ष्मता के विचार में नवांश
से भी द्वादशांश सूक्ष्म, द्वादशांश से भी त्रिंशांश, त्रिंशांश से षष्ठ्यंश, इत्यादि
विष्ठ्यंश, आदि सूक्ष्म विभाग मानने वालों की दृष्टि किस अवधि पर पहुँच
सकती है ? किसी पर भी नहीं, क्योंकि सूक्ष्मता का अवसान ही नहीं हैं।
अतः स्थूल का अवलम्बन अवश्य करना चाहिये ॥ ७ ॥
अथ सूक्ष्मताया दुर्गमत्वं कथयति—
अत्यन्तसूक्ष्मः स किलैकदेशो येनाखिलानां भिदुरा फलर्द्धिः ।
नास्मादृशां दृग्विषयः स तस्मान्मूलानुकूला व्यवहारसिद्धिः ॥८॥
सं०—स एकदेशः( कालविभागः ) अत्यन्तसूक्ष्मः स्यात्, येन
अखिलानां जनानां फलर्द्धिः ( फलसम्पत्तिः ) भिदुरा ( भिन्ना भिन्ना )
भवति । स ( अत्यन्तसूक्ष्मप्रदेशः ) अस्मादृशां जनानां दृग्विषयो दर्श-
नायोग्यो न स्यात् । तस्मात् ‘लोकानां’ व्यवहारसिद्धिः मूलानुकूला एवेति ।
भा०—काल का वह प्रदेश अत्यन्त सूक्ष्म है जिससे सब जन्तुओं के फल
भिन्न भिन्न देखने में आता है, उस सूक्ष्म प्रदेश को हम लोग इस चर्मचक्षु से
नहीं देख सकते हैं, इसलिये मूल ( स्थूल नक्षत्रादि ) के अनुकूल ही व्यवहार
की सिद्धि है ॥ ८ ॥
अथ सिद्धान्तमाह—
इति सति यदि मूले सूक्ष्मभावांशलब्धि-
स्तदखिलमपि सिद्धं नास्ति चेन्मूलसम्पत् ।
तदुभयलवनाशो दुर्गमत्वादणूनां
परिणतिरिति रूढा कालमीमांसया नः ॥ ६ ॥
सं०—इत्येवं सति मूले ( अनुकूले स्थूलराश्यादौ, ) यदि सूक्ष्म-
भावांशलब्धिः, तत् ( तदा ) अखिलमपि सिद्धं स्यात् । चेत् मूलसम्पत्
३

