विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् १ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । १३
क्रान्तिसाम्यसम्भवमाह—
त्रिभागशेषे ध्रुवनाम्नि चैन्द्रे त्र्यंशे गते सम्प्रति सम्भवोऽस्य ।
मानार्धयोगाधिकमिन्दुभान्वोः क्रान्त्यन्तरं चेन्न तदैष दोषः ॥२४॥
सं०—ध्रुवनाम्नि योगे त्रिभागशेषे सति, ऐन्द्रे योगे च त्र्यंशे गते
सति सम्प्रत्यास्मिन् समये अस्य ( क्रान्तिसाम्यस्य ) सम्भवः स्यात् ।
इन्दुभान्वोः क्रान्त्यन्तरं मानार्धयोगाधिकं चेत् तदा एष दोषो न
स्यात् । चन्द्रार्कयोर्बिम्बयोगाधार्दल्पे क्रान्त्यन्तरे सति दोष इत्यर्थः ॥२४॥
भा०—ध्रुव योग के तृतीयांश अवशेष रहने पर और ऐन्द्रयोग के तृतीयांश
बीतने पर क्रान्तिसाम्य का सम्भव होता है । अर्थात् वहाँ क्रान्ति बनाकर देखना
यदि रवि चन्द्रमा के बिम्बयोगाधं से क्रान्ति का अन्तर अधिक हो तो दोष नहीं
होता है । अर्थात् बिम्बयोगाधं से अल्प अन्तर हो तो दोष समझना चाहिये ॥२४॥
वि०—ग्रन्थारम्भ समय में १२ के लगभग अयनांश ( क्रान्तिपात ) था
अतः ध्रुवयोग में क्रान्तिसाम्य व्यतीपात नामक, तथा ऐन्द्रयोग में क्रान्तिसाम्य
वैधृत नामक होता है । इष्ट समय में अयनांश संस्कार से जो योग आवे उसमें
क्रान्तिसाम्य का सम्भव देखना चाहिये । यथा—केशवोक्त संस्कार—
“त्रिघ्नाऽयनांशा नखभाजितास्तद्धीनाश्च सार्धत्रिभुवोऽद्रिपृक्ताः ।
तत्तुल्ययुत्योर्गतयोर्विलोक्यौ पातौ व्यतीपातक-वैधृताख्यौ ॥”
अर्थ—अयनांश को ३ से गुना कर २० के भाग देने से जो लब्धि हो उसको
साढ़े तेरह (१३॥) में घटाने से जो संख्या हो उतने विष्कम्भादि योग में व्यतीपात
नामक, तथा उसी लब्धि को २७ में घटाने से जो संख्या हो विष्कम्भादि
उस योग में वैधृतनामक क्रान्तिसाम्य दोष होता है ।
उदा०—अयनांश २१ । ३० । ३२ को ३ से गुना कर ६४ । ३१ । ३६
इसमें २० का भाग देने से ३ । १३ इसको साढ़े तेरह ( १३ । ३० ) में घटाने
से ( १० । १७ ) ग्यारहवाँ ( वृद्धि ) योग की १७ घटी बीतने पर क्रान्तिसाम्य
का सम्भव हो सकता है । तथा २७ में उसी लब्धि ३।१३ को घटाने से २३।४७
बचे, अर्थात् चौबीसवाँ शुक्लयोग की ४७ घटी पर क्रान्तिसाम्य का सम्भव होगा ॥
अथ नक्षत्रशुद्धिप्रशंसामाह—
स्फुरददूषणभूषणकान्तयो यदि भवन्ति मृगाङ्कमृगीदृशः ।
करमवाप्य वरः सुतनोस्तदा शुभरसं भरसम्भृतमश्नुते ॥२५॥