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तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा

DevanagariHindipublished174 पृष्ठ

तरुणके स्वप्न
बन्दी होनेपर भी उसे कष्ट नहीं है यदि उसका स्वास्थ्य
अक्षुण्ण हैं। किन्तु हमारा कष्ट तो आध्यात्मिक नहीं
है, वह शारीरिक है, आत्माके तैयार होनेपर भी शरीर
कभी-कभी दुर्बल हो जाता है।
लोकमान्य तिलकने जेलमें गीताकी समालोचना
लिखी थी और मैं निसन्देह कह सकता हूं कि जेलमें वे
भीतरसे सुखी रहे होंगे, किन्तु इसमें भी मुझे सन्देह
नहीं है कि मान्डला जेलमें छ साल तक रहनाही उनकी
अकाल मृत्युका कारण हुआ। यह मुझे मानना होगा
कि जिस निर्जनतामें मनुष्यको जेल जीवन बिताना पड़ता
है वही निर्जनता मनुष्यको बाहिरी वातावरणसे दूर कर
जीवनकी गहनतम समस्याओंपर विचार करनेका सुयोग
देती है। अपने सम्बन्धमें भी मैं कह सकता हूं कि
साल भर यहां रहनेके कारण व्यक्तिगत और समष्टिगत
अनेक समस्याओंका बहुत कुछ समाधान कर सका हूं।
जो मतामत एक समय नितान्त साधारण तौरसे प्रकट
किये जाते या सोचे जाते, आज वे स्पष्ट और अपने
पूर्ण रूपसे मेरे सामने आ गये। और किसी तरफसे
नहीं, जब तक जेलकी मीयाद खत्म नहीं होती न सही मैं
आध्यात्मिकी दृष्टिसे बहुत कुछ लाभवान हो सकूंगा।
७६

जेल और कैदी
तुमने मेरे कारावास ग्रहणको एक प्रकारका Martyr-
dom कहा है। बेशक, यह कहना तुम्हारी गम्भीर अनुभूति
और प्राणोंके महत्वका परिचायक है। किन्तु humour
और proportion का मुझे थोड़ा बहुत ज्ञान है, इसलिये
अपनेको Martyr अनुभव करनेकी स्पर्धा नहीं करता ।
स्पर्धा या आत्मदर्पसे दूर ही रहना चाहता हूं। हां, इसमें
कितना सफल हुआ है, यह तुम्हारे जैसे मित्र ही कह
सकते हैं। Martyrdom तो मेरे लिये एक आदर्श हो
सकता है।
मेरा विश्वास है कि अधिक समय तक जेलमें रहने
केलिये सबसे बड़ी मुसीबत यही है कि उसके अन-
जानमें ही बुढ़ौती उसे आ घेरती है। इसलिये इस ओर
उसे विशेष ध्यान रखना चाहिये। तुम सोच भी नहीं
सकते कि अधिक समय तक जेलमें रहनेके कारण आदमी
कैसे शरीर और मनसे बुड्ढा हो जाता है। इसके अनेक
कारण हैं, खराब खाना व्यायाम या स्फुर्तिका अभाव,
समाजसे अलग रहना, अधीनताकी शृङ्खलाका भार, मित्रोंका
अभाव और संगीतका अभाव, संगीतका अभाव सबसे
अन्तमे उलिखित है किन्तु यह बहुत बड़ा अभाव है। अनेक
अभावोंकी पूर्ति तो मनुष्य अपने अन्तरसे कर सकता है
७७

