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तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा

DevanagariHindipublished174 पृष्ठ

तरुणके स्वप्न
पुस्तकें रखना होगा, उनका Importance खूब कम है,
अच्छे अध्यापकके बिना प्राथमिक शिक्षा सफल नहीं हो
सकती। शिक्षाको सर्वप्रथम शिक्षाका Fundamental
principles समझना होगा। उसके बाद नवीन शिक्षा
प्रणाली चलायी जा सकती। उसे अपने प्रेम और सहा-
नूभूतिसे विद्यार्थियोंकी पूरी देख भाल करना होगा।
यदि शिक्षक छात्रकी अवस्थामें अपने आपको नहीं रखेगा
तो वह किस तरह छात्रोंकी Difficulty और भूल भ्रांति
समझ सकेगा। और Personality of teacher सबसे
मुख्य बात है। शिक्षाके तीन प्रधान उपादान हैं। (१)
शिक्षकका व्यक्तित्व (२) शिक्षाकी प्रणाली (३) शिक्षा-
का विषय और पाठ्य पुस्तक। शिक्षकमें व्यक्तित्व न हो
तो किसी तरहकी शिक्षा संभव नहीं हो सकती। चरित्र-
वान व्यक्तित्व सम्पन्न शिक्षक मिलनेपर हमें शिक्षाप्रणाली
निर्धारित करना होगा। योग्य शिक्षक मिले और शिक्षा
प्रणाली निर्धारित हो जाय तो किसी भी विषयकी
पुस्तक पढ़ायी जा सकती है।
आशा है तुम प्रसन्न होगे। इति
३
तुम्हारा पत्र यथा समय मिला, उत्तर देनेमें बिलम्ब
हुआ, कुछ खयाल न करना। आशा करता हूं तुम मान-
६६

चरित्र गठन और मानसिक उन्नति
सिक अशांति दूरकर प्रसन्नचित हो सब काम करते
रहोगे। Milton ने कहा है। "The mind is its own
place and can make a hell of heaven and a
heaven of hell." निश्चय ही इस उक्तिको व्यवहारमें
लाना हर समय संभव नहीं होता। किन्तु आदर्शको
सामने रखे बिना जीवनमे आगे बढ़ना असम्भव है।
वस्तुतः जीवनकी कोई भी अवस्था अशांतिहीन नहीं है,
यह बात भूलनेसे काम नहीं चलेगा।
अपने छुटकारेकी बात अब मैं नही सोचता, तुम लोग
भी मत सोचना भगवानकी कृपासे यहां मुझे मानसिक
शांति मिली है, जरूरत होनेपर यहां सारा जीवन व्यतीत
कर सकता हूं, ऐसी ताकत पा गया हूं, यही विश्वास
होता है। मेरी शुभेच्छाका कोई प्रभाव नहीं है, किन्तु
विश्वजननीका शुभाशीर्वाद चर्मकी तरह सर्वदा तुम्हारी
रक्षा करें। और मैं क्या लिखूं ? विश्वजननीमें विश्वास
और भरोसा रखना। तुम उसकी कृपासे सम्पूर्ण विपत्ति
और मोहसे उत्तीर्ण हो जाओगे। मनमें सुख शांति न
रहने पर, बाहरका अभाव दूर होनेपर भी मनुष्य सुखी
नहीं हो सकता। इसलिये संसारके सब काम करते रहने-
पर भी विश्वजननीके प्रति हृदयको अर्पण करना चाहिये।
इति।
६७