१८ विवाहवृन्दावनम्— [मेलक-
नास्ति तदा अणूनां सूक्ष्मभागानां दुर्गमत्वात् तदुभयलवनाशः स्यात् । इति
कालमीमांसया ( समयविवेकेन ) नः ( अस्माकं ) परिणतिः रूढा । अतो
राश्योरनुकूलत्वे एव नवांशानुकूलत्वं विचार्यमिति सिद्धम् ॥ ९ ॥
भा०—इस प्रकार मूल के अनुकूल रहने पर यदि सूक्ष्म भाग भी लब्ध हो
जाय तो सर्वथा सिद्ध है । और यदि मूल ( स्थूल = राशि, नक्षत्र ) ही नहीं
अनुकूल हो तब तो सूक्ष्म भाग के दुर्गम होने के कारण 'सूक्ष्म का भी लाभ न
होगा' तब दोनों ही नष्ट हो जायेंगे । काल की मीमांसा ( विचार ) से यही
परिणाम हुआ । अतः व्यवहार में स्थूल का ग्रहण करना ही सिद्ध हुआ ॥ ९ ॥
अथ मेलकाध्यायः ।
तत्रादौ सयुक्तिकं राशिमेलकमाह —
व्यये न वित्तं न तपस्यपत्यं नायुर्द्विषत्येव वधूवराणाम् ।
द्विद्वादशः पञ्चनवाष्टषष्ठो जन्मर्क्षयोः सख्यविधिर्न दृष्टः ॥ १ ॥
सं०—'प्राचीनैः' जन्मर्क्षयोः ( जन्मराश्योः ) द्विद्वादशः, पञ्च-
नवाष्टषष्ठः ( पञ्चमनवमः, अष्टषष्ठश्च ) सख्यविधिः ( सौहृदविधिः ) न
दृष्टः । तत्र हेतुं कथयति—यतः—व्यये ( अर्थस्यापगमे ) वित्तं ( धनं )
न भवति अतः व्यये ( द्वादशे ) वित्तं ( द्वितीयं भं ) न योज्यम् । तथा
तपसि ( ब्रह्मचर्यादिनियमे ) अपत्यं ( सन्ततिः ) न भवति, अतः तपसि
( नवमराशौ ) अपत्यं ( पञ्चमं भं ) न योज्यं, तथा च—द्विषति ( शत्रौ
सति ) आयुः ( जीवनं ) न, इत्यतः द्विषति ( षष्ठे ) आयुः ( अष्टमं भं )
न योजनीयमिति वरकन्ययोः सेव्यसेवकयोर्वा जन्मर्क्षयोः द्विद्वादशे निर्धनत्वं,
नवपञ्चमेऽनपत्यता, षट्काष्टके मरणमिति फलं स्फुटमुपपद्यते ॥ १ ॥
भा०—वर कन्या, वा सेव्य सेवककी जन्मराशियोंमें परस्पर द्वितीयद्वादश,
पञ्चमनवम, षष्ठअष्टम में मैत्रीविधान ( मेल ) नहीं कहा गया है । उसकी युक्ति
श्लोकके पूर्वार्धसे कहते हैं कि—व्ययमें ( खर्च होनेपर ) धन नहीं रहता है, और
तपस्या में (तपश्चर्याके नियममें रहनेपर) अपत्य ( सन्तान ) नहीं हो सकता तथा
शत्रुओंके बीच आयु ( जीवन ) नहीं रहता है । इसलिये व्यय ( द्वादश ) के साथ
धन ( द्वितीय राशि ) का और तप ( नवम ) के साथ अपत्य ( पञ्चमराशि ) का,
एवं द्विषत् ( षष्ठ ) के साथ आयु ( अष्टमराशि ) का मेल शुभ नहीं है ॥ १ ॥

) तदा निविडा
Wait, in line 18: "ऋक्षं ( नक्षत्रं )" or "नक्षत्रं"? It's "नक्षत्रं".

Line 19:
प्रीतिः ( अतिशयं प्रेम ) भवति । एकराशौ चेत् कृत्तिकारोहिणिवत्

Line 20:
'भिन्नमृक्षं' तदा नाडी न स्यात् ( नाडीदोषो न भवतीत्यर्थः ) यथाह
Single quotes around भिन्नमृक्षं?
Yes, 'भिन्नमृक्षं'.

Line 21:
भृगुः—"दम्पत्योरेकराशिश्चेत् पृथगृक्षं यदा भवेत् ।"
Double quotes around the quote?
Yes, "दम्पत्योरेकराशिश्चेत् पृथगृक्षं यदा भवेत् ।"

Line 22:
वशिष्ठोक्तो विवाहः स्याद् गणं नाडीं न चिन्तयेत् ॥ ३ ॥
Wait, does it have double quotes at the end?
No, the quote continues from भृगुः, but line 22 doesn't have a closing quote, or maybe line 21 had it closed at the end of the line: "भवेत् ।""?
Look at line 21: भृगुः—"दम्पत्योरेकरा