तरुणके स्वप्न
किन्तु कुछकी पूर्ति बाहरसेही हो सकती है। इन सब
बाहिरी चीजोंसे वंचित रहना अकाल वार्द्धक्यका मामूली
कारण नहीं है। अलीपुर जेलमें युरोपियन कैदियोंके
लिये सप्ताहमें एक दिन संगीतका प्रबन्ध है, पर हमारे
लिये नहीं। पिकनिक, संगीत चर्चा, साधारण वक्तृता
और खुली जगहमें घूमना तथा काव्य साहित्यकी चर्चा
करना हमारे जीवनको कितना सरस और मधुर बना
देता है यह हम साधारण जीवनमें अनुभव नहीं कर सकते
परन्तु जब हमें जबरन बन्दी बनाकर रखा जाता है,
तब समझमें आता है। जबतक जेलमें स्वास्थ्यकर और
सामाजिक विधि व्यवस्थाका प्रबन्ध न होगा, उस समय
तक कैदियोंके सुधारकी बात असंभव है। और तबतक
जेल नैतिक उन्नतिका साधन न होकर वर्तमान अवनत
अवस्थामें ही पड़ी रहेगी।
यह लिखना शायद उचित नहीं है कि अपने आदमियों,
मित्रों प्रिय जनों और सर्वसाधारणकी सहानुभूतिसे मनु-
ष्यको जेलमें भी अत्यन्त सुख होता है। यह भाव कैदीके
मनमें सूक्ष्म रूपसे काम करता है, तब भी मैं अपने मनका
विश्लेषण करके समझ पाता हूं कि यह भाव कुछ कम
वास्तविक नहीं है। यह सहानुभूति प्राप्त करनेका भाव
७८

जेल और कैदी

साधारण और कैदियों राजनैतिक कैदियोंके भाग्यके फर्कको
साफ कर देता है। जो राजनैतिक कैदी है, वह जानता है
कि छुटकारा पानेपर समाज उसका सहर्ष स्वागत करेगा,
किन्तु साधारणतः अपराधी इस तरहकी संभावना नहीं
देखता। संभव है वह अपने घरके सिवा और कही भी सहा-
नुभूतिकी आशा नहीं कर सकता, इसी लिये सर्वसाधारण
को मुंह दिखानेमे उसे शर्म मालूम होती है। मेरे Yard
मे जो कैदी काम करते है उनमे कुछ कैदी कहते है कि उनके
घरवालोको मालूम ही नही कि जेलमें है। वे शर्मके मारे
घरपर किसी तरहका संवाद नही भेजते। यह परिस्थिति
बड़ी असन्तोषजनक मालूम होती है। सभ्य समाज
अपराधियोंके प्रति अधिक सहानुभूतिशील क्यों न
बने ?
जेल जीवनकी अभिज्ञता और उससे उठनेवाले विचा-
रोंसे पन्नेपर पन्ने लिख सकता हूं। पर एक चिट्ठीका
भी तो कहीं अन्त होना चाहिये। विशेष शक्ति और
उद्यम होता तो इस विषयपर एक पुस्तक लिखनेकी चेष्टा
करता किन्तु ऐसी सामर्थ्य नही है।
मैं जेलके कष्टको शारीरिक न मानकर मानसिक
माननेका पक्षपाती हूं। जहां अत्याचार और अपमानका

७६

तरुणके स्वप्न
आघात यथा संभव कम हो आता है वहां बन्दी जीवन
उतना यंत्रणा दायक नहीं होता । किन्तु इस तरहका सूक्ष्म
आघात ऊपरवालोंकी तरफसे होता है, जेलके अधिकारि-
योंका इसमें कुछ हाथ नहीं रहता । ये जो आघात और
उत्पीड़न हैं वे मनुष्यके मन को, आघात करनेवालेके प्रति और
भी विकृत कर देते हैं और इसीसे मनमें होता है कि ये
आघात व्यर्थ हैं । इनसे हम अपना पार्थिव अस्तित्व
भूल जाते हैं और अपने हृदयमें आनन्दधामकी प्रतिष्ठा
करते हैं। इसी लिये ये आघात हमारी स्वप्नाविष्ट
आत्माको जगाकर हमें बल देते हैं, कहते हैं कि हमारे
आस-पासकी अवस्था कितनी कठोर और निर्मम है।
तुमने कहा, रोज रोज मनुष्यके आंसू पृथ्वीकी
नीचीसे नीची तहोंको भिगाते चले जा रहे हैं,—यह
दृश्य तुम्हें प्रतिदिन गम्भीर और विषण्ण बना रहा
है। किन्तु ये आंसू, दुखके ही आंसू नहीं हैं, उनमें
करुणाश्रु और प्रेमाश्रु भी हैं। समृद्धतर और प्रशस्ततर
आनन्द स्रोतपर पहुंचनेकी संभावना होनेपर आपत्तियोंके
छोटे मोटे गढ़ोंको पार करनेसे क्या तुम इन्कार कर देते ?
मैं खुद तो दुखवाद और निराशाका कोई कारण नहीं
देखता, बल्कि मनमें यही होता है कि दुख और यंत्रणा
८०