तरुणके स्वप्न
〰〰〰〰〰〰〰
("आत्म शक्ति" सम्पादक श्रीगोपाल लालको लिखे
हुए पत्रका अंश)
इनसिन जेल
५ अप्रैल, १६२७
परम प्रीति भाजनेषु,
आपका ५ वीं चैत्रका पत्र पाकर आनन्दित हुआ,
आपने अनेक प्रश्न किये हैं क्या उत्तर दूं, मालूम नहीं।
बहुत बातें लिखनेकी इच्छा होती है, पर लिखी जा सकती
है क्या ?
शरीरके सम्बन्धमें कोई नयी बात नहीं कहना है,
"यथा पूर्वम् तथा परम्" परिणाम क्या होगा मालूम नहीं;
अब शरीरकी चिन्ता नहीं करता। पिछले महिनोंमें मेरे
मनकी गति कुछ भिन्न धाराओंकी तरफ द्रुत वेगसे गयी
है। मेरी यह धारणाबद्ध मूल होती जा रही है कि जीवन-
को सोलहों आना देनेके लिये तैयार न होने पर मेरुदण्ड-
को सीधा रखना मुश्किल है। जीवन प्रभातमें यही
प्रार्थना हृदयमें रखकर अवतीर्ण हुआ था,—"तोमार
पोताका जारे दाओ तारे बोहिबार दाओ शक्ति।" भविष्य-
की बात तो नहीं कह सकता पर अभीतक वह शक्ति भग-
बान देते आ रहे हैं। इसीलिये मैं बहुत सुखी हूं, बीच-
६८

चरित्र गठन और मानसिक उन्नति
बीचमें मनमें सवाल होता है, मेरे समान सुखी दुनियांमें
कितने हैं ? इस समय वक्ताकार उन्नत प्राचीरसे निकलने-
की आशा जितनी दूर जा रही है, उसी अनुपातसे मेरा
चित्त शान्त और उद्व ग शून्य हो रहा है । आत्मस्थ होना
और अपने आत्म-विकासके श्रोतमें जीवन नौका
वहा देनेमें परम शान्ति है और अधिक समयतक बन्द
रहनेमें भीतरी शान्ति ही एकमात्र सहारा है। अधिक
कालतक कारावासमें रहनेकी सम्भावनामें मैंने अपूर्व
शान्ति पायी है Emerson ने कहा है, We must live
wholly from within इसका अक्षर अक्षर सत्य है और
इस सत्यके प्रति मेरा विश्वास दिन-दिन दृढ़ होता जा
रहा है ।
मेरे समान जिनका जीवन है वे यदि बाहरकी घटना-
से जीवनकी सफलता और विफलता निद्धारित करें तो;
‘मृत्युरेव न संशयः’ जिस कांटेसे हमारी ( बन्दियोंकी )
हालत वजन की जाती है, वह कांटा बाहरका नहीं भीतर-
का होना चाहिये । क्योकि बाहरी हिसाबसे तो हमारा
जीवन शून्य है। यहीं यदि यवनिका पात हो तो संसार-
पर तो हमारे जीवनकी स्थायी छाप नहीं भी रह सकती
है । किन्तु जीवनमें यदि और काम न भी कर सकू ं तो,
६६

तरुणके स्वप्न
आदर्शको वास्तव द्वारों प्रस्फुटित न कर सकूँ तो भी
जीवन व्यर्थ न होगा। महान आदर्शको यदि प्राणोंमें रखे
रहूँ, आदर्शके साथ अपना जीवन मिला दूँ तो मैं सन्तुष्ट
हूँ। मेरा जीवन दुनियाकी नजरोंमें व्यर्थ होनेपर भी, मेरी
नजरोंमें (मालूम होता है भगवानकी दृष्टिमें भी) व्यर्थ
न होगा। दुनियामें सभी चीज क्षणभंगुर हैं, सिर्फ एक
चीज अविनाशी है, नष्ट नहीं होती, वह है भाव या
आवेग। हमारा आदर्श, हमारी आशा, आकांक्षा, चिन्ता-
धारा अविनाशवर है। आपको क्या दिवालोंसे घेरकर
कोई रख सकता है ?
पूर्ण रूपसे उत्सर्ग करनेके लिये दूसरी तरफ आदर्श-
को पूर्ण रूपसे ग्रहण करना होगा। यानी आदर्शकी पूर्ण
प्राप्तिके लिये अपना पूर्णोत्सर्ग चाहिये। त्याग और उप-
लब्धि,—renunciation and realisation एक ही
चीजके दो पहलू हैं। इस समय आदर्शको सम्पूर्णतः
उत्सर्ग करनेके लिये मेरे प्राण व्याकुल हो उठे हैं।
जिन्होंने इतनी दुर्बलताके बीचमे मुझे शक्तिके उच्च