२० विवाहवृन्दावनम्- [ मेलक-
भा०—एक नक्षत्र एक राशि होने पर चरण भेद से परस्पर प्रीति होती है,
ऐसा पराशर मुनि ने कहा है। वशिष्ठ के शिष्य ने एक नक्षत्र के एक चरण में भी
सौमनस्य ( प्रीति ) कहा है, क्योंकि उनके मत से एक पिण्ड ( शरीर ) में
नाडीवेध नहीं होता है। इसका दृष्टान्त अग्रिम श्लोक में देते हैं ॥ ४ ॥
चरणैकत्वे दोषाभावे दृष्टान्तमाह—
नाग्निर्दहत्यात्मतनुं तथा हि द्रष्टा स्वदृष्टेर्न हि दर्शनीयः ।
एकांशकत्वेपि समप्रभावान्न भर्तृभार्याव्यवहारसिद्धिः ॥ ५ ॥
सं०—यथा हि अग्निः आत्मतनुं ( स्वशरीरं तेजोरूपं ) न दहति,
यथा च द्रष्टा स्वदृष्टेः दर्शनीयः ( दर्शनयोग्यः ) न भवति, तथा हि एकत्र
पिण्डे नाडिवेधोऽपि न भवितुमर्हतीति वशिष्ठशिष्यः प्राह । तत्र दोषं
कथयति—एवं एकांशकत्वे चरणैकत्वे समप्रभावात् ( तुल्याकारबलात् )
भर्तृभार्याव्यवहारसिद्धिरपि न स्यात् । यत उक्तं जातकेषु—"लग्ननवांश-
पतुल्यतनुः स्यात्" इत्यादि । अतश्चरणैकत्वे सौमनस्यं न भवितुमर्हती-
त्याचार्यस्याभिप्रायः ॥ ५ ॥
भा०—जैसे आग अपने शरीर को नहीं जलाती है, और देखने वाला जैसे
अपनी दृष्टि का दृश्य नहीं होता है, इसी प्रकार एक चरण होने पर एक नक्षत्र
में नाडीवेध का दोष नहीं हो सकता है, यह वशिष्ठ के शिष्य का दृष्टान्त है ।
इसमें आचार्य दोष देते हैं कि—एक चरण में तुल्य प्रभाव होने के कारण भर्त्ता
और भार्या का व्यवहार सिद्ध नहीं हो सकता है । अर्थात् स्त्री को पति के अधीन
होना चाहिये—एक नवांश में तुल्य सामर्थ्य होने से स्त्री अपने स्वामी के वश में
नहीं रह सकती है, अतः परस्पर प्रीति नहीं होने के कारण एक नक्षत्र के एक
चरण त्याज्य है ॥ ५ ॥
अथ त्रिनाडीवेधमाह—
रुद्रार्यमेन्द्रवरुणद्वयमश्विनी च विश्वाग्निवायुफणिनां युगमन्त्यभञ्च ।
शेषाणि चेति नवकत्रयमेकयाते जन्मोडुनी वरवधूनिधनाय नाडी ॥
सं०—रुद्रार्यमेन्द्रवरुण-द्वयं, अश्विनी चेति 'प्रथमनवकम्' । विश्वा-
ग्निवायुफणिनां युग्मं अन्त्यभं चेति 'द्वितीयनवकम्' । शेषाणि नक्षत्राणि
च 'तृतीयनवकम्' इत्येवं 'नक्षत्राणां' नवकत्रयं ज्ञेयम् । जन्मोडुनी