जेल और कैदी
उन्नततर कर्म और उच्चतर सफलताको प्रेरणा ला देगी।
तुम क्या समझते हो कि बिना दुख कष्टके जो मिलता है,
उसका कुछ मूल्य है ?
कुछ दिन पहले तुमने जो किताबें भेजी थीं वे सब
मिल गयीं। किन्तु अब उन्हें वापिस नहीं कर सकता,
क्योंकि उनके पढ़नेवाले बहुत हो गये हैं। तुम्हारी रुचि
जितनी अच्छी है, उस हालतमें यह कहना अनावश्यक है
कि तुम जो किताबें भेजोगे वे सादर गृहीत होंगी। इति—
1320/05 माण्डला जेल
२५-६-२५
प्रिय दिलीप,
अन्तिम चिट्ठीके बाद तुम्हारी कुल तीन चिट्ठियां
मिलीं। चिट्ठियोंकी तारीखें हैं, ६ मई, १५ मई, १५ जून।
तुम्हारा भेजा हुआ किताबोंका पार्सल मिल गया।
तुर्गनेवकी Smoke नामक किताब नहीं मिली। पार्सल
आफिसमें खोला गया था, इसलिये सुपरिण्टेण्डेण्टसे इस
विषयमें कह रखा है। जरूरत होनेपर कलकत्तेकी C. I.
D. से वे पूछेंगे, तुम भी D. I. G. C. I. D. को लिख
कर ध्यानाकर्षण कर सकते हो।
Bertrand Russel की "Prospects of Indus
६ ४१

तरुणके स्वप्न
trial Civilisation" नामक पुस्तक बहरमपुर जेलमें कई
कैदियोंके पास है। मैं जब स्थानान्तरित किया गया तब
अनेक इस किताबको अपने पास रखना चाहते थे। इसकी
तुम्हें जरूरत न होगी यह समझकर वहीं छोड़ आया था।
रसलकी किताबोंका इतना आदर है कि कोई पाकर देना
नहीं चाहता। बहरमपुरके सुपरिण्टेण्डेण्टको लिखा है कि
वे तुम्हारे पास किताब भेज दें। तुम भी उन्हें एक पत्र
लिख देना, तकादा हो जायगा। तुम्हारा काम अटक गया
इसके लिये बड़ा दुःखी हूं किन्तु तुम समझ सकते हो
कि मैं उस समय नहीं समझ सका था कि तुम्हें इसकी
इतनी सख्त जरूरत पड़ेगी। "Free Thought and
Official Propaganda" मेरे पास नहीं है, यह किताब
तुमने मेरे पास नहीं भेजी।
किताब चुनदेनेकेलिये अनेक धन्यवाद। हम लोग
सब आशा करते हैं कि जो काम तुमने शुरू किया है, वह
भगवानकी कृपासे अच्छी तरह चलेगा। तुम्हारे लेख मैं
सम्मान सहित पढूंगा, यह कहना न होगा। किताब प्रका-
शित करते समय कवरकी तरफ ध्यान रखना, बंगवाणीमें
रवीन्द्रनाथपर लिखा हुआ एक लेख देखो, मैंने अभी उसे
पढ़ा नहीं है किन्तु विषय चित्ताकर्षक मालूम पड़ता है।
८२