चरित्र गठन और मानसिक उन्नति
बहुत दिन हुए systemetic study छोड़नेके लिये
बाध्य हुआ हूं, राष्ट्रीयताकी भित्ति स्वरूप जो कुछ मूल
समस्याएं हैं उनके समाधानके लिये लिखना-पढ़ना और
गवेषणा शुरू की थी। आजकल वह काम बन्द है। फिर
कब शुरू कर सकूं'गा मालूम नहीं। बाहर निकळनेपर यह
काम न कर सकूं'गा इसलिये यहीं काम खत्म कर लेना
चाहता हूं। मेरे कारावासका काम शायद अभीतक समाप्त
नही हुआ इसलिये जानेमे विलम्ब हो रहा है।
भगवान आप सबको प्रसन्न रखें तथा उनका
आशीर्वाद हमेशा आपको प्राप्त हो यही मेरी प्रार्थना है,
इति—
७१

जेल और कैदी
[ श्री दिलीपकुमार रायको लिखे गये दो पत्र ]
माण्डला जेल
२—५—२५
प्रिय दिलीप,
तुम्हारी २४-३-२५ की चिट्ठी पाकर आनन्दित हुआ।
तुमने शंका की थी कि बीच-बीचमें जैसा होता रहता है,
चिट्ठियोंको भी "double distiletion" के बीचमेंसे आना
होगा किन्तु इस बार ऐसा नहीं हुआ इसलिये बहुत
प्रसन्न हूं।
तुम्हारी चिट्ठी हृत्तन्त्रीका इस प्रकार कोमल भावसे
७२

जेल और कैदी
स्पर्श करती है, चिन्ता और अनुभूतिको अनुप्राणित करती
है कि मेरे लिये उसका उत्तर देना सुकठिन है। इस चिट्ठी-
को “censor” हाथोंसे गुजर कर जाना होगा यह भी
एक असुविधा है। क्योंकि यह कोई नहीं चाहता कि
उसके हृदयके गम्भीर भाव दिनके प्रकाशमें नग्न पड़े रहे।
इसीलिये पत्थरकी दीवाल और लोहेके फाटकमें बन्द
इस समय जो कुछ सोचता हूं, अनुभव करता हूं उसका
अनेकांश उपयुक्त समय न आनेतक अकथित ही रखना
पड़ेगा।
हममेंसे अनेक बिना कारण और अज्ञात कारण
जेलोंमे बन्द है, यह भावना तुम्हारी मार्जित रुचिको
आघात करती है यह सम्पूर्ण स्वाभाविक है। किन्तु जब
सब घटनाएं मनमें ही, भीतर ही भीतर हो रही हैं, तब
इसे अध्यात्मिक दृष्टिसे भी देखा जा सकता है। मैं यह
बात नहीं कह सकता कि जेलमे रहना ही मैं पसन्द
करता हूं, क्योंकि यह कहना बिलकुल ढोंग होगा। बल्कि
मैं यह तब कह सकता हूं कि कोई भी सभ्य शिक्षित
आदमी जेलोंमें रहना पसन्द नहीं कर सकता। जेलकी
आवहवा मनुष्यको विकृत और अमानुष करनेके लिये हैं,
और मेरा विश्वास है यह बात हर एक जेलके लिये कही
जा सकती है।
७३