प्रकरणम् ३ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । २१

( कन्यावरयोर्जन्मनक्षत्रे ) एकयाते एकस्मिन् नवके प्राप्ते चेत् 'तदा'
वरवधूनिधनाय नाडी ( नाडीदोषो ) भवति ॥ ६ ॥
भा०—आर्द्रा पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी हस्त, ज्येष्ठा मूल, शतभिषा पूर्वभाद्रपदा
और अश्विनी यह एकनवक, तथा उत्तराषाढ़ श्रवण, कृत्तिका रोहिणी, स्वाती
विशाखा, आश्लेषा मघा और रेवती ये द्वितीयनवक, तथा शेषनक्षत्र ( भरणी,
मृगशिरा, पुष्य, पूर्वफाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़, धनिष्ठा और उत्तरभाद्रपद
यह तृतीयनवक इस प्रकार २७ नक्षत्रों में तीन नवक हैं, किसी एक नवक में
वर कन्या दोनों के जन्मनक्षत्र पड़ें तो मरणप्रद नाडीदोष होता है ॥ ६ ॥
कैश्चित् त्रिचरणद्विचरणनक्षत्रोत्पन्नकन्यायाः क्रमेण चतुर्नाडी-
पञ्चनाडीचक्रवेध उक्तः स न ग्राह्य इत्याह —
प्रमीयमाणोऽपि मतैर्मुनीनां त्रिद्व्यङ्घ्रिनक्षत्रभुवः कुमार्याः ।
नाडीचतुःपञ्चतयस्य पक्षो न क्षोदवीथीविषयत्वमेति ॥ ७ ।
सं० त्रिद्व्यङ्घ्रिनक्षत्रभुवः ( त्रिचरण-द्विचरणनक्षत्रोत्पन्नायाः )
कुमार्याः कन्यायाः 'क्रमेण' नाडीचतुःपञ्चतयस्य ( नाडीचतुष्टयस्य, नाडी-
पञ्चकस्य ) पक्षः मुनीनां ( हारीतादिमहर्षीणां ) मतैः प्रमीयमाणोऽपि,
( प्रमाणत्वं प्राप्तोऽपि ) क्षोदवीथीविषयत्वं ( विचारपद्धतिगोचरत्वं ) नैति
( नागच्छति ) । सर्वदेशेऽनुपयुक्तत्वात् । यथा ह वृद्धगर्गः—"जाङ्गले च
चतुर्माला पाञ्चाले पञ्चमालिका । त्रिमाला सर्वदेशेषु विवाहे ऋषिसम्मता ॥"
तथा च हारीतः—
त्र्यंघ्रिभे द्व्यंघ्रिभे वध्वा जाताया गणयेत् क्रमात् ।
वह्निभादिन्दुमान्नार्डीं चतुःपञ्चसु पर्वसु ॥" इति ॥ ७ ॥
भा०—'त्रिचरणनक्षत्रोत्पन्न कन्या का चतुर्नाडी चक्र में, और द्विचरण-
नक्षत्रोत्पन्न का पञ्चनाडी चक्र में वेध देखना चाहिये"—इस प्रकार कितने
आचार्यों का पक्ष मुनियों के मतों से प्रमाणित होने पर भी हमारे विचारपथ में
नहीं आता है ॥ ७ ॥
अथ योनिमैत्रीं कथयति—
अश्वेभाजोरगाहिःश्वखनकरिपवो मेष ओतुर्द्विराखु-
र्गोकान्त्यौ व्याघ्रकालीपशुरिपुहरिणैणाश्वकीशाः क्रमेण ।

" in "तुरगमृगपतिच्छाग".
Look at 'च' in line 27: it has a flat top, curved bottom, vertical stem. Yes, it looks like 'र्चे' or 'र्त्त्ये' or 'र्क्षे'!
Wait, look at 'र्दो' in L21:
It has a rounded back like 'द' or 'च'?
Wait, compare 'द' in 'मृगपतिच्छाग' (no 'द' there), compare 'द' in 'अदिति' (L22):
'द' in 'अदिति': rounded back, curl down.
In L21: it has a rounded back, curl down: 'र्दो'!
Wait, is there an anusvara on top? 'र्दो' or 'र्दों'? There's a dot above: 'र्दों' or maybe just ink smear?
Wait, look at L27 again:
" ) शिवमयमर्चे ( आर्द्रामरण्यौ ) "
Wait, look at "आर्द्रामरण्यौ":
Wait, is that "आर्द्रामरण्यौ" or "आर्द्राभरण्यौ"?
Look at the letter: it is 'भ'!
Wait, in "आर्द्राभरण्यौ", the third letter has the loop of 'भ', like 'भा' in 'भाद्रपद'.
Wait, is it 'भ' or 'म'?
Look at 'म' in 'शिवमयमर्चे': 'म'

द्वितीय खण्ड: अष्टकूट मिलान (वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह-मैत्री, गण, भकूट, नाड़ी)

