विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
DevanagariHindipublished138 पृष्ठ
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१६ विवाहवृन्दावनम्- [ कालमीमांसा-
में क्या विवाह नहीं कहा है ? अवश्य कहा है । “धिष्ण्ये प्रोक्तं तस्य भस्योदये
वा” इत्यादि । परञ्च संसार का समस्त फल स्थूल है, उस स्थूल फल को सूक्ष्मता
विशेष करती है । अर्थात् स्थूल में सूक्ष्म का लाभ हो तो विशेष फल होता है ॥
यदि सूक्ष्मता स्थूलं विशेषयति तदा सूक्ष्मतेव किं
न ग्राह्या इत्यत्र हेतुं प्रतिपादयति-
अव्यवस्थितिरिति प्रतिवेलं तत्तदूहनविकल्पसमूहैः ।
स्थूलमप्यनुसरन्ति कृतीन्द्राः केवलं न रमणीयमणीयः ॥ ५ ॥
सं०-इति ( एवं सूक्ष्मताग्रहणे ) प्रतिवेलं ( प्रतिक्षणं ) तत्त-
दूहनविकल्पसमूहैः ( तत्तद्वेलाया ऊहनविकल्पास्तर्कवितर्ककल्पनास्तत्-
समूहैः) अव्यवस्थितिः स्यात् । अतः कृतीन्द्राः गर्गादयः स्थूलमप्यनुसरन्ति ।
केवलं अणीयः ( सूक्ष्मतरमेव ) न रमणीयं भवति ॥ ५ ॥
भा०-सूक्ष्मता के लिये प्रत्येक क्षण में तर्क वितर्क से तत्तत् समय के अनेक
कल्पनाओं से अव्यवस्थिति हो जायगी । इसलिये गर्गादि महर्षियों ने स्थूल का
भी अनुसरण किया केल सूक्ष्म अच्छा नहीं है ॥ ५ ॥
अथ सूक्ष्मफलस्य विशेषतां प्रतिपाद्य तद्ग्राह्यतां कथयति -
भिन्नभिन्नफलभाग्भुवि भूयानेकधिष्ण्यदिनजोऽपि जनोऽयम् ।
सूक्ष्मताऽपि ननु तेन गरिष्ठा सा च मूलमनुरुध्य विधेया ॥ ६ ॥
सं०-भुवि भूयान् ( बहुतरः ) अयं विद्यमानो जनः एकधिष्ण्य-
दिनजोऽपि ( एकनक्षत्रतिथ्युत्पन्नोऽपि ) भिन्नभिन्नफलभाग् 'दृश्यते'
तेन सूक्ष्मतापि गरिष्ठा ( गरीयसी ) किञ्च सा सूक्ष्मता मूलं ( स्थूल-
फलं ) अनुरुध्य 'एव' विधेया विचार्या ॥ ६ ॥
भा०-संसार में ऐसे बहुत लोग हैं जो एक नक्षत्र; एक तिथि
में उत्पन्न हुए भी भिन्न भिन्न फल के भागी हैं। इस लिये सूक्ष्मता भी विशेष
है। परञ्च वह सूक्ष्मता मूल (अर्थात् स्थूल) के अनुरोध से ही ग्रहण करना
चाहिये ॥ ६ ॥
अथ केवलसूक्ष्मताग्रहणेऽनवस्थां दर्शयति-
सूक्ष्मो नवांशाद् द्विरसांश एवं त्रिंशल्लवस्तल्लवतोऽपि सूक्ष्मः ।
ततोऽपि लिप्तेत्यवलिप्तवाचां दृगेतु कस्यां नियतौ समस्याम् ॥७॥