तरुणके स्वप्न
मेरा विचार है कि जेलमें रहनेवाले अधिकांश अप-
राधियोंकी जेलमें नैतिक उन्नति नहीं होती बल्कि वे
और भी हीन हो जाते हैं। यह मुझे मानना होगा कि
इतने दिन तक जेलमें रहनेके कारण जेलोंमें आमूल सुधार
होना चाहिये,यह मैं अनुभव करने लगा हूं और भविष्यमें
जेलोंका सुधार भी मेरे कार्यक्रमका एक अंग होगा।
भारतीय जेल-शासन-प्रणाली एक खराब प्रणाली (यानी
ब्रिटिश प्रणाली) का अनुकरण मात्र है। जिस प्रकार
कलकत्ता विश्वविद्यालय एक खराब यानी लण्डन विश्व-
विद्यालयका अनुकरण है। जेल संस्कारकेलिये हमें
अमेरिकाके जेल खानोंकी व्यवस्थाका अनुसरण करना
चाहिये।
इस परिवर्तनमें सबसे आवश्यक है एक नवीन मनो
भाव, कैदियोंके प्रति सहानुभूतिका भाव होना, अपरा-
धियोंकी अपराध प्रवृत्तिको मानसिक व्याधि ही मानना
होगा। और इसके दूर होनेका उपाय हो ऐसी व्यवस्था ही
करना होगा। प्रतिषोध मूलक दण्ड विधिको संस्कार-
मूलक दण्ड विधिकेलिये रास्ता छोड़ देना होगा।
मैं नहीं समझता कि यदि मैं स्वयं कैदी न होता
तो एक कैदीको सहानुभूतिकी नज़रसे देख सकता और
७४

जेल और कैदी
इस विषयमें मुझे कुछ भी सन्देहं नहीं है कि यदि हमारे
आर्टिस्टों और साहित्यिकोंमे जेल जीवन सम्बन्धी कुछ
अभिज्ञता होती तो शिल्प और साहित्य कई अंशोंमें समृद्ध
हो जाता। काजी नजरूल इस्लामकी कविता उनके जेल
जीवनकी अभिज्ञताकी कितनी ऋणी है, शायद यह किसीने
सोचा भी नहीं।
मैं जब स्थिर भावसे सोचता हूं तो मेरे मनमे यह
धारणा स्पष्ट हो जाती है कि हमारी भावना और कष्टों-
के भीतर एक महान् उद्देश्य आपना काम कर रहा है।
और यदि यही धारणा हर घड़ी हमारे जीवनमे अपना
प्रभाव रखती तो हमारा दुख, कष्ट सब कुछ तिरोहित
हो जाता। हां ! इसी लिये तो आत्मा और शरीरमें निर-
न्तर द्वन्द चला करता है।
कैदीकी अवस्थामें रहते हुए बन्दीके हृदयमे साधारण
तया एक दार्शनिक भाव उठता है जो उसे बल प्रदान
करता है, मैंने भी वहींपर अपने खड़े होनेके लिये स्थान
बना लिया है, तथा दर्शनके विषयमें जो कुछ जाना सुना है
वह और जीवन सम्बन्धी जो मेरी धारणा है वह भी इस
समय मेरे काम आ रही है। मनुष्य यदि अपने भीतर
खोजे तो सोचने लायक बहुत-सी बातें पा सकता है,
७५

तरुणके स्वप्न
बन्दी होनेपर भी उसे कष्ट नहीं है यदि उसका स्वास्थ्य
अक्षुण्ण हैं। किन्तु हमारा कष्ट तो आध्यात्मिक नहीं
है, वह शारीरिक है, आत्माके तैयार होनेपर भी शरीर
कभी-कभी दुर्बल हो जाता है।
लोकमान्य तिलकने जेलमें गीताकी समालोचना
लिखी थी और मैं निसन्देह कह सकता हूं कि जेलमें वे
भीतरसे सुखी रहे होंगे, किन्तु इसमें भी मुझे सन्देह
नहीं है कि मान्डला जेलमें छ साल तक रहनाही उनकी
अकाल मृत्युका कारण हुआ। यह मुझे मानना होगा
कि जिस निर्जनतामें मनुष्यको जेल जीवन बिताना पड़ता
है वही निर्जनता मनुष्यको बाहिरी वातावरणसे दूर कर
जीवनकी गहनतम समस्याओंपर विचार करनेका सुयोग
देती है। अपने सम्बन्धमें भी मैं कह सकता हूं कि
साल भर यहां रहनेके कारण व्यक्तिगत और समष्टिगत
अनेक समस्याओंका बहुत कुछ समाधान कर सका हूं।
जो मतामत एक समय नितान्त साधारण तौरसे प्रकट
किये जाते या सोचे जाते, आज वे स्पष्ट और अपने
पूर्ण रूपसे मेरे सामने आ गये। और किसी तरफसे
नहीं, जब तक जेलकी मीयाद खत्म नहीं होती न सही मैं
आध्यात्मिकी दृष्टिसे बहुत कुछ लाभवान हो सकूंगा।
७६

