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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 138 में से

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पृष्ठ 25

१२ विवाहवृन्दावनम्- [ नक्षत्रशुद्धि-
(परिघस्येदं पारिघं ) द्वयंशं ( अर्धं ) त्यजेत् । तथा—इन्दुभान्वोः
पर्वणि ( ग्रहणे ) अतीते ( गते ) सति दिनसप्तकं च त्यजेत् ॥२१॥
भा०—गण्ड में ६, शूल में ५, विष्कम्भ में ३, वज्र में ३, व्याघात में ९,
और अतिगण्ड में ६ घटी आरम्भ से त्याज्य है। तथा परिघयोग का पूर्वार्ध
त्याज्य है। एवं सूर्य चन्द्रमा के ग्रहण के बाद ७ दिन सब शुभ कार्यों में
त्याज्य है ॥ २१ ॥
अथ ग्रहभेदादिगतनक्षत्रदोषं कथयति-
यस्मिन्नृक्षे वीक्ष्यते सैंहिकेयो भेदस्ताराखेटयोर्यत्र वा स्यात् ।
आषण्मासन्तत्र लग्नेन्दुभाजि भ्राजिष्णु स्यान्नो शुभंकर्म किञ्चित् ॥
सं०- यस्मिन् ऋक्षे सैंहिकेयो राहुः वीक्ष्यते दृश्यते ( ग्रहणं भवती-
त्यर्थः ) यत्र वा ताराखेटयोः ( मङ्गलादिकयोर्द्वयोर्ग्रहयोः ) भेदः ( योगः )
तत्र नक्षत्रे लग्नेन्दुभाजि ( लग्नस्थे, चन्द्राक्रान्ते वा ) आषण्मासं षण्-
मासपर्यन्तं किञ्चित् शुभं कर्म भ्राजिष्णु ( शोभनं ) न स्यात् ॥२२॥
भा०—जिस नक्षत्र में राहु देख पड़े ( अर्थात् ग्रहण हो ) और जिस नक्षत्र
में मंगलादि ५ ग्रहों में किसी दो का भेद योग हो उस नक्षत्र में स्थित चन्द्रमा,
और लग्न को ६ मास पर्यन्त त्याग देना चाहिये क्योंकि उस नक्षत्र में शुभकर्म
अच्छा नहीं होता है ॥ २२ ॥
पापमुक्तनक्षत्रस्य शुद्धिं पातदोषं चाह-
उत्पातपापग्रहमुक्तमृक्षं यदीन्दुराक्रम्य पुनर्भुनक्ति ।
तदा तदर्हं सकलेषु कर्मसु त्यजेत्समक्रान्तितनू रवीन्द्वोः ॥२३॥
सं०-उत्पातपापग्रहमुक्तं ( त्रिविधोत्पातेन, पापग्रहेण त्यक्तं ) ऋक्षं
( नक्षत्रं ) यदि इन्दुश्चन्द्र आक्रम्य पुनः ( द्वितीयवारं ) भुनक्ति तदा तत्
नक्षत्रं सकलेषु कर्मसु अर्हं योग्यं भवति । तथा रवीन्द्वोः समक्रान्तितनू
तुल्यक्रान्ती सकलेषु कर्मसु त्यजेत् ॥ २३ ॥
भा०-जिस नक्षत्र में उत्पात हुआ हो उसको और पापग्रह से त्यक्त
नक्षत्र को यदि चन्द्रमा दोबारा भोग करै तो वह नक्षत्र ६ मास के भीतर भी
सब शुभकार्य में शुभ होता है। तथा सूर्य और चन्द्रमा की तुल्य क्रान्ति को भी
शुभ कार्य में त्याग करना चाहिये ॥ २३ ॥