विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० विवाहवृन्दावनम्- [ मेलक-
भा०—एक नक्षत्र एक राशि होने पर चरण भेद से परस्पर प्रीति होती है,
ऐसा पराशर मुनि ने कहा है। वशिष्ठ के शिष्य ने एक नक्षत्र के एक चरण में भी
सौमनस्य ( प्रीति ) कहा है, क्योंकि उनके मत से एक पिण्ड ( शरीर ) में
नाडीवेध नहीं होता है। इसका दृष्टान्त अग्रिम श्लोक में देते हैं ॥ ४ ॥
चरणैकत्वे दोषाभावे दृष्टान्तमाह—
नाग्निर्दहत्यात्मतनुं तथा हि द्रष्टा स्वदृष्टेर्न हि दर्शनीयः ।
एकांशकत्वेपि समप्रभावान्न भर्तृभार्याव्यवहारसिद्धिः ॥ ५ ॥
सं०—यथा हि अग्निः आत्मतनुं ( स्वशरीरं तेजोरूपं ) न दहति,
यथा च द्रष्टा स्वदृष्टेः दर्शनीयः ( दर्शनयोग्यः ) न भवति, तथा हि एकत्र
पिण्डे नाडिवेधोऽपि न भवितुमर्हतीति वशिष्ठशिष्यः प्राह । तत्र दोषं
कथयति—एवं एकांशकत्वे चरणैकत्वे समप्रभावात् ( तुल्याकारबलात् )
भर्तृभार्याव्यवहारसिद्धिरपि न स्यात् । यत उक्तं जातकेषु—"लग्ननवांश-
पतुल्यतनुः स्यात्" इत्यादि । अतश्चरणैकत्वे सौमनस्यं न भवितुमर्हती-
त्याचार्यस्याभिप्रायः ॥ ५ ॥
भा०—जैसे आग अपने शरीर को नहीं जलाती है, और देखने वाला जैसे
अपनी दृष्टि का दृश्य नहीं होता है, इसी प्रकार एक चरण होने पर एक नक्षत्र
में नाडीवेध का दोष नहीं हो सकता है, यह वशिष्ठ के शिष्य का दृष्टान्त है ।
इसमें आचार्य दोष देते हैं कि—एक चरण में तुल्य प्रभाव होने के कारण भर्त्ता
और भार्या का व्यवहार सिद्ध नहीं हो सकता है । अर्थात् स्त्री को पति के अधीन
होना चाहिये—एक नवांश में तुल्य सामर्थ्य होने से स्त्री अपने स्वामी के वश में
नहीं रह सकती है, अतः परस्पर प्रीति नहीं होने के कारण एक नक्षत्र के एक
चरण त्याज्य है ॥ ५ ॥
अथ त्रिनाडीवेधमाह—
रुद्रार्यमेन्द्रवरुणद्वयमश्विनी च विश्वाग्निवायुफणिनां युगमन्त्यभञ्च ।
शेषाणि चेति नवकत्रयमेकयाते जन्मोडुनी वरवधूनिधनाय नाडी ॥
सं०—रुद्रार्यमेन्द्रवरुण-द्वयं, अश्विनी चेति 'प्रथमनवकम्' । विश्वा-
ग्निवायुफणिनां युग्मं अन्त्यभं चेति 'द्वितीयनवकम्' । शेषाणि नक्षत्राणि
च 'तृतीयनवकम्' इत्येवं 'नक्षत्राणां' नवकत्रयं ज्ञेयम् । जन्मोडुनी