जेल और कैदी
तुमने मेरे कारावास ग्रहणको एक प्रकारका Martyr-
dom कहा है। बेशक, यह कहना तुम्हारी गम्भीर अनुभूति
और प्राणोंके महत्वका परिचायक है। किन्तु humour
और proportion का मुझे थोड़ा बहुत ज्ञान है, इसलिये
अपनेको Martyr अनुभव करनेकी स्पर्धा नहीं करता ।
स्पर्धा या आत्मदर्पसे दूर ही रहना चाहता हूं। हां, इसमें
कितना सफल हुआ है, यह तुम्हारे जैसे मित्र ही कह
सकते हैं। Martyrdom तो मेरे लिये एक आदर्श हो
सकता है।
मेरा विश्वास है कि अधिक समय तक जेलमें रहने
केलिये सबसे बड़ी मुसीबत यही है कि उसके अन-
जानमें ही बुढ़ौती उसे आ घेरती है। इसलिये इस ओर
उसे विशेष ध्यान रखना चाहिये। तुम सोच भी नहीं
सकते कि अधिक समय तक जेलमें रहनेके कारण आदमी
कैसे शरीर और मनसे बुड्ढा हो जाता है। इसके अनेक
कारण हैं, खराब खाना व्यायाम या स्फुर्तिका अभाव,
समाजसे अलग रहना, अधीनताकी शृङ्खलाका भार, मित्रोंका
अभाव और संगीतका अभाव, संगीतका अभाव सबसे
अन्तमे उलिखित है किन्तु यह बहुत बड़ा अभाव है। अनेक
अभावोंकी पूर्ति तो मनुष्य अपने अन्तरसे कर सकता है
७७

तरुणके स्वप्न
किन्तु कुछकी पूर्ति बाहरसेही हो सकती है। इन सब
बाहिरी चीजोंसे वंचित रहना अकाल वार्द्धक्यका मामूली
कारण नहीं है। अलीपुर जेलमें युरोपियन कैदियोंके
लिये सप्ताहमें एक दिन संगीतका प्रबन्ध है, पर हमारे
लिये नहीं। पिकनिक, संगीत चर्चा, साधारण वक्तृता
और खुली जगहमें घूमना तथा काव्य साहित्यकी चर्चा
करना हमारे जीवनको कितना सरस और मधुर बना
देता है यह हम साधारण जीवनमें अनुभव नहीं कर सकते
परन्तु जब हमें जबरन बन्दी बनाकर रखा जाता है,
तब समझमें आता है। जबतक जेलमें स्वास्थ्यकर और
सामाजिक विधि व्यवस्थाका प्रबन्ध न होगा, उस समय
तक कैदियोंके सुधारकी बात असंभव है। और तबतक
जेल नैतिक उन्नतिका साधन न होकर वर्तमान अवनत
अवस्थामें ही पड़ी रहेगी।
यह लिखना शायद उचित नहीं है कि अपने आदमियों,
मित्रों प्रिय जनों और सर्वसाधारणकी सहानुभूतिसे मनु-
ष्यको जेलमें भी अत्यन्त सुख होता है। यह भाव कैदीके
मनमें सूक्ष्म रूपसे काम करता है, तब भी मैं अपने मनका
विश्लेषण करके समझ पाता हूं कि यह भाव कुछ कम
वास्तविक नहीं है। यह सहानुभूति प्राप्त करनेका भाव
७८

