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तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा

DevanagariHindipublished174 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 174 में से

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पृष्ठ 87

तरुणके स्वप्न
सीके तख्तेपर ले जाया जाता है तब उसमें एक तरहकी
स्नायविक दुर्बलता आ जाती है, सिर्फ वे ही वीरकी
तरह मर सकते हैं जो किसी महान् उद्देश्यकी सिद्धिके
लिये प्राणोत्सर्ग करते हैं। यह धारणा ठीक नहीं है।
इस सम्बन्धमें मैंने कुछ तथ्य संग्रह किये हैं तथा इस
सिद्धान्तपर पहुंचा हूं कि अधिकांश अपराधी साहसके
साथ मरते हैं और फांसीकी रस्सी गलेमें पहनाये जाने-
के पहले भगवानके चरणोंमें अपनेको निवेदित कर देते
हैं। बिलकुल किंकर्तव्य विमूढ़ होकर पड़ जानेवाले विशेष
दिखलायी नहीं पड़ते। जेलके एक अध्यक्षने मुझे बत-
लाया था कि एक दिन एक कैदीने फांसीके तख्तेकी ओर
जाते हुए कहा था कि सचमुच उसने हत्या की थी।
उससे पूछा गया कि तुम्हें अपने कामके लिये अनुताप है
क्या ? तो उसने बतलाया कि वह अपने कामकेलिये
जरा भी अनुतप्त नहीं है, क्योंकि जिसकी उसने हत्या
की, उसे मार डालनेके कारणोंसे वह सन्तुष्ट था। उस-
ने वीरकी तरह फाँसीके तख्तेपर पैर रखा और वीरकी
तरह प्राण दिये किन्तु उसकी एक नस भी संकुचित
नहीं हुई।
अपराधियोंके मनस्तत्वकी आलोचना कर मेरी आंखें
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