प्रकरणम् ३ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । २३
(दैत्यगणे) ज्ञेयम् । परिणये विवाहे दनुजमनुजानां दैत्यनराणां मृत्युः ।
निर्ऋतितनयानां (राक्षसानां) अनिमिषैः (देवैः) सह स्वैरं (स्वाभा-
विकं) वैरं स्यात् । अर्थात् देवमनुजयोः, स्वस्वगणेच मित्रत्वं स्यात् ॥९॥
भा०—रोहिणी, पूर्वफाल्गुनी, उत्तरफाल्गुनी, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, पूर्वभा०,
उ०भा०, आर्द्रा, भरणी ये ९ नक्षत्र मनुष्यगण, श्रवण, स्वाती, अनुराधा, पुनर्वसु,
पुष्य, हस्त, रेवती, अश्विनी, मृगशिरा ये ९ नक्षत्र देवगण, और शेष—कृत्तिका,
आश्लेषा, मघा, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, मूल, धनिष्ठा, शतभिषा ये ६ नक्षत्र
दैत्यगण हैं। दैत्यमनुष्यगणों में मरण, देव और दैत्य के साथ विवाह में
स्वाभाविक शत्रुता होती है । अर्थात् अपने अपने गण में और देव मनुष्य में
मैत्री होती है ॥ ९ ॥
अथ राशिवैरं वश्यावश्यं चाह—
चापाजौ वृषभेण कुम्भमिथुनौ कर्केण मेषः स्त्रिया
शैलाग्नी सविषेण कार्मुकहरी नक्रेण नित्यद्विषौ ।
तद्वत् कुम्भतुले झषेण, वशगा सिंहं विनाऽन्ये नृणां
तद्भोज्या जलचारिणो हरिवशाः सर्वे विना वृश्चिकम् ॥१०॥
सं०—चापाजौ (धनुर्मेषौ) वृषभेण, कुम्भमिथुनौ कर्केण, मेषः
स्त्रिया कन्यया, शैलाग्नी (तुलमिथुनौ) सविषेण (वृश्चिकेन), कार्मुकहरी
(धनुःसिंहौ) नक्रेण (मकरेण सह) नित्यद्विषौ, तद्वत् कुम्भतुले झषेण
(मीनेन) नित्यद्विषौ ज्ञेयौ । अथ वश्यमैत्रीं कथयति—सिंहं विनाऽन्ये सर्वे
राशयो नृणां द्विपदानां वशगाः, जलचारिनः (जलचरराशयः) तद्भोज्याः
(तेषां नृराशीनां भक्ष्याः) तथा वृश्चिकं विना सर्वे राशयः हरिवशाः
(सिंहस्य वश्याः) भवन्ति ॥ १० ॥
भा०—धनु, मेष को वृष से, कुम्भमिथुन को कर्क से, मेष को कन्या से,
तुला मिथुन को वृश्चिक से, धनुर्सिंह को मकर से और कुम्भतुला को मीन से
स्वाभाविक शत्रुता है । वश्य कहते हैं—सिंह को छोड़ कर सब राशि द्विपद के
वश में हैं, और जलचर राशि द्विपद राशि का भक्ष्य है । और वृश्चिक को छोड़कर
सब राशि सिंह के वश्य हैं ॥ १० ॥
वि०—इससे परस्पर द्विर्द्वादश, और षट्काष्टक में शत्रुता तथा अन्य
(समसप्तक, चतुर्थदशम, तृतीयेकादश) में परस्पर मित्रता सिद्ध हुई ॥ १० ॥