जेल और कैदी
तुम जानते हो आजकल मेरे मनको क्या आच्छादित
किये रहता है। मैं जानता हूं हम सब एक ही विषयको
सोचते हैं, वह है महात्मा देशबन्धुका देहत्याग । अख-
बारमें जब यह समाचार पढ़ा तब अपनी आंखोंका
विश्वास नहीं हुआ किन्तु हाय ! संवाद नितान्त सत्य
था। मालूम होता है, हमारी जातिका भाग्य ही फूटा
है। जो विचार मेरे मनमें आन्दोलित हो रहे हैं, उनको
प्रकाशित कर मनको हलका करनेकी इच्छा होनेपर भी
मुझे कष्टकोही संयत करना होगा। जो सब बातें इस
समय मनमें आ रही हैं वे इतनी पवित्र, इतनी मूल्यवान
हैं कि अपरिचितके सामने प्रगट नहीं की जा सकतीं ।
Censor को अपरिचित न मानूं यह कैसे हो सकता है ?
मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि देशबन्धुके न रहनेसे
देशकी अपूर्व क्षति तो हुई ही, बंगालके युवकोंका तो
सर्वस्वही चला गया। सचमुच इस घटनाने मुझे स्तम्भित
कर दिया।
आज मैं इतना शोकाच्छन्न और विचलित हूं, साथ ही
साथ मनोजगतमें उन महात्माके इतना निकट पहुंच गया
हूं कि उनकी गुणावलिके सम्बन्धमें कुछ भी विश्लेषण
करना असम्भव है। मैंने उनके पास रहकर, बिलकुल
८३

तरुणके स्वप्न
सहज अवस्थामें उनके जो रूप देखे थे, समय आने-
पर दुनियाको उनका कुछ आभास दे सकूँगा ऐसी आशा
है। मेरे समान उनके बारेमें जो अनेक बातें जानते हैं,
वे कह सकनेपर भी, आज कुछ कह नहीं सकते, चुप हैं,
डर होता है कि उनके महत्वका पूर्ण परिचय न दे सकने-
की अक्षमताके कारण उन्हें सकुंचित करके न दिखा दें।
तुम जब कहते हो कि खैर कोई कष्ट नहीं है, तब मैं
तुमसे एकमत होता हूं। जीवनमें ऐसी ट्रेजडी होती
है, जैसी कि हमारे ऊपर आ गयी, किन्तु उसे मैं सानन्द
ग्रहण नहीं कर सकता। मैं इतना बड़ा तत्व-ज्ञानी या
पाखण्डी नहीं हूं कि कह सकूं कि मैं सब तरहका
दुख सहर्ष वरण कर सकता हूं। अनेक ऐसे अभागे हैं—
मुमकिन है वे भाग्यवान ही हों—जो मानो सब तरहका
दुख कष्ट भोगनेकेलिये ही पैदा हुए हैं। अधिक हो या
कम, यदि किसीको कटोरेभर दुख ही पीना पड़े तो अपने
आपको भूलकर ही पीना अच्छा है। किन्तु आत्म समर्पण
या आत्मनिवेदनका यह भाव चीनकी दीवारकी तरह सब
आघातो और कष्टोंसे रक्षा नहीं भी कर सकता है।
हां,—यह आत्म-समर्पण हमारी सहन शक्तिको बहुत
कुछ बढ़ा देता है, इसमें शक नहीं। वरटण्डने कहा है,
८४

