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तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा

DevanagariHindipublished174 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 174 में से

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पृष्ठ 70

चरित्र गठन और मानसिक उन्नति
बीचमें मनमें सवाल होता है, मेरे समान सुखी दुनियांमें
कितने हैं ? इस समय वक्ताकार उन्नत प्राचीरसे निकलने-
की आशा जितनी दूर जा रही है, उसी अनुपातसे मेरा
चित्त शान्त और उद्व ग शून्य हो रहा है । आत्मस्थ होना
और अपने आत्म-विकासके श्रोतमें जीवन नौका
वहा देनेमें परम शान्ति है और अधिक समयतक बन्द
रहनेमें भीतरी शान्ति ही एकमात्र सहारा है। अधिक
कालतक कारावासमें रहनेकी सम्भावनामें मैंने अपूर्व
शान्ति पायी है Emerson ने कहा है, We must live
wholly from within इसका अक्षर अक्षर सत्य है और
इस सत्यके प्रति मेरा विश्वास दिन-दिन दृढ़ होता जा
रहा है ।
मेरे समान जिनका जीवन है वे यदि बाहरकी घटना-
से जीवनकी सफलता और विफलता निद्धारित करें तो;
‘मृत्युरेव न संशयः’ जिस कांटेसे हमारी ( बन्दियोंकी )
हालत वजन की जाती है, वह कांटा बाहरका नहीं भीतर-
का होना चाहिये । क्योकि बाहरी हिसाबसे तो हमारा
जीवन शून्य है। यहीं यदि यवनिका पात हो तो संसार-
पर तो हमारे जीवनकी स्थायी छाप नहीं भी रह सकती
है । किन्तु जीवनमें यदि और काम न भी कर सकू ं तो,
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