२४ विवाहवृन्दावनम्- [मेलक-
राशिमैत्रग्रहमैत्रयोरन्यतरलाभेऽपि शुभत्वं कथयति-
स्याद्राशिमैत्रीधुरि कुम्भहर्योः करग्रहस्तद्ग्रहविग्रहेऽपि ।
तस्यामसत्यां मृगराजमीनावप्याहृतौ तद्ग्रहयोः सुहृत्त्वे ॥११॥
सं०-कुम्भहर्योः (कुम्भसिंहयोः समसप्तकत्वात्) राशिमैत्रीधुरि
(राशिमैत्र्यां सत्यां) तद्ग्रहविग्रहे (तयोः स्वामिनोः शत्रुत्वे) अपि
करग्रहः स्यात् । तथा तस्यां (राशिमैत्र्यां) असत्यां अपि तद्ग्रहयोः
(तत्स्वामिनोः) सुहृत्त्वे मृगराजमीनौ आहृतौ षट्काष्टकत्वेऽपि स्वामि-
सुहृत्त्वात् सिंहमीनौ स्वीकृतवित्यर्थः ॥११॥
भा०-कुम्भ सिंह में राशि मैत्री होने के कारण उनके स्वामियों (शनि,
सूर्य) में शत्रुता रहने पर भी विवाह शुभ कहा गया है । तथा-सिंह और मीन
में राशि मैत्री नहीं होने पर भी उनके स्वामियों (सूर्य गुरु) में मैत्री होने के
कारण विवाह में सिंह और मीन स्वीकृत है । अर्थात् राशि मैत्री स्वामिमैत्री
दोनों में एक भी हो तो विवाह शुभ है यदि दोनों हो तो बात ही क्या है ॥११॥
अथात्र प्रश्नं तदुत्तरं च कथयति-
पत्योर्विरोधे सति भृत्ययोः स्यान्मेलेप्यमेलस्तदलं भमैत्र्या ।
अत्रोच्यते किं न मिथो वधः स्यादेकस्य सेनानरयोर्विरोधात् १२
सं०-पत्योः (स्वामिनोः) विरोधे सति, भृत्ययोः मेलेऽपि अमेलः
स्यात्, तत् तस्मात् भमैत्र्या अलं (न प्रयोजनम्) । अत्र (अस्मिन्
प्रश्ने) उच्यते-एकस्य सेनानरयोः (सैन्यपुरुषयोः) मिथो विरोधात् किं
वधो न स्यात् ? अपि तु वधः स्यादेवातो राशिमैत्रमेव प्रधानम् ॥१२॥
भा०-स्वामियों में विरोध रहने पर नौकरों में यदि मेल भी हो तो वह
अमेल (विरोध) ही समझा जाता है । इसलिये राशिमैत्री व्यर्थ ही है, इस
प्रकार के प्रश्न में उत्तर यह है कि-एक ही राजा की सेनाओं में परस्पर विरोध
होने पर क्या वध नहीं होता है ?, अर्थात् अवश्य हो जाता है । अतः राशिमैत्री
ही में प्रधानता सिद्ध हुई ॥ १२ ॥
अत्र पुनः प्रत्युत्तरं कथयति-
अपश्यति स्वामिनि तद्वधश्चेद् गृहेश्वराणां किमदृष्टमस्ति ।
अतोऽधिकं चेत्प्रभुसख्यमेक ततो गतिः का समसप्तकस्य ॥१३॥

प्रकरणम् ३ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । २५
सं०—स्वामिनि अपश्यति तद्वधः ( तयोः सेनानरयोर्वधः ) चेत् ।
तर्हि गृहेश्वराणां ( राशिस्वामिनां = खगानां ) किं अदृष्टम् ? न किमपि,
अर्थात् सर्वं दृष्टमेव । अतः प्रभुसख्यमेवाधिकम् । एवं चेत् तदा समसप्त-
कस्य का गतिः ? इत्युच्यताम् ॥ १३ ॥
भा०—यदि ऐसा कहा जाय कि—स्वामी के परोक्ष में ही सेना में विरोध
होने से वध होता है, स्वामी के समक्ष में नहीं ? तो फिर राशीश्वरों ( ग्रहों ) के
कौन स्थान अदृश्य हैं ? अर्थात् वे सब को देखते हैं । इसलिये स्वामियों की मैत्री
ही विशेष है । यदि स्वामी की मैत्री ही विशेष है तो फिर समसप्तक ( कुम्भ
सिंह आदि ) राशियों की ग्राह्यता की क्या गति होगी ? ॥ १३ ॥
अथात्र सिद्धान्तं कथयति—
स्वभावमैत्री सखिता स्वपत्योर्वशित्वमन्योन्यभयोनिशुद्धिः ।
परः परः पूर्वगमे गवेष्यो हस्ते त्रिवर्गी युगपद्युतिश्चेत् ॥१४॥
सं०—'राश्योः' स्वभावमैत्री १, स्वपत्योः सखिता २, वशित्वम् ३,
अन्योन्यभयोनिशुद्धिः ४, 'एषु चतुर्षु पदार्थेषु' पूर्वगमे पूर्वाभावे परः परो
गवेष्योऽन्वेषणीयः ( अर्थादादौ स्वभावमैत्री ( समसप्तकादिका ) गवेष्या,
तदलाभे स्वपत्योः सखिता ( मैत्री ), तदभावे राश्योर्वशित्वम्, तदलाभे
भयोनिशुद्धिर्गवेष्या । चेत् युगपद्युतिः ( चतुर्णां प्राप्तिः ) तदा हस्ते
त्रिवर्गी ( त्रयाणां 'धर्मार्थकामानां' वर्गाणां समाहारस्त्रिवर्गी ) स्यात् ॥
भा०—राशियों की स्वभावमैत्री १, स्वामियों की मैत्री २, वशित्व ३,
[L