द्वितीय खण्ड: राष्ट्र-सेवा, समाज-सुधार एवं स्वाधीनता का आह्वान

जीवनमें ऐसी ट्रेजेडी भी है, जिसके हाथसे मनुष्य छुट-
कारा ही चाहता है, यहां उन्होंने बिलकुल सांसारिक
व्यक्तिका मत प्रकट किया है। मेरा अपना विश्वास तो
यह है कि जो सिर्फ निष्कलंक साधु बनता है या साधु-
त्वका प्रदर्शन करता हैं, वह पाखण्डी है और वही इस
बातका प्रतिवाद कर सकता है।
जो भावुक या तत्व ज्ञानी हैं उनकी यन्त्रणा सम्पूर्ण
रूपसे निरविच्छिन्न है, यह समझना ठीक नहीं है। तत्व
ज्ञानहीनों ( abstract point of view से में उन्हें
तत्व ज्ञानहीन कहता हूं·) का भी अपना एक idealism
है। उसे वे 'पूजार्ह' समझते हैं, श्रद्धा और प्रेम करते हैं।
नाना प्रकारके दुख और यंत्रणाके साथ युद्ध करते समय
वे उसी प्रेमसागरसे साहस और भरोसा पाते हैं। यहां
मेरे साथ जिन्होंने कारावासकी यन्त्रणाभोगी है, उनमें
अनेक ऐसे हैं जो भावुक या दार्शनिक नहीं हैं। तब भी वे
शान्त भावसे यन्त्रणा सहते हैं, वीरकी तरह सहते हैं।
Technical अर्थमें वे दार्शनिक न हों पर मैं उन्हें सम्पूर्ण
रूपसे भाव विवर्जित भी नहीं समझ सकता। संभवतः संसार
में जो कर्मी हैं, उनसबके बारेमें यही बात कही जा सकती
है। सर्वसाधारणके मनमें यह धारणा है कि कैदी जब फां-

तरुणके स्वप्न
सीके तख्तेपर ले जाया जाता है तब उसमें एक तरहकी
स्नायविक दुर्बलता आ जाती है, सिर्फ वे ही वीरकी
तरह मर सकते हैं जो किसी महान् उद्देश्यकी सिद्धिके
लिये प्राणोत्सर्ग करते हैं। यह धारणा ठीक नहीं है।
इस सम्बन्धमें मैंने कुछ तथ्य संग्रह किये हैं तथा इस
सिद्धान्तपर पहुंचा हूं कि अधिकांश अपराधी साहसके
साथ मरते हैं और फांसीकी रस्सी गलेमें पहनाये जाने-
के पहले भगवानके चरणोंमें अपनेको निवेदित कर देते
हैं। बिलकुल किंकर्तव्य विमूढ़ होकर पड़ जानेवाले विशेष
दिखलायी नहीं पड़ते। जेलके एक अध्यक्षने मुझे बत-
लाया था कि एक दिन एक कैदीने फांसीके तख्तेकी ओर
जाते हुए कहा था कि सचमुच उसने हत्या की थी।
उससे पूछा गया कि तुम्हें अपने कामके लिये अनुताप है
क्या ? तो उसने बतलाया कि वह अपने कामकेलिये
जरा भी अनुतप्त नहीं है, क्योंकि जिसकी उसने हत्या
की, उसे मार डालनेके कारणोंसे वह सन्तुष्ट था। उस-
ने वीरकी तरह फाँसीके तख्तेपर पैर रखा और वीरकी
तरह प्राण दिये किन्तु उसकी एक नस भी संकुचित
नहीं हुई।
अपराधियोंके मनस्तत्वकी आलोचना कर मेरी आंखें
८६

जेल और कैदी


खुल गयीं। मैं अब सोचता हूं साधारणतया उनके प्रति अ-
विचार किया जाता है। उस बार यानी १६२२ में मैं जब
जेलमें था, उस समय एक कैदी मेरे yard में नौकरका
काम करता था। उस समय मैं महाप्राण देशबन्धुके साथ
एक ही स्थानपर रहता था। देशबन्धुके प्राण बड़े सदय
थे, इसीलिये वे सहजभावसे ही कैदीके प्रति आकृष्ट हो
गये थे। वह पुराना पापी था, आठवार सजा भोग चुका
था। किन्तु न जाने कैसे वह भी देशबन्धुके प्रति अनुरक्त
हो उठा था तथा आश्चर्यदायक शक्तिका परिचय दिया
था। छूटनेके समय देशबन्धुने उससे कहा था कि जेलसे
छूटनेपर मेरे साथ बराबर मिला करना, पुराने साथियों-
के साथ अब मत मिलना। कैदी राजी हो गया था और
कहनेके अनुसार काम भी किया था। तुम्हें सुनकर
आश्चर्य होगा कि वह व्यक्ति एक दिन पुराना दागी था,
जेलसे आनेपर वह उनके घर रहा था, तथा बीच-बीचमें
अभद्र व्यवहार करनेपर भी अब सरल भावसे ही जीवन
यापन करता है तथा देशबन्धुके न रहनेसे जिनकी अपार
क्षति हुई है उनमेंसे वह भी एक है। अनेक कहते हैं कि
छोटी और तुच्छ घटनासे ही मनुष्यके महत्वका विचार
करना चाहिये। यह बात सत्य हो तो देशका उन्होंने जो