जेल और कैदी

साधारण और कैदियों राजनैतिक कैदियोंके भाग्यके फर्कको
साफ कर देता है। जो राजनैतिक कैदी है, वह जानता है
कि छुटकारा पानेपर समाज उसका सहर्ष स्वागत करेगा,
किन्तु साधारणतः अपराधी इस तरहकी संभावना नहीं
देखता। संभव है वह अपने घरके सिवा और कही भी सहा-
नुभूतिकी आशा नहीं कर सकता, इसी लिये सर्वसाधारण
को मुंह दिखानेमे उसे शर्म मालूम होती है। मेरे Yard
मे जो कैदी काम करते है उनमे कुछ कैदी कहते है कि उनके
घरवालोको मालूम ही नही कि जेलमें है। वे शर्मके मारे
घरपर किसी तरहका संवाद नही भेजते। यह परिस्थिति
बड़ी असन्तोषजनक मालूम होती है। सभ्य समाज
अपराधियोंके प्रति अधिक सहानुभूतिशील क्यों न
बने ?
जेल जीवनकी अभिज्ञता और उससे उठनेवाले विचा-
रोंसे पन्नेपर पन्ने लिख सकता हूं। पर एक चिट्ठीका
भी तो कहीं अन्त होना चाहिये। विशेष शक्ति और
उद्यम होता तो इस विषयपर एक पुस्तक लिखनेकी चेष्टा
करता किन्तु ऐसी सामर्थ्य नही है।
मैं जेलके कष्टको शारीरिक न मानकर मानसिक
माननेका पक्षपाती हूं। जहां अत्याचार और अपमानका

७६

तरुणके स्वप्न
आघात यथा संभव कम हो आता है वहां बन्दी जीवन
उतना यंत्रणा दायक नहीं होता । किन्तु इस तरहका सूक्ष्म
आघात ऊपरवालोंकी तरफसे होता है, जेलके अधिकारि-
योंका इसमें कुछ हाथ नहीं रहता । ये जो आघात और
उत्पीड़न हैं वे मनुष्यके मन को, आघात करनेवालेके प्रति और
भी विकृत कर देते हैं और इसीसे मनमें होता है कि ये
आघात व्यर्थ हैं । इनसे हम अपना पार्थिव अस्तित्व
भूल जाते हैं और अपने हृदयमें आनन्दधामकी प्रतिष्ठा
करते हैं। इसी लिये ये आघात हमारी स्वप्नाविष्ट
आत्माको जगाकर हमें बल देते हैं, कहते हैं कि हमारे
आस-पासकी अवस्था कितनी कठोर और निर्मम है।
तुमने कहा, रोज रोज मनुष्यके आंसू पृथ्वीकी
नीचीसे नीची तहोंको भिगाते चले जा रहे हैं,—यह
दृश्य तुम्हें प्रतिदिन गम्भीर और विषण्ण बना रहा
है। किन्तु ये आंसू, दुखके ही आंसू नहीं हैं, उनमें
करुणाश्रु और प्रेमाश्रु भी हैं। समृद्धतर और प्रशस्ततर
आनन्द स्रोतपर पहुंचनेकी संभावना होनेपर आपत्तियोंके
छोटे मोटे गढ़ोंको पार करनेसे क्या तुम इन्कार कर देते ?
मैं खुद तो दुखवाद और निराशाका कोई कारण नहीं
देखता, बल्कि मनमें यही होता है कि दुख और यंत्रणा
८०

