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तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा

DevanagariHindipublished174 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 174 में से

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पृष्ठ 93

तरुणके स्वप्न
कबसे होने लगी ? मैं तो जानता था कि सेवाका आदर्श
यही है :—
“दाओ दाओ, फिरे नहि चाओ,
थाके जोदि हृदये सोम्बल ।”
जो बंगाली इतना जल्द देशबन्धुके त्यागकी बात भूल
गया, वह कुछ दिन पहलेकी विवेकानन्दकी वीरवाणी
भूल जायगा, इसमें विचित्रता क्या है ?
दुखकी बात, कलंककी कहानी सोचते-सोचते कलेजा
फटने लगता है। प्रतिकारका उपाय नहीं, करनेकी क्षमता
नहीं, इसीलिये अक्सर सोचता हूं, चिट्ठी पत्री लिखना
बन्द कर दुनियाके साथका बाहरी सम्बन्ध बिलकुल तोड़
दूं । सकूंगा तो लोगोंकी नजरोंसे ओझल होकर तिल-
तिलकर जीवन देकर इसका प्रायश्चित्त कर जाऊंगा ।
इसके बाद यदि ऊपर भगवान हों, यदि सत्यकी प्रतिष्ठा
हो,तो मेरे हृदयकी बात देशवासी एक न एक दिन समझेंगे
ही। देशके नामपर एक इतना बड़ा प्रहसन देखूंगा,
‘Nero is fiddling while Rome is burning’ का
एक नवीन उदाहरण आंखोंके सामने आयेगा—किसी
दिन यह सोचा भी नहीं था ।
बहुत कुछ कह गया, हृदयका आवेग दबाकर न रख
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