८७

तरुणके स्वप्न
कुछ उपकार किया है उसे छोड़ भी दिया जाय तो कहा
जा सकता है कि वे एक महापुरुष थे।
मैं अपनी असली बातसे बहुत दूर आ गया, अब
मुझे रुकना होगा। तुम्हारी चिट्ठीका जवाब पूरा पूरा
नहीं दे सका किन्तु अधिक देर करनेसे आजकी डाक
छूट जायगी। मैं जानता हूं तुम मेरा पत्र पानेकेलिये
उद्विग्न 'होगे। इसलिये यह चिट्ठी आजकी डाकसेही
छोड़ना होगा। अगले पत्रमें और समाचार लिखूंगा।
इति—

दलादलि और बंगालका भविष्य
( श्री भूपेन्द्रनाथ वंद्योपाध्यायको लिखा एक पत्र )
मण्डला जेल
प्रियवरेषु,
आपका २-५-२६ का पत्र पाकर आनन्दित हुआ,
उत्तर देनेमें विलम्ब हुआ, क्षमा करेंगे। इस समय मैं
अनेक बातोंमें अपना मालिक नहीं , यह तो आप सम-
झते ही होंगे। आपके पत्रसे भवानीपुरके सब समाचार
पाकर सुखी और दुखी हुए बिना नहीं रह सकता। आज
८६

तरुणके स्वप्न
बंगालमें दलादलि और झगड़ा झंझट ही अधिक है और
जहांपर जितना कम काम है,वहां उतना ही अधिक झगड़ा
है। भवानीपुरमें कुछ काम होता है इसी लिये झगड़ा
कुछ कम है, किन्तु जो कुछ भी है निष्पक्ष आदमी उससे
म्रियमाण हुए बिना नहीं रह सकता। मैं सिर्फ यही
सोचता हूं कि झगड़ा करनेकेलिये इतने आदमी मिल
मिल जाते हैं, पर मीमांसा करदेने वाला एक भी आदमी
बंगालमें नहीं है ? इसी दलादलिके कारण बंगालने
आज अनिलवरण जैसे स्वदेश सेवकको खो दिया। और
कितने सेवकोंको नहीं खो देगा, कौन जानता है ? बंगाली
आज अन्धे हो रहे हैं, कलह विवादमें निमग्न हैं, इसीलिये
यह बात समझकर भी नहीं समझ पाते । निस्वार्थ आत्म-
दानकी बात तो अब सुनाई नहीं पड़ती । एक महाप्राण
शून्यमें मिल गया, अग्निमय प्रकाशसे युक्त त्यागकी मूर्ति
धारण कर वह हमारे सामने आया,उसी दिव्यालोकके प्रभा-
वसे बंगालीने क्षणभरकेलिये स्वर्गका परिचय पाया;किंतु
फिर वह आलोक भी लुप्त हो गया और बंगाली भी
स्वार्थकी तलैयामे फंस गये। आज बंगालभरमें अधि-
कारके लिये कशमकश हो रही है। जिसके पास अधि-
कार है वह उसे बचाये रखनेकेलिये प्रयत्नशील है। दोनों
६७