जेल और कैदी
उन्नततर कर्म और उच्चतर सफलताको प्रेरणा ला देगी।
तुम क्या समझते हो कि बिना दुख कष्टके जो मिलता है,
उसका कुछ मूल्य है ?
कुछ दिन पहले तुमने जो किताबें भेजी थीं वे सब
मिल गयीं। किन्तु अब उन्हें वापिस नहीं कर सकता,
क्योंकि उनके पढ़नेवाले बहुत हो गये हैं। तुम्हारी रुचि
जितनी अच्छी है, उस हालतमें यह कहना अनावश्यक है
कि तुम जो किताबें भेजोगे वे सादर गृहीत होंगी। इति—
1320/05 माण्डला जेल
२५-६-२५
प्रिय दिलीप,
अन्तिम चिट्ठीके बाद तुम्हारी कुल तीन चिट्ठियां
मिलीं। चिट्ठियोंकी तारीखें हैं, ६ मई, १५ मई, १५ जून।
तुम्हारा भेजा हुआ किताबोंका पार्सल मिल गया।
तुर्गनेवकी Smoke नामक किताब नहीं मिली। पार्सल
आफिसमें खोला गया था, इसलिये सुपरिण्टेण्डेण्टसे इस
विषयमें कह रखा है। जरूरत होनेपर कलकत्तेकी C. I.
D. से वे पूछेंगे, तुम भी D. I. G. C. I. D. को लिख
कर ध्यानाकर्षण कर सकते हो।
Bertrand Russel की "Prospects of Indus
६ ४१

तरुणके स्वप्न
trial Civilisation" नामक पुस्तक बहरमपुर जेलमें कई
कैदियोंके पास है। मैं जब स्थानान्तरित किया गया तब
अनेक इस किताबको अपने पास रखना चाहते थे। इसकी
तुम्हें जरूरत न होगी यह समझकर वहीं छोड़ आया था।
रसलकी किताबोंका इतना आदर है कि कोई पाकर देना
नहीं चाहता। बहरमपुरके सुपरिण्टेण्डेण्टको लिखा है कि
वे तुम्हारे पास किताब भेज दें। तुम भी उन्हें एक पत्र
लिख देना, तकादा हो जायगा। तुम्हारा काम अटक गया
इसके लिये बड़ा दुःखी हूं किन्तु तुम समझ सकते हो
कि मैं उस समय नहीं समझ सका था कि तुम्हें इसकी
इतनी सख्त जरूरत पड़ेगी। "Free Thought and
Official Propaganda" मेरे पास नहीं है, यह किताब
तुमने मेरे पास नहीं भेजी।
किताब चुनदेनेकेलिये अनेक धन्यवाद। हम लोग
सब आशा करते हैं कि जो काम तुमने शुरू किया है, वह
भगवानकी कृपासे अच्छी तरह चलेगा। तुम्हारे लेख मैं
सम्मान सहित पढूंगा, यह कहना न होगा। किताब प्रका-
शित करते समय कवरकी तरफ ध्यान रखना, बंगवाणीमें
रवीन्द्रनाथपर लिखा हुआ एक लेख देखो, मैंने अभी उसे
पढ़ा नहीं है किन्तु विषय चित्ताकर्षक मालूम पड़ता है।
८२

जेल और कैदी
तुम जानते हो आजकल मेरे मनको क्या आच्छादित
किये रहता है। मैं जानता हूं हम सब एक ही विषयको
सोचते हैं, वह है महात्मा देशबन्धुका देहत्याग । अख-
बारमें जब यह समाचार पढ़ा तब अपनी आंखोंका
विश्वास नहीं हुआ किन्तु हाय ! संवाद नितान्त सत्य
था। मालूम होता है, हमारी जातिका भाग्य ही फूटा
है। जो विचार मेरे मनमें आन्दोलित हो रहे हैं, उनको
प्रकाशित कर मनको हलका करनेकी इच्छा होनेपर भी
मुझे कष्टकोही संयत करना होगा। जो सब बातें इस
समय मनमें आ रही हैं वे इतनी पवित्र, इतनी मूल्यवान
हैं कि अपरिचितके सामने प्रगट नहीं की जा सकतीं ।
Censor को अपरिचित न मानूं यह कैसे हो सकता है ?
मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि देशबन्धुके न रहनेसे
देशकी अपूर्व क्षति तो हुई ही, बंगालके युवकोंका तो
सर्वस्वही चला गया। सचमुच इस घटनाने मुझे स्तम्भित
कर दिया।
आज मैं इतना शोकाच्छन्न और विचलित हूं, साथ ही
साथ मनोजगतमें उन महात्माके इतना निकट पहुंच गया
हूं कि उनकी गुणावलिके सम्बन्धमें कुछ भी विश्लेषण
करना असम्भव है। मैंने उनके पास रहकर, बिलकुल
८३

