विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् २] वसन्तरत्नमीसहितम् । १५
भा०- "यदि जन्मकालिक चन्द्रराशि ( जन्मराशि ) से ही मेलापक विचारा
जाता है तो उससे भी सूक्ष्म चन्द्रनवांश से क्यों नहीं किया जाय ?" यदि ऐसा
प्रश्न हो तो—जब कर्क राशि में मकर के नवांश (सप्तम नवांश ) में सूर्य
रहता है तब उत्तरायण क्यों नहीं होता है ? । अर्थात् जैसे अयन और गोल राशि
से ही होता उसी प्रकार मेलक विचार भी राशि ही से उचित है ॥ २ ॥
अयनादिकं राशिवशादेवेति सप्रमाणमाह—
मासषट्क्रमयनं च दक्षिणादित्य एति तदिति श्रुतिर्जगौ ।
मूलसंक्रमसमां विवस्वतः स्वस्वभङ्गिनमृतवोऽपि बिभ्रति ॥ ३ ॥
सं०-आदित्यः ( सूर्यः ) मासषट्कं दक्षिणा❄ (दक्षिणस्यां दिशि )
एति ( गच्छति ) तत् दक्षिणा 'अयनं' इति श्रुतिः (वेदः) जगौ कथयती-
त्यर्थः । तथा—ऋतवः (वसन्तादयः ) अपि विवस्वतः ( सूर्यस्य ) मूल-
संक्रमसमां स्वस्वभङ्गिं ( स्वस्वाकृतिं ) विभ्रति ( धारयन्ति ) अतो मूल-
राशिवशादेव घटितविचारः समुचित इत्यर्थः ॥ ३ ॥
भा०—सूर्य ६ मास (कर्क से धनु पर्यन्त) दक्षिण दिशा को चलते हैं
उसीको दक्षिणायन वेद ने भी कहा है। दूसरा प्रमाण यह है कि वसन्तादि ऋतु
भी सूर्य की राशि संक्रान्ति से ही अपनी अपनी भङ्गी ( चिह्न ) को धारण करती
है । नवांश से नहीं । अर्थात् सूर्य जब मीन में जाता है तभी वसन्त का चिह्न
( वृक्षादिकों में नव पल्लवादि होना ), दृश्य होता है, मीन के नवांश में जाने से
नहीं अतः राशिवश ही मेलकविधि समुचित है ॥ ३ ॥
पुनरन्यां युक्तिं कथयति-
किं दिनर्क्षविरहे करग्रहो नेष्यते तदुदयक्षणेष्वपि ।
स्थूलमेवमखिलं जगत्फलं तद्विशेषयति सूक्ष्मतागतिः ॥ ४ ॥
सं०-दिनर्क्षविरहे ( विवाहविहितदिवसनक्षत्रालाभे ) तदुदयक्षणेषु
( तन्नक्षत्रमुहूर्तेषु ) अपि करग्रहः (विवाहः ) किं नेष्यते ? एवं अखिलं
जगत्फलं स्थूलं, तत् ( स्थूलं फलं ) सूक्ष्मतागतिः विशेषयति, स्थूले सूक्ष्म-
तालाभश्चेत् तदा स्थूलफले विशेषतां प्रतिपादयतीत्यर्थः ॥ ४ ॥
भा०-विवाहविहित दिननक्षत्र नहीं प्राप्त होने पर विहित नक्षत्र के मुहूर्त
❄ "दक्षिणा" इत्यव्ययम् ।