२६ विवाहवृन्दावनम्- [ मेलक-


सं०-प्रसूतौ जन्मकाले, आपार्श्वकेन्द्रद्वयगाः स्वस्वपार्श्वकेन्द्रद्वय-
मध्यस्थाः, खपान्थाः ग्रहाः मिथस्तत्कालमित्राणि भवन्ति, अर्थादन्ये शत्रवो
भवन्ति । इदं तत्कालसख्यं स्त्रीनर-भृत्यराज्ञां ( स्त्रीनराणां, भृत्यस्वामिनां
च ) न्यूनामपि मैत्रीं ( स्वाभाविकग्रहमैत्रीं ) विशिनष्टि विशेषयति ।
अर्थात् स्वाभाविकसमोऽपि तत्कालमैत्र्या मित्रं भवति, स्वाभाविकशत्रुस्तु
तत्कालमैत्र्या समत्वं व्रजति, स्वाभाविकमित्रं तु अधिमित्रं भवतीत्यर्थः ॥

भा०-जन्मकुण्डली में ग्रहों के अपने स्थान से दोनों तरफ के दो केन्द्रों के
बीच में ( अर्थात् २, ३, ४, १२, ११, १० इन स्थानों में ) स्थित ग्रह तात्का-
लिक मित्र होते हैं । यह तात्कालिक मैत्री कन्यावर, और मालिक नौकर की अल्प
भी स्वाभाविक ग्रहमैत्री को विशेष बनाता है । अर्थात् तात्कालिक मैत्री से-
स्वाभाविक शत्रु भी सम, और स्वाभाविक सम मित्र और स्वाभाविक मित्र अधि-
मित्र हो जाता है ॥१५॥

अथ ग्रन्थकारः स्वदेशाभिप्रायिकवर्णमैत्रीं कथयति-

षट्कर्मणां शासितदेवदैत्यौ राजन्यकस्याधिपती कुजार्को ।
विट्-शूद्रयोश्चन्द्र-बुधौ शनिश्च संकीर्णपः स्त्रीनृषु वर्णमैत्री ॥१६॥

सं० - शासिसतदेवदैत्यौ ( गुरुशुकौ ) षट्कर्मणां ( ब्राह्मणानां )
अधिपती, कुजार्को राजन्यकस्य क्षत्रियस्याधिपती, चन्द्रबुधौ क्रमेण
विट्शूद्रयोः अधिपती ( वैश्यस्य चन्द्रः, शूद्रस्य बुध इत्यर्थः ), शनिश्च
संकीर्णपः ( संकराणां हीनवर्णानां पतिः ) एवं स्त्रीनृषु कन्यावरेषु वर्णमैत्री
विचार्या । अर्थात् वधूवरयोः राशीशयोर्वर्णौ विलोक्यौ, तत्रोत्तमवर्णो
वरः श्रेष्ठः, समवर्णः समः, हीनवर्णस्तु निकृष्ट इति ।
इयं वर्णमैत्री ग्रन्थकारेण स्वदेशाप्रायेणोक्ता, अन्यदेशेषु तु-
“द्विजा झषालिकर्कटास्ततो नृपा विशोऽघ्रिजाः । वरस्य वर्णतोऽधिका
वधूर्न शस्यते बुधैः” इत्यनेनैव वर्णमैत्री ग्राह्या ॥ १६ ॥

भा०-गुरु शुक्र ब्राह्मणों के अधिपति हैं, सूर्य और मंगल क्षत्रियों के, चन्द्रमा
वैश्यों का, बुध शूद्रों का, और शनि अन्त्यजों का अधिपति है । वरकन्या की
राश्यधिप से वर्णमैत्री देखना चाहिये । यथा कन्या से उच्चवर्ण वर श्रेष्ठ, समानवर्ण
मध्यम, और हीनवर्ण अधम होता है ॥ १६ ॥

यवीयसीत्याह—!