दलादलि और बङ्गालका भविष्य
पक्ष कहते हैं; देशोद्धार होगा तो हमारे ही द्वारा होगा ,
नहीं तो नहीं होगा । इन अधिकार-लोभी राजनितिज्ञोंके
झगड़ोंसे अलग रहकर चुपचाप आत्मोत्सर्ग करता रहे,
ऐसा स्वदेशसेवी बंगालमें आज नहीं है क्या ? अपनी
intellectual और spiritual उन्नतिकी अवहेलना कर
जिन्होंने देशसेवामें आत्मनियोग किया है, वे भी यदि
क्षुद्रातिक्षुद्र बातोंमें सबको झगड़ते देखकर निराश होकर
राजनीति क्षेत्रसे अलग हो जायं, इसमें आश्चर्य क्या है ?
अपने मानसिक और पारमार्थिक कल्याणको तुच्छ मान
जिन्होंने देशहितका व्रत लिया है, वे क्या इन क्षुद्र
झगड़े झंझटोंमें अपनेको डुबा देंगे ? जन-सेवासे निराश
होकर यदि वे फिर पारमार्थिक कल्याणमें मन लगावें तो
क्या उनको दोष दिया जा सकता है ? आज मैं स्पष्ट
समझ रहा हूं कि समाजकी यही हालत रही तो न जाने
कितने समाजसेवी अनिलवरणका पथ अवलम्बन करेंगे ।
आज बंगालके अनेक कार्यकर्त्ताओंमें व्यवसायी और
पटवारी बुद्धि जाग पड़ी है। वे अब कहने लगे हैं, हमें
क्षमता दो, पद दो, अथवा हमे कार्यकारिणीका सदस्य
बनाओ, नहीं तो हम काम नहीं करेंगे। मैं पूछना चाहता
हूं नरनारायणकी सेवा व्यवसाय बुद्धिसे, contract से
६१

तरुणके स्वप्न
कबसे होने लगी ? मैं तो जानता था कि सेवाका आदर्श
यही है :—
“दाओ दाओ, फिरे नहि चाओ,
थाके जोदि हृदये सोम्बल ।”
जो बंगाली इतना जल्द देशबन्धुके त्यागकी बात भूल
गया, वह कुछ दिन पहलेकी विवेकानन्दकी वीरवाणी
भूल जायगा, इसमें विचित्रता क्या है ?
दुखकी बात, कलंककी कहानी सोचते-सोचते कलेजा
फटने लगता है। प्रतिकारका उपाय नहीं, करनेकी क्षमता
नहीं, इसीलिये अक्सर सोचता हूं, चिट्ठी पत्री लिखना
बन्द कर दुनियाके साथका बाहरी सम्बन्ध बिलकुल तोड़
दूं । सकूंगा तो लोगोंकी नजरोंसे ओझल होकर तिल-
तिलकर जीवन देकर इसका प्रायश्चित्त कर जाऊंगा ।
इसके बाद यदि ऊपर भगवान हों, यदि सत्यकी प्रतिष्ठा
हो,तो मेरे हृदयकी बात देशवासी एक न एक दिन समझेंगे
ही। देशके नामपर एक इतना बड़ा प्रहसन देखूंगा,
‘Nero is fiddling while Rome is burning’ का
एक नवीन उदाहरण आंखोंके सामने आयेगा—किसी
दिन यह सोचा भी नहीं था ।
बहुत कुछ कह गया, हृदयका आवेग दबाकर न रख
६२

दलादलि और बङ्गालका भविष्य

सका। आपलोगोंको बिलकुल अपना समझता हूं इस-
लिये इतनी बाते लिखनेका साहस हुआ। आपलोग संग-
ठन-मूलक काम कर रहे हैं, आशा है आप इस दलादलिके
कीचड़से अलग रहेंगे।
विद्यालयका समाचार पाकर विशेष आनन्दित हुआ।
किन्तु मकानकी बात पढ़कर बिना दुखी हुए न रह सका।
किन्तु यह बात मैं पहलेसे ही जानता हूं तथा चण्डीबाबू
आदिसे इसके परिणामके सम्बन्धमें कह भी चुका था।
मैं हमेशा सोचता कि स्कूलके अधिकारियोंने unbusiness-
like ढंगसे जमीन लीज लेकर मकान बनवानेका काम शुरू
कर दिया था जिसके फलस्वरूप जमीनदारको ही फायदा
हुआ। जाने दो, अब तो 'गतस्य शोचना नास्ति।' आप-
लोग जरा भी ना उम्मीद न हो कर "गृह निर्माण" के
लिये धन संग्रह कर रहे हैं, यह अत्यन्त आशाप्रद है।
आपका प्रयत्न सफल होगा इसमे मुझे सन्देह नहीं है,
क्योंकि, "नहि कल्याणकृत् कश्चित् दुर्गतिं तात ! गच्छति"
समितिके तमाम समाचार जानकर बहुत सुखी हुआ।
आपलोग मेहतर चमार आदि छोटी जाति कहलानेवालों-
के बालकोंकेलिये एक विद्यालय खोल सके तो बहुत
अच्छा हो। इस विषयमें अमृतके साथ सलाह करियेगा,
६३

