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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

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८ विवाहवृन्दावनम् । [ नक्षत्रशुद्धि-

अथैकार्गलादोषमाह—
विद्धा त्रयोदशभिरूर्ध्वगतैकरेखा
खार्जूरिकं तदिह शीर्षभतो भचक्रे ।
न्यस्ते सहाभिजिति तारकराजभान्वो-
स्तुल्यर्क्षगम्यगतयोर्नयनार्गलेयम् ॥१४॥

**सं०—**ऊर्ध्वगतैकरेखा त्रयोदशभिः 'तिर्यग्रेखाभिः' विद्धा सती खार्जूरिकं 'चक्रं' भवति । तदिहास्मिन् चक्रे शीर्षभतः ( वक्ष्यमाणशीर्षनक्षत्रात् ) सहाभिजिति ( अभिजित्सहिते ) भचक्रे न्यस्ते सति तुल्यर्क्षगम्यगतयोः तारकराज-भान्वोः ( सूर्यचन्द्रयोः ) एकरेखास्थयोरियं नयनार्गला ( एकार्गलाख्योदोषो ) भवति । रविचन्द्रयोर्मध्ये एकस्य नक्षत्रं यावद्गतं तावदेवान्यस्य गम्यं चेत्तदैवायं दोष इत्यनेनात्र पादवेधः सूचितः ।

**भा०—**एक ऊर्ध्वाधर रेखा को १३ तिरछी रेखा से वेध करने पर खार्जूर नामक चक्र होता है। इस चक्र में आगे कहे हुए शीर्ष नक्षत्र से आरम्भ कर अभिजित् सहित २८ नक्षत्रों का न्यास करने पर यदि सूर्य और चन्द्रमा एक रेखा में पड़ें तथा एक के नक्षत्र का गत और दूसरे का गम्य तुल्य हो तो 'यह नयनार्गला ( परस्पर दृष्टयर्गला अर्थात् एकार्गला ) नामक दोष होता है ॥१४॥

अथ शीर्षनक्षत्रज्ञानं तथैकार्गलाफलं चाह—
शीर्षभं भवति रूपसंयुता दुष्टयोगमितिरर्द्धिता सती ।
शेषिणी यदि च सार्द्धविश्वयुङ्मङ्गलङ्गलति सार्गले विधौ ॥१५॥

सं —"इयमर्गला व्याघातादिदुष्टयोगे सति ज्ञेयेति, दुष्टे योगे सति"—सा दुष्टयोगमितिः ( विष्कम्भादिदुष्टयोगावधिसंख्या ) रूपसंयुता ( एकयुता ) अर्द्धिता सती शीर्षभं ( शीर्षनक्षत्रं ) भवति । यदि सार्द्धिता शेषिणी ( शेषसहिता ) भवेत्, तदा सार्धविश्वयुक् ( सार्धत्रयोदशसहिता सती ) शीर्षभं ज्ञेयम् । एवं विधौ चन्द्रे सार्गले सति मङ्गलं ( विवाहादिशुभकार्यं ) गलति ( नश्यति ) ॥१५॥

**भा०—**व्याघातादि दुष्टयोग की संख्या में १ जोड़ कर आधा करने से जो संख्या हो वही शीर्ष नक्षत्र होता है। यदि आधा करने से शेष युत संख्या हो तो उसमें १३॥ साढ़े तेरह जोड़ने से शीर्ष नक्षत्र होता है। इस प्रकार चन्द्रमा अर्गलायुक्त हो तो विवाहादि मङ्गल कार्य का नाश होता है ॥१५॥