सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 138 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 22

प्रकरणम् १ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ६
वि०— व्याघात आदि दुष्टयोग में जब सूर्य नक्षत्र से अभिजित् सहित गणना
करने से चन्द्रमा विषम नक्षत्र में पड़े तभी यह योग होता है । सम संख्य नक्षत्र
में पड़ने से नहीं होता है । इसलिये रामाचार्य ने मुहूर्तचिन्तामणि में सरल
प्रकार कहा है यथा—
व्याघात-गण्ड-व्यतिपातपूर्वे शूलाऽन्त्य-वज्रे परिघाऽतिगण्डे ।
योगे विरुद्धे त्वभिजित्समेतः खाजूरमर्काद् विषमे शशी चेत् ॥
उदाहरण—मानों व्याघात योग में रेवती में सूर्य और चित्रा में चन्द्रमा है
तो सूर्य नक्षत्र रेवती से चन्द्र नक्षत्र चित्रा तक गिनने से विषम संख्या १५ हुई
अतएव एकार्गला दोष हुआ ।
अब इस ग्रन्थ के अनुसार व्याघात की संख्या १३ में १ जोड़कर आधा करने
स्पष्टार्थ चक्र — से ७ हुआ अतः अश्विनी से ७ वाँ पुनर्वसु शीर्ष
पु. नक्षत्र हुआ । अतः पुनर्वसु को चक्र के शीर्ष
आ ─────┬───── पु. (मस्तक) पर लिखकर क्रम से अभिजित् समेत
मृ ─────┼───── श्ले २८ नक्षत्रों को न्यास करने से एक रेखा में
रो ─────┼───── म सूर्य और चन्द्रमा पड़े अतः एकार्गल दोष हुआ ।
कृ ─────┼───── पू. तथा दुष्टयोग गण्ड की संख्या १० में १
भ ─────┼───── उ. जोड़ कर आधा करने से शेष सहित (अर्थात् ५॥
अ ─────┼───── ह साढ़े पाँच) हुआ अतः इसमें साढ़े तेरह १३॥
सूर्य० रे ──┼── चि चन्द्र. जोड़ने से १९ वाँ मूल शीर्ष नक्षत्र हुआ ।
उ ─────┼───── स्वा इस प्रकार चक्र न्यास करने पर एक रेखा में
पू ─────┼───── वि. सूर्य और चन्द्रमा पड़े तो एकार्गल दोष होता
श ─────┼───── अनु है । उसमें भी यदि एक प्रथम चरण में और
ध ─────┼───── ज्ये अन्य चतुर्थ चरण में हो, अथवा एक द्वितीय
श्र ─────┼───── मू में और अन्य तृतीय में हो तो विशेष दोष
अ ─────┴───── पू समझना ॥ १५ ॥
उ.
अथार्गलायामन्याचार्यमतं कथयति—
त्यक्त्वा गतैष्यस्य परे तु हेतुमुज्झन्ति नक्षत्रमशेषमेव ।
एकार्गलस्यैव हि सा च भङ्गी सन्ध्यागतं यद्गलहस्तयन्ति ॥१६॥
सं०—परे श्रीपत्याद्याचार्यास्तु गतैष्यस्य हेतुं त्यक्त्वा अशेषं (समस्तं)
एव नक्षत्रं उज्झन्ति (त्यजन्ति) हि (यस्मात्) ते सन्ध्यागतं (सन्ध्यो-
२