Wait, let's check L11:
"बुध के रवि छोड़कर सब ग्रह, बृहस्पति के मङ्गल छोड़कर सब ग्रह, शुक्र के रवि"
In "मङ्गल छोड़कर":
Wait, in "छोड़कर": look at L11: "छोड़रुर" or "छोड़कुर" or "छोड़कर"?
Let's zoom in on L11:
"बृहस्पति के मङ्गल छोड़कुर सब ग्रह" -> wait, is that "छोड़कर" or "छोड़कुर"?
Look at the 'क': it has a small loop, wait, no, it's 'छोड़कर', the 'क' has a loop that might look slightly broken or smudged, let's check:
"मङ्गल छोड़कर सब ग्रह" - looks like 'छोड़कर'.

Everything looks very consistent and clear.वि०—ग्रन्थकारने अपने देश के अभिप्राय से यह वर्णमैत्री कहा है—अन्य
देशों में—'द्विजा झषालिकर्कटाः' इत्यादि राशियों के वर्णमैत्री देखना चाहिये १६
अथ यवनजातकोक्तग्रहमैत्रीं कथयति—
सुरगुरुर्ज्ञगुरू कविकोविदौ विरवयो विकुजा विरवीन्दवः ।
अशशिसूर्यकुजाः सुहृदो रवेर्यवनयुक्तिरियं न यवीयसी ॥१७॥
सं०—सुरगुरुः, ज्ञ-गुरू, कविकोविदौ, विरवयः, विकुजाः, विरवी-
न्दवः, अशशिसूर्यकुजाः, इति रवेः ( रविमारभ्य ) क्रमेण सप्तग्रहाणां
सुहृदः ( मित्राणि ) स्युः । मित्रतोऽन्ये शत्रव इत्यर्थादेव सिद्ध्यति । इयं
यवनयुक्तिः न यवीयसी ( न लघुतरा ), अपि तु गरीयस्येव ॥१७॥
भा०—सूर्य के बृहस्पति, चन्द्रमा के बुध, बृहस्पति, मङ्गल के बुध, शुक्र,
बुध के रवि छोड़कर सब ग्रह, बृहस्पति के मङ्गल छोड़कर सब ग्रह, शुक्र के रवि
चन्द्र को छोड़कर शेष सब ग्रह, तथा शनि के चन्द्र रवि मङ्गल छोड़कर शेष तीन
ग्रह मित्र हैं। अर्थात् मित्र से अन्य ग्रह शत्रु हैं। यह यवनाचार्य की युक्ति छोटी
( अमान्य ) नहीं है, अर्थात् माननीय है ॥१७॥
यवनयुक्तिः कथं न यवीयसीत्याह—
इदमुदीर्य वराहविरोचनो निजमतेऽपि न दूषितवान्पुनः ।
स बहु मन्यत एव यथातथं जयति शास्त्रमिदं यवनेष्वपि ॥१८॥
सं०—वराहविरोचनः ( वराहमिहिरः ) अपि इदं ( उपरोक्तं ग्रह-
मैत्रं ) निजमते ( बृहज्जातके ) उदीर्य ( उक्त्वा ) पुनर्न दूषितवान् ।
यवनेष्वपि इदं शास्त्रं यथातथं बहु अतिशयं जयतीति-स ( वराहमिहिरः )
मन्यत एव ( स्वीकारोत्येवेति ) ॥१८॥
भा०—वराहमिहिरार्य ने भी उपरोक्त यवनोक्त ग्रह-मैत्री अपने बृहज्जातक में
में कहकर फिर उसे दूषित नहीं किया । क्योंकि—'यवनों में भी यह शास्त्र यथार्थ
रूप से वर्तमान है' इस प्रकार वराह मिहिर भी मानते ही हैं ॥१८॥
यवनमतं कथं मन्यते इत्याह—
परमतं स्वमते विनिवेशितं यदि न दूषितमादृतमेव तत् ।
कलितकेवलसत्यमतः स तद्यवनयुक्तिषु नूनमनिस्पृहः ॥१९॥
सं०—यदि स्वमते विनिवेशितं परमतं न दूषितं तदा तत् ( परमतं )