तरुणके स्वप्न
बहुत दिन हुए मुझे उसका एक पत्र मिला था। दुःख है
कि उत्तर न दे सका। आज कुलदाको पत्र लिखा है,
आशा है आगामी सप्ताह अमृतको पत्र लिखूँगा।
कहना न होगा कि मैं रहता तो आपलोगोंको अलग
न होने देता, हां भिन्न शाखा स्थापित करनेका प्रस्ताव
मैं अवश्य करता, खैर जो हुआ सो हुआ। आपलोगोंने
Constitution बनाके अच्छा ही किया।
आशा है चावल, चन्दा संग्रहके सम्बन्धमें बालक
समितिके साथ आपका तनाव न होगा। एक ही स्थानमें
यदि अनेक समितियां चावल, चन्दा लेना आरंभ करदें
तो गृहस्थ ऊब उठते हैं, यह बात ध्यान रखना चाहिये।
मेरा ख्याल है कि यदि आप दो एक कार्यकर्ताओंको
कासिमबाजार पोलिटेकनिकमें भेज कर कुछ सिखला ले
सकें तो technical शिक्षाकी विशेष सुविधा होगी।
मैं एक बार कासिमबाजार स्कूल गया था, स्कूल मुझे
बहुत पसन्द आया, वे कई ऐसी नयी चीजें सिखलाते हैं
जो अन्य स्कूलोंमे नही सिखलायी जातीं, जैसे बेतका
काम, clay modelling, सिलाई, electroplating आदि।
मैं जब गया था तब electroplating के लिये मैशीनरी
खरीदी जा रही थी।
६४

दलादलि और बङ्गालका भविष्य
आपका भेजा हुआ विद्यालय और समितिका con-
stitution मिला।
स्वास्थ्य विभागका काम ठीक नहीं हो रहा है, यह
बड़े दुःखकी बात है, इसका कारण यह है कि जनसाधा-
रणको ठीक तरहसे आकर्षित नहीं किया जा सका। ठीक
ढङ्गसे पुकारनेपर जनता बिना प्रत्युत्तर दिये नहीं रह
सकती। स्वास्थ्य विभागके उद्देश्यसे दातव्य चिकित्सा-
लयका उद्देश्य बिलकुल भिन्न है। जनतामें यदि कर्म-
प्रेरणाको जाग्रत करना है तो प्रेम द्वारा उन्हें अपना
बनाना होगा।
संभवत, आप नहीं जानते कि दक्षिण कलकत्ता सेवा-
श्रमकी त्रुटिके लिये मैं जिम्मेदार हूं। बाहर रहनेके कारण
मैं इसे ठीक organise नहीं कर सका। फिर एकाएक
गिरफ्तार कर लिया। जिस समय सेवाश्रम कालीघाटमें
था, उस समय मकान भाड़ा और सहकारी मंत्रीका वेतन
मैं खुद देता था। सिर्फ बालकोंके भोजनादिका खर्च सर्व
साधारणके दानके भरोसे चलता था। सेवाश्रमके संबंध-
में मेरा clear conscience है, क्योकि जनताके दिये हुए
द्रव्यमेंसे मैंने एक पाईका भी असद्व्यवहार नहीं किया।
मेरी गिरफ्तारीके बाद भी जो मैं देता था उसे मेरे बड़े
६५