विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् २ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । १७
सं०—‘राशितो नवांशः सूक्ष्म उक्तः’ । नवांशादपि द्विरशांशः ( द्वा-
दशांशः ) सूक्ष्मः, एवं तद्वतः ( द्वादशांशतः ) अपि त्रिंशल्लवः सूक्ष्मः,
ततोऽपि ( त्रिंशल्लवादपि ) लिप्ता ( षष्ट्यंशः ) इत्येवं अवलिप्तवाचां
जनानां दृक् ( दृष्टिः ) कस्यां नियतौ समस्यां ( समाधानं ) एतु गच्छतु
न कस्यामपीत्यर्थः, सूक्ष्मताया अवसानाभावात् ॥ ७ ॥
भा०—राशि से नवांश सूक्ष्म कहा गया है । सूक्ष्मता के विचार में नवांश
से भी द्वादशांश सूक्ष्म, द्वादशांश से भी त्रिंशांश, त्रिंशांश से षष्ठ्यंश, इत्यादि
विष्ठ्यंश, आदि सूक्ष्म विभाग मानने वालों की दृष्टि किस अवधि पर पहुँच
सकती है ? किसी पर भी नहीं, क्योंकि सूक्ष्मता का अवसान ही नहीं हैं।
अतः स्थूल का अवलम्बन अवश्य करना चाहिये ॥ ७ ॥
अथ सूक्ष्मताया दुर्गमत्वं कथयति—
अत्यन्तसूक्ष्मः स किलैकदेशो येनाखिलानां भिदुरा फलर्द्धिः ।
नास्मादृशां दृग्विषयः स तस्मान्मूलानुकूला व्यवहारसिद्धिः ॥८॥
सं०—स एकदेशः( कालविभागः ) अत्यन्तसूक्ष्मः स्यात्, येन
अखिलानां जनानां फलर्द्धिः ( फलसम्पत्तिः ) भिदुरा ( भिन्ना भिन्ना )
भवति । स ( अत्यन्तसूक्ष्मप्रदेशः ) अस्मादृशां जनानां दृग्विषयो दर्श-
नायोग्यो न स्यात् । तस्मात् ‘लोकानां’ व्यवहारसिद्धिः मूलानुकूला एवेति ।
भा०—काल का वह प्रदेश अत्यन्त सूक्ष्म है जिससे सब जन्तुओं के फल
भिन्न भिन्न देखने में आता है, उस सूक्ष्म प्रदेश को हम लोग इस चर्मचक्षु से
नहीं देख सकते हैं, इसलिये मूल ( स्थूल नक्षत्रादि ) के अनुकूल ही व्यवहार
की सिद्धि है ॥ ८ ॥
अथ सिद्धान्तमाह—
इति सति यदि मूले सूक्ष्मभावांशलब्धि-
स्तदखिलमपि सिद्धं नास्ति चेन्मूलसम्पत् ।
तदुभयलवनाशो दुर्गमत्वादणूनां
परिणतिरिति रूढा कालमीमांसया नः ॥ ६ ॥
सं०—इत्येवं सति मूले ( अनुकूले स्थूलराश्यादौ, ) यदि सूक्ष्म-
भावांशलब्धिः, तत् ( तदा ) अखिलमपि सिद्धं स्यात् । चेत् मूलसम्पत्
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