विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् १ ] वसन्तलक्ष्मीसाहतम् । ११
आचार्याः क्रूराङ्घ्रिवेधाय पदं ( दृष्टान्तं ) वदन्ति, परञ्च तेनैव 'दृष्टान्तेन'
तेषां निजपक्षहानिः स्यात् । तां हानिं दर्शयति—यथा शरेण एकदि-
श्यपि ( एकस्मिन्नङ्गविभागेऽपि ) क्षतः ( विद्धः ) एणः ( मृगः ) स्वैः
असुभिः (सर्वप्राणैः) विश्लेषं (वियोगं) आयाति 'मृत्युं प्राप्नोतीत्यर्थः, तथैव
क्रूरस्य ( पापग्रहस्य ) अङ्घ्रिवेधात् तारकाणां ( नक्षत्राणां ) अपि बल-
रूपसम्पत् नश्येत् । अतएव पापविद्धं शमस्तमेव नक्षत्रं त्यजेदिति भावः ॥
भा०—जैसे विषयुक्त शर से मारे हुए हरिण के क्षत स्थल को छोड़ कर
अन्य समस्त अङ्गों का मांस प्रशस्त माना जाता है इसी दृष्टान्त से दूसरे आचार्यों
ने पापग्रह के पाद वेध मात्र को त्याज्य कहा समस्त नक्षत्र को नहीं । परञ्च
उसी दृष्टान्त से उन आचार्यों के अपने पक्ष की ही हानि हुई — क्योंकि—जैसे
किसी एक अङ्ग में भी शर से विद्ध होने पर हरिण समस्त शरीरस्थ प्राणों से
विमुक्त हो जाता है, उसी प्रकार पापग्रह से चरण वेध होने पर भी समस्त
नक्षत्रों का बलरूप सम्पत्ति नष्ट हो जाती है । इसलिये पापविद्ध समस्त नक्षत्र
को ही त्याग देना चाहिये यह ग्रन्थकार का अभिप्राय है । कहा भी है—"अशुभ
विद्धमशेषमुडु त्यजेत्” ॥१८-१९॥
अथ चण्डायुधदोषमाह—
यदन्तगं हर्षणसाध्यशूलगण्डव्यतीपातकवैधृतीनाम् ।
तत्रैव चन्द्रोडुनि चण्डमैशमस्त्रं पतेन्मङ्गलभङ्गलक्ष्म ॥२०॥
सं०—हर्षण-साध्य-शूल-गण्ड-व्यतीपातक-वैधृतीनां अन्तगं यन्नक्षत्रं
तत्रैव ( तस्मिन्नेव ) नक्षत्रे ऐशं ( ईशसम्बन्धि ) चण्डमस्त्रं पतेत्, तत्
मङ्गलभङ्गलक्ष्म ( मङ्गलस्य शुभस्य भङ्गकारकं ) ज्ञेयम् ॥२०॥
भा०—हर्षण, साध्य, शूल, गण्ड, व्यतीपात और वैधृति इन ६ योगों के
अन्त में जो नक्षत्र रहता है उस नक्षत्र पर शङ्कर का चण्ड आयुध पतित होता है,
वह मङ्गल कार्य का भङ्गकारक होता है ॥२०॥
अथ दुष्टयोगानां वर्ज्यघाटकाः, ग्रहणदुष्टसमयं चाह —
गं-शू-वि-व-व्याऽतिषु षट्शरत्रित्रिनन्दषट्का घटिकाः क्रमेण ।
द्व्यंशं त्यजेत्पारिघमिन्दुभान्वोः पर्वएयतीते दिनसप्तकं च ॥२१॥
सं०—गं-शू-वि-व-व्याऽतिषु ( गण्ड-शूल-विष्कम्भ-वज्र-व्याघाता-
ऽतिगण्डेषु ) क्रमेण षट्-शर-त्रि-त्रि-नन्द-षट्का घटिकाः त्यजेत् । पारिघं