तरुणके स्वप्न
सहज अवस्थामें उनके जो रूप देखे थे, समय आने-
पर दुनियाको उनका कुछ आभास दे सकूँगा ऐसी आशा
है। मेरे समान उनके बारेमें जो अनेक बातें जानते हैं,
वे कह सकनेपर भी, आज कुछ कह नहीं सकते, चुप हैं,
डर होता है कि उनके महत्वका पूर्ण परिचय न दे सकने-
की अक्षमताके कारण उन्हें सकुंचित करके न दिखा दें।
तुम जब कहते हो कि खैर कोई कष्ट नहीं है, तब मैं
तुमसे एकमत होता हूं। जीवनमें ऐसी ट्रेजडी होती
है, जैसी कि हमारे ऊपर आ गयी, किन्तु उसे मैं सानन्द
ग्रहण नहीं कर सकता। मैं इतना बड़ा तत्व-ज्ञानी या
पाखण्डी नहीं हूं कि कह सकूं कि मैं सब तरहका
दुख सहर्ष वरण कर सकता हूं। अनेक ऐसे अभागे हैं—
मुमकिन है वे भाग्यवान ही हों—जो मानो सब तरहका
दुख कष्ट भोगनेकेलिये ही पैदा हुए हैं। अधिक हो या
कम, यदि किसीको कटोरेभर दुख ही पीना पड़े तो अपने
आपको भूलकर ही पीना अच्छा है। किन्तु आत्म समर्पण
या आत्मनिवेदनका यह भाव चीनकी दीवारकी तरह सब
आघातो और कष्टोंसे रक्षा नहीं भी कर सकता है।
हां,—यह आत्म-समर्पण हमारी सहन शक्तिको बहुत
कुछ बढ़ा देता है, इसमें शक नहीं। वरटण्डने कहा है,
८४

द्वितीय खण्ड: राष्ट्र-सेवा, समाज-सुधार एवं स्वाधीनता का आह्वान

जीवनमें ऐसी ट्रेजेडी भी है, जिसके हाथसे मनुष्य छुट-
कारा ही चाहता है, यहां उन्होंने बिलकुल सांसारिक
व्यक्तिका मत प्रकट किया है। मेरा अपना विश्वास तो
यह है कि जो सिर्फ निष्कलंक साधु बनता है या साधु-
त्वका प्रदर्शन करता हैं, वह पाखण्डी है और वही इस
बातका प्रतिवाद कर सकता है।
जो भावुक या तत्व ज्ञानी हैं उनकी यन्त्रणा सम्पूर्ण
रूपसे निरविच्छिन्न है, यह समझना ठीक नहीं है। तत्व
ज्ञानहीनों ( abstract point of view से में उन्हें
तत्व ज्ञानहीन कहता हूं·) का भी अपना एक idealism
है। उसे वे 'पूजार्ह' समझते हैं, श्रद्धा और प्रेम करते हैं।
नाना प्रकारके दुख और यंत्रणाके साथ युद्ध करते समय
वे उसी प्रेमसागरसे साहस और भरोसा पाते हैं। यहां
मेरे साथ जिन्होंने कारावासकी यन्त्रणाभोगी है, उनमें
अनेक ऐसे हैं जो भावुक या दार्शनिक नहीं हैं। तब भी वे
शान्त भावसे यन्त्रणा सहते हैं, वीरकी तरह सहते हैं।
Technical अर्थमें वे दार्शनिक न हों पर मैं उन्हें सम्पूर्ण
रूपसे भाव विवर्जित भी नहीं समझ सकता। संभवतः संसार
में जो कर्मी हैं, उनसबके बारेमें यही बात कही जा सकती
है। सर्वसाधारणके मनमें यह धारणा है कि कैदी जब फां-